लेखक: आनंद सिंह
बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर करते हुए अनंत सिंह जदयू से निष्कासित कर दिए गए हैं। जनता दल (यूनाइटेड) ने मोकामा के विधायक अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने 24 अक्टूबर को यह कार्रवाई की घोषणा की।
अनंत सिंह जदयू से निष्कासित: कारण और प्रभाव
निष्कासन की पृष्ठभूमि में अनंत सिंह के हालिया बयान और गतिविधियां रहीं। 16 अक्टूबर को उन्होंने दावा किया था कि नीतीश कुमार के साथ रहते हुए उन्होंने नौ लोगों की हत्या करवाई थी। विवाद बढ़ने पर उन्होंने सफाई दी कि लालू यादव की सरकार के दौरान उनके नौ साथियों की हत्या हुई थी। इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इस बयान पर कार्रवाई की मांग की। जब मीडिया ने अनंत सिंह से पूछा कि कार्रवाई होने पर क्या करेंगे, तो उनका जवाब था – “कार्रवाई होगी तो देखल जाएगा।” इस प्रतिक्रिया ने विवाद को और हवा दे दी।
पार्टी उम्मीदवार के विरोध में प्रचार
17 अक्टूबर को अनंत सिंह ने पटना स्नातक विधान परिषद चुनाव में जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बाकी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाएगी। जदयू ने इस सीट से नीरज कुमार को अपना प्रत्याशी बनाया था। अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करना नेतृत्व को नागवार गुजरा।
इसके अलावा, जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार के खिलाफ अनंत सिंह की लगातार अमर्यादित टिप्पणियां, अपशब्दों का इस्तेमाल और आरोपों की बौछार भी निष्कासन का कारण बनी। पार्टी के निर्देशों की अवहेलना और शीर्ष नेतृत्व के प्रति असम्मानजनक भाषा ने कार्रवाई की जमीन तैयार कर दी।
विधानसभा सदस्यता पर संवैधानिक तलवार
जदयू के कार्यालय आदेश में केवल निष्कासन तक सीमित नहीं है। आदेश में बिहार विधानसभा अध्यक्ष से भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता अविलंब समाप्त करने की अनुशंसा भी की गई है। हालांकि, अंतिम निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
इस अनुशंसा का अर्थ है कि पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने के साथ-साथ उनकी विधायकी पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, दलबदल कानून के तहत सदस्यता समाप्ति की प्रक्रिया लंबी और तकनीकी होती है। भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर संबंधित प्रावधानों का विवरण उपलब्ध है।
‘छोटे सरकार’ की राजनीतिक यात्रा
बिहार की राजनीति में अनंत कुमार सिंह का नाम केवल चुनावी जीत के कारण नहीं, बल्कि मोकामा में उनके प्रभाव, बाहुबली छवि, आपराधिक मामलों और बेबाक बयानों के कारण भी चर्चित रहा है। उन्हें आम तौर पर ‘छोटे सरकार’ के नाम से जाना जाता है। उनके बड़े भाई दिलीप सिंह ‘बड़े सरकार’ कहलाते थे।
अनंत सिंह का राजनीतिक सफर दिलचस्प रहा है। वे जदयू के टिकट पर विधायक बने, फिर निर्दलीय चुनाव जीतकर अपनी ताकत दिखाई और बाद में राजद के टिकट पर भी विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने फिर जदयू का दामन थामा। उनकी पत्नी नीलम देवी की चुनावी जीत भी परिवार के राजनीतिक प्रभाव को रेखांकित करती है।
बयानों से बने सुर्खियों का सिलसिला
अनंत सिंह के बयानों का दायरा केवल नीतीश कुमार तक सीमित नहीं रहा। मई 2026 में उन्होंने सांसद पप्पू यादव पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “कौन हैं पप्पू यादव? हम कुत्ता-बिलाई का नाम नहीं जानते हैं।” सितंबर 2026 में जदयू नेता नीरज कुमार को ‘गदहा से बदतर’ बताया। अक्टूबर में ललन सिंह के बारे में पूछे जाने पर तंज कसा, “बिहार में 100 ललन सिंह हैं, किसके बारे में पूछ रहे हैं?”
इन बयानों ने उन्हें लगातार चर्चा में बनाए रखा। समर्थक उनके बेबाक और ठेठ अंदाज को पसंद करते हैं, जबकि आलोचक उनकी भाषा पर सवाल उठाते हैं। यही विरोधाभास उनकी राजनीतिक छवि का अहम हिस्सा बन चुका है।
सोशल मीडिया पर ‘छोटे सरकार’ का जलवा
अनंत सिंह सोशल मीडिया पर भी खासे चर्चित हैं। उनकी ठेठ मगही बोली, छोटे-छोटे जवाब और अप्रत्याशित प्रतिक्रियाएं वीडियो और रील्स के लिए अनुकूल साबित होती हैं। लंबे राजनीतिक सवालों का एक वाक्य में जवाब देना, नेताओं पर तंज कसना और अपने खास अंदाज में बात रखना उन्हें चर्चा में बनाए रखता है।
उनके बयान सामने आते ही वीडियो क्लिप प्रसारित होने लगते हैं। समर्थक उन्हें बेबाक नेता के रूप में पेश करते हैं, जबकि विरोधी उन्हीं बयानों को उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं। इस तरह उनके बयान केवल राजनीतिक खबर नहीं रहते, बल्कि सोशल मीडिया पर बहस और मनोरंजन का विषय भी बन जाते हैं।
अब आगे क्या करेंगे छोटे सरकार?
अनंत सिंह के लिए जदयू से निष्कासन एक बड़ा राजनीतिक मोड़ है। पार्टी से बाहर होने के बाद उनकी अगली रणनीति क्या होगी, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या वे किसी नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश करेंगे, अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को आगे बढ़ाएंगे या फिलहाल चुप्पी साधेंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
दूसरा बड़ा सवाल उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर है। जदयू ने विधानसभा अध्यक्ष से सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा की है, लेकिन इस पर फैसला संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होना है। इसलिए फिलहाल उनकी विधायकी समाप्त होने को तय मानना जल्दबाजी होगी।
इतना जरूर है कि अनंत सिंह चुप बैठने वाले नेताओं में नहीं गिने जाते। उनके बयान, उनका अंदाज और उनकी राजनीतिक चालें अक्सर खबर बनती रही हैं। अब देखना यह है कि पार्टी से बाहर होने के बाद ‘छोटे सरकार’ अपनी सियासत को किस दिशा में ले जाते हैं। तब तक सोशल मीडिया पर उनके वीडियो और रील्स की चर्चा जारी रहने की पूरी संभावना है।

