‘आप’ की ‘इंडिया’ गठबंधन से दूरी ने फिर बढ़ाई विपक्षी एकता की उलझन
देवानंद सिंह
भारतीय राजनीति में गठबंधन बनना और टूटना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह घटनाक्रम उस समय घटता है, जब विपक्ष को सर्वाधिक एकजुट रहने की आवश्यकता होती है, तब यह महज़ रणनीतिक असहमति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श के लिए एक चुनौती बन जाती है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का यह सार्वजनिक बयान कि आम आदमी पार्टी अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, भारतीय राजनीति के मौजूदा विपक्षी समीकरणों में एक नई दरार का संकेत है। ऐसे समय में, जब संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने वाला है और विपक्षी दल कई अहम मुद्दों को उठाने की योजना बना रहे हैं, ‘आप’ की यह दूरी एक अहम घटनाक्रम बनकर उभरी है।

‘आप’ का राजनीतिक जन्म कांग्रेस विरोधी अन्ना आंदोलन से हुआ था। इस आंदोलन की जनभावना से निकली इस पार्टी ने भ्रष्टाचार-मुक्त, ईमानदार और आम नागरिकों की आवाज़ बनने का दावा किया। अपने शुरुआती वर्षों में ‘आप’ ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाए रखी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनने के साथ ही इस वैचारिक स्थिति से विचलन शुरू हो गया।

इंडिया गठबंधन में शामिल होना आम आदमी पार्टी के लिए एक ज़रूरी, लेकिन विवादास्पद कदम था। ‘आप’ नेतृत्व को उम्मीद थी कि यह समावेशी राजनीति उसके राष्ट्रीय विस्तार को गति देगा, लेकिन नतीजे उलटे पड़े। दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में कांग्रेस के साथ सीटों को लेकर हुए टकराव, और ‘आप’ की रणनीतिक विफलताएं, अंततः इस गठबंधन में विश्वास की डोर को कमज़ोर करती गईं।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में 2015 और 2020 में शानदार जीत दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी 2025 में बुरी तरह हार गई। केजरीवाल, सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसे बड़े नामों की पराजय ने साफ कर दिया कि गठबंधन के ज़रिए जीत की रणनीति यहां नहीं चल पाई। पार्टी ने इसके लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया, वहीं कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा बताया।

हरियाणा में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ समझौते के बजाय अकेले चुनाव लड़ना चुना और उसका परिणाम यह रहा कि 80 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बावजूद पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। मत प्रतिशत दो फीसदी से भी कम रहा, इससे कांग्रेस को भी नुकसान हुआ, लेकिन सबसे बड़ा झटका आप को लगा जिसने राज्य में ज़मीन तैयार करने के प्रयास को बर्बाद होते देखा। संजय सिंह ने साफ तौर पर कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन कोई बच्चों का खेल नहीं है। कांग्रेस ने कभी नेतृत्व की भूमिका निभाई ही नहीं। यह बयान एकतरफा दूरी नहीं, बल्कि लंबे समय से पलते राजनीतिक असंतोष की परिणति है। यह बयान बताता है कि लोकसभा चुनाव के बाद से ही आप इस गठबंधन से भीतर ही भीतर अलग हो चुकी थी और अब यह औपचारिक घोषणा मात्र है।

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से इंडिया गठबंधन की कोई प्रभावशाली बैठक नहीं हुई। जून 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर विशेष सत्र की मांग पर हुई बैठक में भी ‘आप’ ने हिस्सा नहीं लिया, इससे स्पष्ट होता है कि गठबंधन के भीतर समन्वय, रणनीतिक संवाद और नेतृत्व की कमी जैसी समस्याएं लंबे समय से मौजूद थीं। जानकार कहते हैं कि यह गठबंधन ज़बरदस्ती का साथ था, जिसमें ‘आप’ और कांग्रेस के बीच कभी भी वैचारिक सामंजस्य नहीं रहा।
दिलचस्प यह है कि कांग्रेस ने अब तक ‘आप’ के इस रुख़ पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। शायद वह जानती है कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति में किसी टकराव को सार्वजनिक मंच पर लाने से बचना ही बेहतर होगा, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि कांग्रेस नेतृत्व विपक्षी दलों को साथ लाने और बनाए रखने में विफल रहा है।

जानकारों के अनुसार “यह गठबंधन नाम के लिए ज़रूर है, लेकिन राज्यों में इसकी व्यवहारिकता लगातार क्षीण होती जा रही है।” ममता बनर्जी की टीएमसी हो या अखिलेश यादव की सपा—राज्य स्तर पर सभी दल अपनी रणनीति के अनुसार कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं। संजय सिंह का कहना है कि उनकी पार्टी संसद में सरकार के ख़िलाफ़ बोलती रहेगी, लेकिन कांग्रेस के साथ मंच साझा नहीं करेगी। यह आप की रणनीति को स्पष्ट करता है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की एकता में भूमिका निभाने के बजाय, क्षेत्रीय राजनीति में अपनी जड़ों को मज़बूत करने पर ध्यान दे रही है। पंजाब, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं, और गुजरात, जहां उसने हालिया उपचुनाव में बीजेपी को हराया, इन दोनों राज्यों को आप अपने भविष्य की आधारभूमि मान रही है।
‘आप’ और कांग्रेस का संबंध हमेशा टकराव का रहा है। आज जिन राज्यों में आप मज़बूत है, वहां पहले कांग्रेस सत्ता में थी। ऐसे में, दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है।

यह सवाल अब अहम हो गया है कि क्या ‘आप’ की यह दूरी विपक्षी एकता की कोशिशों को पूरी तरह विफल कर देगी? इसका उत्तर आंशिक हां में हो सकता है, क्योंकि संसद के भीतर चाहे जितनी रणनीतिक एकता हो, चुनावी मैदान में यदि विपक्ष बंटा रहेगा तो भाजपा के लिए राह आसान हो जाएगी। संजय सिंह ने भले ही कहा हो कि वह डीएमके और टीएमसी के साथ रहेंगे, लेकिन एक राष्ट्रव्यापी गठबंधन के रूप में यह एकता धीरे-धीरे क्षरित होती प्रतीत हो रही है।

कुल मिलाकर, आम आदमी पार्टी का इंडिया गठबंधन से बाहर होना न केवल एक दल के राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव है, बल्कि यह पूरे विपक्ष के सामने नेतृत्व, रणनीति और संवाद की चुनौती प्रस्तुत करता है। कांग्रेस को अब यह समझने की ज़रूरत है कि वह सबसे बड़ा दल होते हुए भी यदि छोटे दलों को जोड़कर नहीं रख पा रही है, तो यह उसके नेतृत्व की विफलता है। आम आदमी पार्टी, जो कभी नैतिक राजनीति की प्रतीक मानी जाती थी, अब उसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा बन चुकी है, जिससे वह दूर रहने का दावा करती थी, लेकिन क्या यह वापसी की शुरुआत है या और अधिक अलगाव का संकेत, यह आने वाले चुनाव तय करेंगे। फिलहाल, इतना तय है कि भारत की विपक्षी राजनीति एक बार फिर पुनर्गठन के दौर में है।


