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    Home » क्या फिर सिंह-इज-किंग बनकर उभर पाएंगे कैप्टन अमरिंदर सिंह ?
    Breaking News राजनीति संपादकीय

    क्या फिर सिंह-इज-किंग बनकर उभर पाएंगे कैप्टन अमरिंदर सिंह ?

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 24, 2021No Comments4 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    पंजाब कांग्रेस में लंबे घमासान के बाद जिस तरह नवजोत सिंह सिद्घू को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला, इतिहास ने स्वयं को दोहराया तो है ही, दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पंजाब में कैप्टन को साइडलाइन करने की तैयारी शुरू हो चुकी है और तीसरा सवाल यह है कि क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह पूर्व की तरह ही इस राजनीतिक उठा-पटक के बीच एक बार फिर सिंह-इज-किंग बनकर उभर पाएंगे?
    दरअसल, 7 महीने बाद देश के जिन 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें पंजाब भी शामिल है। अगर, आगामी चुनावों को लेकर सियासत सबसे अधिक गर्म है तो यूपी के बाद पंजाब ही ऐसा राज्य है, जिस पर सबकी नजर टिकी पड़ी हैं। कांग्रेस के सामने सत्ता में आने की चुनौती होगी, तो कांग्रेस से थोड़ा पीछे आम आदमी पार्टी भी इस बार बाजी मारने की हर संभव कोशिश करेगी। वहीं, बीजेपी तो देश की सबसे बड़ी है ही, इसीलिए वह भी चाहेगी कि हर हाल में पंजाब को फतह किया जाए। अकाली और बीजेपी की राहें इस बार जुदा होने की वजह से भी आगामी चुनावों में क्या समीकरण बनेगा, यह देखना बेहद ही दिलचस्प होगा।
    जहां तक कैप्टन-सिद्घू के घटनाक्रम ने इतिहास को दोहराने का सवाल है। शायद, बहुत कम लोगों को साल 2015 का घटनाक्रम याद हो। जब यहां कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कई विधायकों का समर्थन लेकर कांग्रेस हाई कमान पर दबाव बनाया था और प्रताप सिंह बाजवा को पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटवा कर पार्टी की कमान अपने हाथों में ली थी, आज नवजोत सिंह सिद्घू ने भी वही किया। यानि उसी इतिहास को दोहराया है। आलाकमान से सिद्घू को हरी झंडी मिलने के बाद विधायकों और संभावित उम्मीदवारों को ये लगने लगा है कि सिद्घू उन्हें 2022 के विधानसभा चुनावों में अपनी सीट जीतने में मदद कर सकते हैं, यही वजह है कि जो कल तक कैप्टन को सलाम किया करते थे, आज वे नवजोत सिह सिद्घू के साथ मिलकर ‘आगामी रणनीति का फलसफां लिख रहे’ हैं। 2015 में भी ठीक ऐसा ही हुआ था, तब भी विधायकों का मानना था कि उन्हें जीत की ओर अमरिंदर सिंह ही ले जा सकते हैं न कि प्रताप सिंह बाजवा। आलम यह था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को पार्टी विधायकों और अन्य वरिष्ठ नेताओं से इतना समर्थन प्राप्त हुआ कि बाजवा अलग-थलग पड़ गए थे और आलाकमान को उन्हें बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
    ऐसे में, क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह आलाकमान के इस फैसले को इसी तरह स्वीकार करेंगे, या फिर वह कुछ और बड़ी सियासत को लेकर सामने आएंगे। क्योंकि हमें 2015 की तरह 2017 के घटनाक्रम को भी नहीं भूलना चाहिए, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह सिह इज किंग बनकर उभरे थे। लिहाजा, इस बार भले ही अपनी पार्टी में कैप्टन की ना चली हो, लेकिन इसी कैप्टन ने कांग्रेस को 5 साल पहले ऐसे मौके पर पंजाब में सत्ता दिलाई थी, जब यूपी समेत कई राज्यों में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था। कुल मिलाकर, 2017 के इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के उभार के बीच बड़ी जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने कैप्टन के नेतृत्व में 117 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 77 सीटों पर जीत का परचम लहराया था। पार्टी को 38.5 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। संगठन के दिग्गज खासकर पार्टी प्रधानों से हमेशा से ही कैप्टन का 36 का आंकड़ा रहा है। बावजूद इसके 41 साल के अपने राजनीतिक सफर में पहले भी वह कई मुश्किल दौर से उबर चुके हैं, ऐसे में, सिद्घू को प्रदेश की कमान सौंपने के साथ ही कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब में दूसरी पारी खेल पाएंगे ? क्या वह इस बार भी पिछला करिश्मा दोहरा पाएंगे ? यह सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

     

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