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    …. कि, बलम भी इतने बेदर्द होंगे!

    Devanand SinghBy Devanand SinghMay 8, 2021No Comments3 Mins Read
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    …. कि, बलम भी इतने बेदर्द होंगे!

    अजित राय

    किसी भी प्रकार की आपदा-विपदा किसी को बताकर नहीं आती। पर, जब हम एक झटके पहले ही खा चुके हों, और दूसरे की दस्तक देने की खबर हमारें कानों तक पहुंचा दी गई हो, और तब भी, हम उससे मचने वाली तबाही से बेखबर हो, अपनी ही मस्तानी चाल और तानाशाही जिद के साथ चलने पर आमादा हों, तो इसे भूल तो नहीं ही कहा जा सकता! और इसके बाद, अगर किसी तरह की तबाही मचती है, और लाखों लोगों की जिंदगी श्मशान में जलकर राखों में तब्दील हो जाती है, और लाखों लोगों की जिंदगी श्मशान में जलकर राख में तब्दील होने को अपनी बारी आने का इंतजार कर रही हो, तो इसे ‘ईश्वरीय आपदा’ का परिणाम तो नहीं ही कहा जा सकता…? ऐसे में, इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया, किसे दोषी ठहराया जाए, यह आज के समय अपने आप में एक बड़ा सवाल है। है न..?
    आज देश के अंदर प्रतिदिन कोरोना संक्रमितों के नए मामले जिस तीव्रता के साथ, अपने पिछले दिन के ही आंकड़े को ध्वस्त करते हुए, नित्य नए आंकड़े दर्ज कराते जा रहे हैं, वह देश के ही जनमानस पर गहरा असर नहीं छोड़ रहा, बल्कि विश्व जनमानस को भी चिंता में डाल दिया है। और, उसी का नतीजा है कि यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक ‘हेनरिटा फोर’ ने भारत में कोविड 19 की भयावह होती जा रही स्थिति को पूरी विश्व बिरादरी के लिए अति चिंतनीय करार दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने पूरी विश्व बिरादरी से भारत में कोविड 19 की भयावह स्थिति को चुनौती स्वरूप स्वीकार करने की अपील भी कर डाली है। न ही, तो परिणाम बेहद खतरनाक होने की भविष्यवाणी तक कर डाली है।
    आज हमारा पूरा देश ही इस कोविड के लपेटे में है। शहर-दर-शहर से लेकर गांव- दर-गांव तक। वो भी इस कदर कि कब, कौन अपना हमसे अपना हाथ छुड़ा इस दुनिया को अलविदा कह दे, और हम उसके लिए कुछ करने की बजाय, देखते ही रहने को विवश हो जाएं, कहना बड़ा मुश्किल है। जबकि, हमारे देश के कर्तव्यनिष्ठ वायरस वैज्ञानिकों ने, इस आपदा की दूसरी लहर के प्रति समय रहते ही, देश के सियासी जमात के शिखर नेता को आगाह कर दिया था, पर उन्होंने हमारे कर्तव्यनिष्ठ विज्ञानियों की सलाह और संकेत को तवज्जो देना क्यों नहीं उचित समझा, यह समझ से परे है! और आज, आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसे कठिन में वे मन की बात तो करते हैं, पर अपनी करतूतों पर शर्म करना तो दूर, एक बार ‘ओफ..’, तक नहीं करते….!!
    ऐसे में, एक सवाल तो शिद्दत से उठता ही है कि इससे निपटने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, वे इस काबिल हैं भी या नहीं?

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