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    Home » बाहरी प्रत्याशियों के आ टपकने से असंतोष का शिकार होते रहे हैं बछवाड़ा के एनडीए कार्यकर्ता
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    बाहरी प्रत्याशियों के आ टपकने से असंतोष का शिकार होते रहे हैं बछवाड़ा के एनडीए कार्यकर्ता

    Devanand SinghBy Devanand SinghSeptember 25, 2020No Comments5 Mins Read
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    बाहरी प्रत्याशियों के आ टपकने से असंतोष का शिकार होते रहे हैं बछवाड़ा के एनडीए कार्यकर्ता

    राकेश यादव:-
    बछवाड़ा, बेगूसराय:-
    बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कयी मायनों में बेगूसराय जिले का बछवाड़ा सीट अहम माना जा रहा है। अहम इस लिए भी कि यहां के स्थानीय रणबांकुरों की प्रतिष्ठा तो दांव पर लगी रहती हीं है, साथ हीं कयी बड़े घराने एवं दिग्गजों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी होती है। उल्लेखनीय है कि अभी पार्टियों का आपसी तालमेल व गठबंधन ठिक ढंग से तय भी नहीं हुआ है, मगर मौके की नजाकत देख टिकटों की आपाधापी व पटना की भाग-दौड़ बढ़ी हुई है।

     

    विभिन्न दलों के नेताओं नें अपनी-अपनी पार्टी आलाकमान के कार्यालयों में अपनी-अपनी जीत के गणितीय सूत्र के साथ वायोडाटा पेश करने दौर भी बदस्तूर जारी है। मगर आज हम सिर्फ एनडीए और उसके घटक दलों के बारे में विस्तार से चर्चा करने वाले हैं। जैसा हम सभी को मालूम है कि एनडीए गठबंधन के घटक दलों में मुख्य रूप से भाजपा, जदयू और लोजपा समेत कई अन्य छोटे-छोटे दलों को मिलाकर एनडीए बनाया गया है। इस एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की पुर्व के अपेक्षा बछवाड़ा में संगठनात्मक स्थिति अब बेहतर है। ये बात अलग है कि यहां के स्थानीय कार्यकर्ताओं के बदौलत हीं सांगठनिक ढांचा मजबूत हो सका है।

     

    मगर बछवाड़ा विधानसभा के बाहर से आ टपके कथित उम्मीदवार के कारण हीं स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। स्थानीय दावेदारों में प्रभाकर कुमार राय के नामों की चर्चा भी जोरों पर है। श्री राय भाजपा के बहुत पुराने कार्यकर्ता तो नहीं हैं। मगर दलगत राजनीति में स्थानीय सांसद व फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह के काफी नजदीक तो हैं हीं, पटना से दिल्ली तक की दौड़ लगा कर पार्टी बड़े-बड़े नेताओं पर मजबूत पैठ भी बना ली है। लम्बे अरसे तक पत्रकारिता में समय गुजारने के कारण साफ-सुथरी छवि के कार्यकर्ता के रूप में गिने जाते हैं। सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों के साथ धार्मिक आयोजनों में भी इनकी खास रूचि रहती है। पिछड़ा,अति पिछड़ा बाहुल्य क्षेत्र होने के गणितीय सूत्र के साथ भाजपा मंडल अध्यक्ष बासुकी शर्मा भी अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। पार्टी के अंदर और बाहर भी बेबाकी से पेश आने वाले नेता के रूप उनकी विशेष चर्चा रहती है।

    सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ विभागीय अधिकारियों से दो-दो हाथ करते रहने के कारण भी चर्चा में बने रहते हैं। ये अति पिछड़ा वर्ग के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। ये पुर्व में झारखंड भाजपा में भी अपनी भुमिका निभा चुके हैं। जबकि मंसूरचक प्रखंड के गोविंदपुर दो पंचायत में लगातार तीसरी मर्तवा रिकॉर्ड मतों से मुखिया पद को सुशोभित करने वाले सुधीर कुमार राय उर्फ मुन्ना के नाम की चर्चा भी सोशल मीडिया पर बनी रहती है। मुखिया पद से सीधे विधायक की विधायक पद की दावेदारी पेश करने वाले ये पहले मुखिया नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि भुमिहार बाहुल्य तेघरा विधानसभा क्षेत्र में मोदी लहर के बीच मुखिया ललन कुंवर सीधे विधायक पद को सुशोभित कर दिखाया था। आठ पंचायतों से बने मंसूरचक प्रखंड में श्री मुन्ना नें अच्छा खासा पहचान बना रखी है। भगवानपुर प्रखंड से जिला पार्षद रह चुके बलराम सिंह पुर्व में भी कयी मर्तवा अपनी दावेदारी पेश करते आए हैं। मगर पार्टी टिकट अक्सर बाहरी प्रत्याशी झपट कर मैदान आ टपकने के स्थानीय कार्यकर्ताओं की हकमारी होती रही है। इसी सीट पर भाजपा के कद्दावर नेता एवं पूर्व मंत्री स्व० भोला सिंह की पुत्रवधू वंदना सिंह भी दावेदारी व उम्मीदवारी पेश करती रहती हैं। पुर्व चुनावों में इन्हे मुंह की खानी तो पड़ी हीं सम्मानजनक स्कोर भी नहीं हासिल कर सकी। बछवाड़ा से इनकी दावेदारी का कोई मजबूत आधार नहीं है। वह अपने ससुर स्व सिंह के नाम को भुनाने का महज़ प्रयास करती रहती हैं। बाहरी प्रत्याशियों के आ टपकने के कारण दलगत
    स्थिति पुर्व के दिनों में भी चरमराती रही है।
    अगर हम लोजपा की बात करें तो अमूमन लोजपा कार्यकर्ता भी भाजपा कार्यकर्ताओं के तर्ज पर बाहरी प्रत्याशियों के कारण असंतोष का शिकार होती रही है। लोक जनशक्ति पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं में विनय कुमार सिंह को छोड़कर कोई दुसरा दावेदार नहीं है। लोजपा के स्थापना काल से ही श्री सिंह बछवाड़ा, मंसूरचक व भगवानपुर प्रखंड के विभिन्न पंचायतों में जाकर पार्टी को जिवंतता प्रदान किया है। श्री सिंह बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के भगवानपुर प्रखंड के रहने वाले हैं। पानी के लिए पानी पानी होने का समय अग्निकांड हो अथवा पानी से पानी पानी होने का समय बाढ़ समेत दुःख की बात घड़ी में पीड़ितों के बीच स्वत: उपस्थिति दर्ज कराने वाले नेता के रूप उनकी विशेष पहचान है। राजनीतिक स्थिति परिस्थिति व गठबंधन के दंश के कारण भले हीं उनकी पत्नी मीना देवी को पिछले एक चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। मगर फिर भी दलिय कार्यकर्ताओं का भरपूर समर्थन हासिल किया था। इसके बाद गांव मुहल्ले में घुमघुम कर संगठनिक विस्तार करने की ठान ली, और किया भी। नतीजतन आज बछवाड़ा लोजपा संगठन देखने लायक है। बावजूद इसके वर्ष 2015 में इन्हे पार्टी नें टिकट नहीं दिया। सिर्फ टिकट के लोभ में हीं पार्टी जॉइन करने वाले व्यक्ति ने टिकट झपट लिया। बस फिर क्या था सभी प्रखंड अध्यक्ष समेत पार्टी के अधिकारी व कार्यकर्ताओं में उथल-पुथल का माहौल उत्पन्न हो गया। कार्यकर्ताओं के दबाव में विनय कुमार सिंह निर्दलीय हीं चुनाव मैदान में आ धमके। तब पुर्व सांसद सुरजभान सिंह विनय कुमार सिंह के घर पहुंच कर काफी मान-मनौव्वल करने का प्रयास किया था। मौका ए वारदात तीनों प्रखंडों के पार्टी अधिकारी व कार्यकर्ताओं नें वहां पहुंच कर नारेबाजी करने लगे थे।नतीजतन दलिय व निर्दलीय दोनों प्रत्याशी चुनाव हार गए। अब एक बार फिर लोजपा से
    पुुुुर्व जिला परिषद अध्यक्ष इन्दिरा देवी के नाम की चर्चा जोरों पर है। पुर्व के परिघटनाओं के आधार पर शायद इन्हें भी बाहरी प्रत्याशी कहलाने का तगमा हाथ लगे। पर इतना तो तय है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना पनपने से कोई रोक नहीं पा आएगा।

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