
लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
आदिवासी कार्यकर्ता निशा भगत पंचतत्व में विलीन, न्याय की मांग को लेकर झारखंड में उबाल; सीबीआई जांच की मांग तेज। हाल ही में झारखंड के गुमला जिले से एक अत्यंत दुखद और हृदय विदारक खबर सामने आई है, जिसने पूरे राज्य के आदिवासी समाज को झकझोर कर रख दिया है। आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता निशा कुमारी भगत का शनिवार को उनके पैतृक गांव उरु में पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनके पिता हांडू भगत ने नम आंखों से चिता को मुखाग्नि दी, जिससे वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।
आदिवासी कार्यकर्ता निशा भगत की दुखद मृत्यु और सीबीआई जांच की मांग
निशा भगत के अंतिम संस्कार से पूर्व गुमला के टावर चौक पर आदिवासी समुदाय के सैकड़ों लोगों ने एकत्रित होकर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और मांग की कि निशा भगत की संदिग्ध मौत के मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा की जानी चाहिए। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि निशा की मौत के पीछे बड़ी साजिश है, जिसे केवल एक उच्च स्तरीय जांच से ही उजागर किया जा सकता है।
अपनी मृत्यु से ठीक पहले, निशा भगत ने फेसबुक लाइव के माध्यम से हेमंत सोरेन सरकार और स्थानीय भूमाफियाओं पर गंभीर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। उन्होंने बताया था कि किस प्रकार आदिवासियों की जमीनों को अवैध रूप से कब्जा करने की कोशिश की जा रही है और उन्हें परेशान किया जा रहा है। उनकी ये बातें अब झारखंड के विभिन्न हिस्सों में विरोध की चिंगारी बनकर फैल चुकी हैं। भाजपा के दिग्गज नेताओं ने भी इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरा है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि निशा आदिवासियों की जमीन पर अवैध कब्जे और धर्मांतरण के खिलाफ मुखर थीं, जिसकी वजह से उन्हें न्याय से वंचित रखा गया।
पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास, मधु कोड़ा, बाबूलाल मरांडी और झामुमो विधायक भूषण तिर्की सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। विधायक भूषण तिर्की ने इस घटना को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और पीड़ित परिवार को हर संभव न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। इसके अतिरिक्त, सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल भाकपा (माले) लिबरेशन ने भी राज्य में बढ़ती आपराधिक गतिविधियों और आदिवासी अधिकारों के हनन पर चिंता जताते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग का समर्थन किया है। झारखंड में अब निशा भगत की मौत को लेकर आदिवासी समाज में भारी आक्रोश व्याप्त है और जिम्मेदार दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।
आम जनता का कहना है कि अगर सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस तरह डराया-धमकाया जाएगा, तो न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? राज्य प्रशासन पर अब मामले को जल्द से जल्द सुलझाने और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने का भारी दबाव है। आदिवासी समाज का कहना है कि निशा की शहादत बेकार नहीं जाएगी और वे तब तक अपना आंदोलन जारी रखेंगे जब तक उन्हें सीबीआई जांच के रूप में न्याय नहीं मिल जाता। सरकार की चुप्पी ने इस मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में और भी बड़े बदलाव ला सकता है।

