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    Home » दयालु मन का पुरस्कार
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    दयालु मन का पुरस्कार

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 30, 2026No Comments3 Mins Read
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    दयालु मन का पुरस्कार
    ———————

    पुराने समय की बात है, तब का समय आज जैसा नहीं था। एक छोटे से गाँव में दो भाई और एक बहन रहते थे। उनमें से बड़ा भाई छोटे भाई के साथ बहुत बुरा व्यवहार करता था और हर बात पर उसे डाँपता-फटकारता था। यहाँ तक कि वह छोटे भाई को हमेशा खाने-पीने और पहनने के कपड़ों से भी वंचित रखता था।
    एक दिन बड़ा भाई कुछ लकड़ियाँ बाज़ार में बेचने के उद्देश्य से जंगल में लकड़ी काटने गया। जब वह एक पेड़ से कुछ डालियाँ काटने लगा, तो अचानक उस पेड़ ने इंसानों की तरह आवाज़ लगाई। पेड़ ने उससे कहा— “हे महाशय, कृपा करके हमारे पेड़ की डालियों को मत काटिए। यदि आप मुझे नहीं काटेंगे, तो मैं आपको एक सोने का आम दूँगा।”
    बड़ा भाई इसके लिए मान गया, लेकिन पेड़ से उसे किसी भी प्रकार का सोने का आम नहीं मिला। वह निराश हो गया और गुस्से में पेड़ को धमकाते हुए कहा कि यदि पेड़ ने जल्दी ही सोने का आम नहीं दिया, तो वह पूरे पेड़ को काट डालेगा।
    ऐसा कहने के थोड़ी ही देर बाद, पेड़ की डालियों से छोटे-छोटे पत्थर उसके शरीर पर गिरने लगे। उस समय सूरज ढलने का समय हो रहा था। शरीर पर पत्थर गिरने से बड़े भाई के शरीर से खून बहने लगा। उसके बाद असहनीय दर्द के कारण वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
    शाम होते ही बड़ा भाई घर नहीं लौटा, यह देखकर छोटे भाई की चिंता बढ़ गई। वह भाई को ढूँढने के लिए जंगल की ओर निकल पड़ा। जंगल के बीच उसने बड़े भाई को क्षत-विक्षत शरीर में पड़े हुए देखा।
    छोटा भाई दौड़कर बड़े भाई के पास गया और उसका सिर अपनी गोद में उठा लिया तथा खून बहने वाले स्थानों को पोंछने लगा। आसपास ढूँढकर पास ही के कुछ औषधीय पौधों की पत्तियों से उसने शरीर के खून बहने वाले हिस्सों को बाँध दिया। थोड़ी देर बाद बड़े भाई को होश आ गया और उसने छोटे भाई को गले से लगा लिया। अपने पहले किए गए भूलों के लिए क्षमा माँगते हुए और कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उसने कहा— “आज तूने मुझे नया जीवन दिया है। मैं तेरे साथ कितना बुरा व्यवहार करता था! अब जाकर मुझे समझ आया है कि मेरी कितनी बड़ी भूल थी। भाई, मुझे माफ कर देना।”
    पेड़ भाई-कौंस की इन बातों को कान लगाकर सुन रहा था। बड़े भाई के मन में आए इस सच्चे बदलाव को देखकर, पेड़ ने उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें सोने का आम सौंप दिया। इसके बाद दोनों भाई खुशी-खुशी हँसते-मुस्कुराते हुए घर लौट आए।

    नैतिक शिक्षा: दयालु और क्षमाशील होना जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात है; क्योंकि सत्य और अच्छे गुणों के परिणाम स्वरूप समय हमेशा उचित पुरस्कार लेकर आता है।

    मूल आलेख: मनीषा शर्मा
    अनुवाद: रितेश शर्मा
    स्थान: असम, गुवाहाटी

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