शीपार संधान’ (जड़ों की तलाश)– मिट्टी, मनुष्य और आत्म-साक्षात्कार का एक व्यंजनामय दस्तावेज
“साहित्य केवल काल्पनिक मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह समाज का दर्पण और मानव मन की गहराइयों से सत्य की खोज है”—इस ध्रुव सत्य से आरंभ होने वाली उपन्यास ‘शीपार संधान’ की यह प्रस्तावना पाठकों के मन में गहरी जिज्ञासा और एक दार्शनिक प्रेरणा जगाती है।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, उपन्यासकार एवं समाजसेवी मनीषा शर्मा के इस नवीनतम क्षेत्र-आधारित (फील्ड रिसर्च) उपन्यास को असम के अग्रणी प्रकाशन ‘ज्योति प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित किया गया है। ग्रेटर नोएडा के सत्ताइस गाँवों की गोद में किए गए एक दीर्घकालिक क्षेत्र-अध्ययन और काल्पनिक कथा के सम्मिश्रण से निर्मित यह उपन्यास असमिया साहित्य जगत में एक अनूठा स्वाद लेकर आया है। असम से बाहर जाकर एक महिला द्वारा किए गए इस कठिन और साहसिक शोध-कार्य की सफलता इस पुस्तक के पन्नों में साफ झलकती है।
इस उपन्यास का सबसे सशक्त पहलू इसकी पृष्ठभूमि और इसका तुलनात्मक सामाजिक चित्रण है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल की कृषि-संस्कृति, ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट और मिट्टी के प्रति वहाँ के युवाओं के अदम्य गौरव को लेखिका ने अत्यंत जीवंत रूप में उभारा है। इसके विपरीत, असमिया समाज की ‘भद्रलोक संस्कृति’ और नौकरी-मुखी मानसिकता के बीच के अंतर को इंगित करते हुए उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक सत्य को उजागर किया है। यह तुलनात्मक समीक्षा पाठक को अपनी जड़ों और श्रम की गरिमा के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए बाध्य करती है।
इस उपन्यास को पढ़कर यह पूरी ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि यद्यपि इस ग्रंथ के ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भौगोलिक आयाम वास्तविक क्षेत्र-अध्ययन पर आधारित हैं, फिर भी इसे साहित्यिक रूप देने के लिए पात्रों (जैसे— मेघाली, परिणीता आदि) और कथा-प्रवाह को काल्पनिक रूप से गढ़ा गया है। यह पारदर्शिता इस पुस्तक की प्रामाणिकता और इसकी साहित्यिक सुंदरता दोनों को अक्षुण्ण रखती है।
मेघाली की यह यात्रा केवल कुछ आँकड़े या सूचनाएँ एकत्र करने का अभियान नहीं है, बल्कि यह अपनी पहचान और अपनी जड़ों को तलाशने की एक आध्यात्मिक खोज है। उत्तर प्रदेश की धूल भरी सड़कों से शुरू होने वाली यह यात्रा पाठक के मन में भी अपनी मातृभूमि और मिट्टी में जीवंत स्वाभिमान की अनुभूति को जगा देती है।
संक्षेप में कहें तो, ‘शीपार संधान’ की यह प्रस्तावना एक प्रभावशाली उपन्यास की सफल भूमिका प्रस्तुत करती है। यह पाठकों को केवल एक कहानी पढ़ने का आनंद ही नहीं देती, बल्कि अपनी मिट्टी, श्रम और स्वाभिमान के प्रति हमारे संकुचित दृष्टिकोण को बदलने के लिए एक वैचारिक चाबुक का काम करती है। यह उपन्यास असमिया पाठक समाज को निश्चित रूप से चिंतन की एक नई खुराक प्रदान करेगा।
लेखक, शिक्षक— नृपेन्द्र नाथ शर्मा बाक्सा जिला

