लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने पीस बॉन्ड कानून की समीक्षा की पुरजोर मांग उठाते हुए चेतावनी दी है कि इस ब्रिटिशकालीन प्रावधान का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था के नाम पर शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति की आवाज को कुचलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 126 के तहत शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र की कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन इसके लिए ठोस तथ्य, निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और पूर्ण निष्पक्षता अनिवार्य है।
पीस बॉन्ड कानून की समीक्षा: संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जरूरी
अधिवक्ता पप्पू ने कहा कि केवल विरोध करना या असहमति जताना शांति भंग होने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) का हवाला देते हुए बताया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार भारतीय लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभ हैं। किसी भी निवारक कार्रवाई को संवैधानिक अधिकारों और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप ही होना चाहिए, अन्यथा यह विधि के शासन का उल्लंघन होगा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्रिटिश शासनकाल में औपनिवेशिक हितों की रक्षा के लिए बनाए गए इन कानूनों का वर्तमान लोकतांत्रिक भारत में अंधाधुंध प्रयोग नागरिक स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के लागू होने के बाद भी धारा 126 के स्वरूप में व्यापक बदलाव की आवश्यकता बनी हुई है, ताकि प्रशासनिक मशीनरी को मनमानी शक्ति प्राप्त न हो सके।
इस संदर्भ में उन्होंने हाल ही में चर्चित नेहा बोरा के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करने का उनका निर्णय बिल्कुल सही और संवैधानिक मर्यादा के अनुकूल था। यह घटना दर्शाती है कि कैसे प्रशासनिक दबाव में नागरिकों से उनके मौलिक अधिकारों का त्याग करवाने का प्रयास किया जाता है। नागरिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और विधि का शासन सर्वोपरि होने चाहिए और इनसे कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
अधिवक्ता पप्पू ने मांग की कि संसद और विधि आयोग को पीस बॉन्ड व्यवस्था की समीक्षा कर आवश्यक विधायी सुधार अविलंब करने चाहिए। इसमें स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए कि किन परिस्थितियों में इस शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है और किन में नहीं। साथ ही, न्यायिक निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाए ताकि किसी भी नागरिक को प्रताड़ित करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग न हो सके।
उन्होंने कहा कि जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में जहां श्रमिक आंदोलन, सामाजिक कार्यकर्ताओं की गतिविधियां और नागरिक समाज के विरोध प्रदर्शन आम बात हैं, वहां इस कानून का भय दिखाकर लोकतांत्रिक स्पेस को सिकोड़ने का प्रयास बेहद चिंताजनक है। प्रशासन को चाहिए कि वह संवाद और संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर कानून-व्यवस्था कायम करे, न कि दंडात्मक प्रावधानों का भय दिखाकर असहमति को दबाए।
कानूनी जानकारों का मानना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 का आधिकारिक मसौदा संसद में पारित होने के बावजूद, निवारक निरोध और पीस बॉन्ड से जुड़े प्रावधानों में ब्रिटिशकालीन मानसिकता की झलक मिलती है। इसे दूर करने के लिए व्यापक जनचर्चा और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को शामिल किया जाना समय की मांग है।
अंत में अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कहा कि एक जिम्मेदार नागरिक और विधि के अधिकारी के नाते वे इस मुद्दे को उचित मंचों पर उठाते रहेंगे। उन्होंने नागरिक समाज, बार एसोसिएशन और मानवाधिकार संगठनों से अपील की कि वे पीस बॉन्ड कानून की समीक्षा के लिए एकजुट होकर आवाज बुलंद करें, ताकि लोकतंत्र की रक्षा के लिए बने कानून ही लोकतंत्र का गला घोंटने का औजार न बन जाएं।

