बिष्टुपुर की पत्थरबाजी: सियासत के शोर में दबते सवाल, जवाबदेही किसकी?
महिला सम्मान के नाम पर सियासी संग्राम, घायल भाजपा नेता की तस्वीर और हाथ में ईंट लिए कांग्रेस कार्यकर्ता की तस्वीर ने बढ़ाई बहस आरोप-प्रत्यारोप से आगे निष्पक्ष जांच जरूरी
देवानंद सिंह
जमशेदपुर के बिष्टुपुर में भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच हुए हंगामे ने एक बार फिर राजनीति में विरोध की मर्यादा और लोकतांत्रिक व्यवहार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा विधायक पूर्णिमा साहू ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि कांग्रेसियों ने सुनियोजित तरीके से भाजपा की महिला कार्यकर्ताओं पर पत्थरबाजी की, जिसमें दर्जनों कार्यकर्ता घायल हुए। उन्होंने इस घटना को निंदनीय बताते हुए कहा कि महिलाओं के हक, अधिकार और न्याय की आवाज उठाने वालों को डराने की कोशिश की जा रही है। अपने पोस्ट में उन्होंने यह भी लिखा—“सब याद रखा जाएगा।” लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कुछ तस्वीरें और कई अनुत्तरित सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मिल सकता।
भाजपा की पूर्व जिला अध्यक्ष दिनेश कुमार के सिर में चोट लगने की तस्वीर, एक कांग्रेस कार्यकर्ता के हाथ में ईंट दिखाई देने वाली तस्वीर और एक महिला भाजपा कार्यकर्ता को सहारा देकर ले जाते हुए विधायक पूर्णिमा साहू की तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। ये दृश्य घटना की गंभीरता की ओर ध्यान जरूर खींचते हैं, लेकिन किसी तस्वीर के आधार पर पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर तय नहीं की जा सकती। सवाल यह है कि विवाद की शुरुआत कैसे हुई, पथराव किस ओर से हुआ, किसने हिंसा को बढ़ावा दिया और मौके पर मौजूद लोगों की भूमिका क्या थी? इन प्रश्नों का जवाब निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही सामने आना चाहिए।
महिला सम्मान का मुद्दा राजनीति में महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल अपने पक्ष के समर्थन और दूसरे पक्ष को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं होना चाहिए। यदि महिला कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ है, तो यह गंभीर मामला है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी अन्य पक्ष के लोग भी घायल हुए हैं या उनके साथ मारपीट हुई है, तो उनकी शिकायतों की भी समान गंभीरता से जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में न्याय की कसौटी राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि तथ्य और कानून होने चाहिए।
इस घटना के बाद भाजपा की ओर से कांग्रेस पर सुनियोजित पत्थरबाजी का आरोप लगाया गया है। दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से भी घटना को लेकर अपना पक्ष सामने रखा गया है। ऐसे में किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होगा। यह पुलिस और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और घायलों की शिकायतों के आधार पर घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ी जाएं। यदि पत्थरबाजी या मारपीट की पुष्टि होती है, तो कार्रवाई राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर होनी चाहिए।
यह भी विचारणीय है कि राजनीतिक दलों के प्रदर्शन आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध करना हर राजनीतिक दल का अधिकार है। लेकिन विरोध के नाम पर यदि सड़क पर हिंसा, पत्थरबाजी या मारपीट की स्थिति बनती है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए चुनौती है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं को यह समझना होगा कि विचारों का संघर्ष और शारीरिक टकराव दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी विचारधारा का विरोध करने के लिए हिंसा का सहारा लेना उस विचारधारा को कमजोर नहीं करता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है।
विधायक पूर्णिमा साहू की पोस्ट में इस्तेमाल किए गए कड़े राजनीतिक शब्द और तस्वीरों के जरिए सामने आए दृश्य जनमानस में कई सवाल पैदा करते हैं। लेकिन “सब याद रखा जाएगा” जैसे संदेश के बजाय जनता यह जानना चाहेगी कि दोषियों की पहचान कैसे होगी और क्या सभी संबंधित पक्षों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी। राजनीतिक स्मृति और प्रतिशोध की भाषा से अधिक महत्वपूर्ण कानून का निष्पक्ष क्रियान्वयन है।
जमशेदपुर औद्योगिक और सामाजिक विविधता वाला शहर है। यहां राजनीतिक मतभेदों को हिंसक संघर्ष में बदलने देना किसी के हित में नहीं है। भाजपा हो या कांग्रेस, किसी भी दल को अपने कार्यकर्ताओं के आचरण की जिम्मेदारी से बचने का अधिकार नहीं है। महिला कार्यकर्ताओं की सुरक्षा, सार्वजनिक स्थलों पर शांति और राजनीतिक विरोध की मर्यादा सभी दलों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
बहरहाल बिष्टुपुर की घटना को राजनीतिक आरोपों की धुंध में खोने नहीं दिया जाना चाहिए। घायल लोगों को न्याय मिले, दोषियों की पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई हो। यदि किसी पक्ष ने हिंसा की शुरुआत की या उसे बढ़ावा दिया, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सवालों का जवाब नारेबाजी से नहीं, निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई से मिलता है। बिष्टुपुर की घटना में भी यही कसौटी अपनाई जानी चाहिए।

