जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के अमर नायक थे देवेंद्र माझी
*गोइलकेरा हाट मैदान में श्रद्धांजलि सभा आज*
मृत्युंजय बर्मन,
राष्ट्र संवाद संवाददाता,
जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले शहीद देवेंद्र माझी का जीवन साहस, जनजागरण और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण की मिसाल है। उन्होंने कोल्हान-पोड़ाहाट और सारंडा के सुदूर गांवों में आदिवासियों और मूलवासियों को संगठित कर उनके हक, सम्मान और बुनियादी सुविधाओं के सवाल को आंदोलन का स्वर दिया। 14 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर गोईलकेरा हाट मैदान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
15 सितंबर 1947 को गरीब आदिवासी किसान परिवार में जन्मे देवेंद्र माझी का बचपन संघर्षों में बीता। पांच वर्ष की उम्र में पिता जगत माझी का निधन हो गया। उनकी मां कुनी माझी ने कठिन परिस्थितियों में परिवार का पालन-पोषण किया। विद्यार्थी जीवन से ही अन्याय के खिलाफ मुखर रहे देवेंद्र माझी ने आगे चलकर अपना जीवन आदिवासी अधिकारों की लड़ाई को समर्पित कर दिया।
वर्ष 1969 में उन्होंने बीड़ी मजदूरों को संगठित कर कंपनियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। 1971 में गिरफ्तारी के बाद हजारीबाग जेल में उनकी मुलाकात शिबू सोरेन से हुई। जेल से निकलने के बाद उन्होंने जंगलों में खेती करने वाले आदिवासियों और मूलवासियों के जमीन पर अधिकार, विस्थापन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
गुवा गोलीकांड जैसी घटनाओं के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा। वे जंगल, जमीन और आदिवासी समाज की पहचान को एक-दूसरे से जुड़ा मानते थे। उनके लिए यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि स्वाभिमान, संस्कृति और सामाजिक समानता की भी थी।
14 अक्टूबर 1994 को गोईलकेरा हाट बाजार में उनकी हत्या कर दी गई। उनके निधन से आंदोलन को बड़ा झटका लगा, लेकिन उनके उठाए सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। देवेंद्र माझी की पुण्यतिथि महज श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का दिन भी है कि जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकार तथा उनके विकास के सपने कितने पूरे हुए हैं।

