“हाँ, मन्या सुर्वे मेरे मामा का बेटा है!”
पंकज शुक्ला
“हाँ, मन्या सुर्वे मेरे मामा का बेटा है!”, नाना पाटेकर ने जब पहली बार ये स्वीकारोक्ति की थी तो मुंबई फ़िल्म जगत को जैसे साँप सूंघ गया था। गिनती के ही लोगों को तब तक पता था कि नाना पाटेकर और मन्या सुर्वे बचपन में साथ साथ खेले हैं। वही मन्या सुर्वे जिसके नाम से बंबई का अंडरवर्ल्ड काँपता था।
और, यही एक वजह रही कि नाना पाटेकर की परवरिश मुंबई की बजाय मुरुड में हुई। उनकी माँ निर्मला नहीं चाहती थीं कि बेटा भी अपने ननिहाल के माहौल में पले-बढ़े। और, नाना पाटेकर की कहानी फ़िल्मों से नहीं, उनकी माँ से ही शुरू होती है। ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ की आज की कड़ी विश्वनाथ पाटेकर उर्फ़ नाना पाटेकर की शख़्सीयत के कुछ ऐसे ही अनजान पहलुओं को समर्पित है।
“I have learnt acting from her. I have learnt everything from my mother.” अपनी माँ निर्मला के बारे में नाना का यह वाक्य जितना छोटा है, उसके पीछे उतनी ही बड़ी ज़िंदगी है। अपने पाँच बच्चों को खो देने वाली माँ का दिल कितना रोया होगा। अपने सामने ही माता-पिता को खोया, पति को खोया और अपने भाई का सरेआम एनकाउँटर भी…!
नाना के लिए वह सिर्फ़ घर की मुखिया नहीं थीं। वह जीवन को देखने का उनका पहला ढंग थीं। नाना का जन्म विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ। पिता गजानंद पाटेकर कपड़े के कारोबार से जुड़े थे और मुंबई में रहते थे। नाना और उनके भाई अशोक व दिलीप मुरुड में माँ के साथ बड़े हुए। माँ की एक सहेली उन्हें नाना कहकर पुकारती थीं और बाद में यही उनका लोकप्रिय नाम हो गया।
छुट्टियों में बच्चे मुंबई आते और पिता के साथ समय बिताते। इस दूरी ने बचपन में पिता को उनके लिए एक ऐसे आदमी की तरह बना दिया था, जो अपना था, मगर हर समय पास नहीं था। बचपन की दूसरी चोट आर्थिक नहीं, भीतर की थी। दोनों भाई उनसे गोरे थे और नाना अपने रंग को लेकर हीनभावना से घिरे रहते।
उन्होंने याद भी किया था कि उनकी माँ पड़ोस की एक बच्ची से पूछती थीं कि वह दिलीप से शादी करेगी या नाना से। बच्ची हर बार दिलीप की ओर इशारा करती। वजह पूछने पर कहती, नाना काले हैं। एक बच्चे का आत्मविश्वास तोड़ने के लिए ये बहुत ज़्यादा था।
स्कूल के दिनों में नाना ने नाटकों में काम करना शुरू किया। पहला बड़ा नाटक देखने उनके पिता मुंबई से मुरुड आए। नाना के पिता ख़ुद तमाशा, नाटक और सिनेमा के शौक़ीन थे। एक बार नाना ने नाटक ‘वाल्मीकि” में अभिनय किया। विजयाबाई मेहता के पास ही बैठे थे उनके पिता और उन्होंने नाना के पिता से कहा, “नाना मेरा बेटा है।” पिता क्या ही करता, उसने बहुत शांत ढंग से जवाब दिया, “सौभाग्य देखिए, ये मेरा भी बेटा है।”
‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ नियमित पढ़ने वालों में से कइयों को पता होगा कि किशोरावस्था में नाना ने फ़िल्मों के पोस्टर रंगे। विज्ञापन एजेंसी में काम किया, मगर थिएटर के लिए नौकरी छोड़ दी। उन्हें पता था कि मंच उन्हें पहचान दे सकता है, पैसा नहीं। पिता के इलाज के लिए पैसे तक जुटाना मुश्किल था। दवाइयों का खर्च निकालने के लिए उन्हें नाटक करने पड़ते थे। और जब पिता की मृत्यु हुई, तब भी महासागर के तीन शो उनके सामने थे।
नाना के मुताबिक़, पिता की देह घर में थी, अंतिम संस्कार होना बाकी था और वह मंच पर चले गए। विक्रम गोखले उस स्थिति से परिचित थे। जिस संवाद में उन्हें नाना से उनके पिता के बारे में पूछना था, उसे पूछते हुए उन्हें संकोच हो रहा था क्योंकि नाना अपनी पिता की देह घर छोड़कर वह शो करने आए थे।
फिर, नाना के जीवन में नीलकांति आईं। नीलकांति रंगमंच अभिनेत्री थीं और बैंक में नौकरी करती थीं। 1978 में दोनों ने शादी की। नाना को एक शो के लगभग 50 से 75 रुपये मिलते थे, जबकि नीलकांति की बैंक की नौकरी से लगभग 2,500 रुपये महीना आता था। जब नाना ने विज्ञापन की नौकरी छोड़कर पूरी तरह थिएटर को अपनाने का फैसला किया, तो नीलकांति ने उन्हें आर्थिक सुरक्षा दी।

नाना ने कहा भी कि वह जो कुछ हैं, उसमें नीलकांति का बड़ा योगदान है। लेकिन सफलता आने से पहले उनके जीवन में एक ऐसा दुख आया जिसका असर शायद उम्र भर रहा। उनका पहला बेटा दुर्वासा जन्म से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा था। वह ढाई साल का था जब उसकी मृत्यु हो गई।
वर्षों बाद नाना ने इस बारे में जो स्वीकार किया, वह उनकी निजी ज़िंदगी की सबसे कठोर आत्मस्वीकृतियों में से एक है। उन्होंने माना कि बच्चे की हालत से परेशान होने के साथ-साथ उनके मन में यह डर भी रहता था कि लोग उनके बेटे को देखकर क्या कहेंगे? बाद में उन्हें लगा कि उस समय उन्हें दुनिया की नज़र नहीं, अपने बच्चे का दर्द देखना चाहिए था।
दुर्वासा की मृत्यु के बाद नाना ने ख़ुद को धुएँ में डुबो दिया। उन्होंने बताया था कि वह एक दिन में लगभग 60 सिगरेट पीने लगे थे। फिर उनकी बहन ने उन्हें लगातार खाँसते देखा और एक ऐसा सवाल किया जिसने उनकी आदत छुड़ा दी। वह ख़ुद अपना इकलौता बेटा खो चुकी थीं।
नाना के दूसरे बेटे मल्हार ने पिता की तरह अभिनेता बनने के बजाय सिनेमा के दूसरे हिस्से को चुना। नाना ने बताया था कि उसने न्यूयॉर्क में सिनेमैटोग्राफी और निर्देशन की पढ़ाई की। पिता उसे अपनी छाया में अभिनेता बनाना नहीं चाहते थे। वह चाहते थे कि बेटा अपना रास्ता ख़ुद चुने। दोनों के रिश्ते में दोस्ती भी थी और पिता का दबदबा भी।
नाना और नीलकांति का रिश्ता भी समय के साथ बदलता गया। दोनों अलग रहने लगे, लेकिन तलाक नहीं लिया। नाना ने कहा था कि उनके बीच मतभेद हैं, इसलिए वे साथ नहीं रहते, लेकिन एक-दूसरे की परवाह करते हैं। नीलकांति, मल्हार और नाना की माँ साथ रहते रहे, और नाना अलग।
इसी दौर में फ़िल्म ‘ख़ामोशी: द म्यूज़िकल’ की शूटिंग के दौरान मनीषा कोइराला नाना के क़रीब आईं। नाना ने ख़ुद स्वीकार किया था कि दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता बना था और मनीषा उनकी माँ और बेटे से भी मिलती भी थीं। बाद में यह रिश्ता आगे नहीं चला, लेकिन नाना ने मनीषा के प्रति सम्मान बनाए रखा।
नाना की माँ निर्मला का निधन जनवरी 2019 में 99 वर्ष की उम्र में हुआ। और, तब से उनके लिए परिवार का मतलब बस उनका बेटा मल्हार ही रह गया था। नाना पाटेकर का इंटरव्यू करना हो, उनसे बात करनी हो, हर काम बरसों तक मल्हार के ज़रिये ही हुआ।
दुर्वासा ढाई साल की उम्र में चला गया था। मल्हार ने पिता के साथ चार दशक से अधिक की ज़िंदगी देखी और दुनिया को उनके जाने की ख़बर भी उसी ने दी। इन दोनों बेटों के बीच नाना की पूरी पितृत्व-कथा दिखाई देती है।
नाना पाटेकर को याद करते हुए उनके किरदारों की लंबी सूची गिनाना आसान है। ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘प्रतिघात’, ‘क्रांतिवीर’, ‘ख़ामोशी’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’ जैसी फ़िल्मों में उनके ऐसे इंसानों के हैं जो भीतर से घायल हैं और बाहर से लड़ रहे हैं। नाना की अपनी ज़िंदगी में भी लड़ाई बाहर से कम, भीतर से ज़्यादा थी।
नाना ने नाम फाउंडेशन के ज़रिये महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित किसानों के लिए बहुत काम किया। फ़िल्म ‘प्रहार’ के निर्देशन व इसमें अभिनय से पहले उन्होंने बाक़ायदा भारतीय सेना के साथ रहकर कमांडो ट्रेनिंग ली। और, इस ट्रेनिंग का उपयोग उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस की अनुमति से क्विक रिएक्शन टीम (क्यूआरटी) में शामिल होकर किया।
दुनिया ने उनके अभिनय में ग़ुस्सा देखा। लेकिन उस ग़ुस्से के पीछे शायद एक ऐसा इंसान था, जो पूरी उम्र अपने अतीत से हिसाब करता रहा। और उस हिसाब की सबसे बड़ी गवाही कोई फ़िल्म नहीं, उनका अपना जीवन था..जै जै!

