डिजिटल दुनिया में भरोसा ही सबसे बड़ा सवाल
देवानंद सिंह
साइबर अपराध और डीपफेक के खिलाफ वैश्विक तंत्र अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता
तकनीक ने दुनिया को जितना करीब ला दिया है, अपराध को भी उतना ही सीमाहीन बना दिया है। आज ठगी करने वाला किसी दूसरे देश में बैठकर भारत के किसी नागरिक का बैंक खाता खाली कर सकता है। फर्जी पहचान, नकली वेबसाइट, डिजिटल गिरफ्तारी, फर्जी निवेश और अब डीपफेक साइबर अपराध का चेहरा लगातार बदल रहा है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक साइबर सुरक्षा ढांचा बनाने का आह्वान बेहद महत्वपूर्ण है।
सवाल केवल यह नहीं है कि साइबर अपराधी कितने शातिर हो गए हैं। असली सवाल यह है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था उनसे कितनी तेज है?
इंटरनेट की दुनिया में अपराधी को सीमा पार करने के लिए पासपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ती। एक देश में बैठा व्यक्ति दूसरे देश के नेटवर्क और तीसरे देश के खाते का इस्तेमाल करके अपराध कर सकता है। ऐसे में केवल राष्ट्रीय कानूनों के भरोसे इस चुनौती से निपटना संभव नहीं। दुनिया को साइबर अपराध के खिलाफ उसी तरह साझा रणनीति बनानी होगी, जैसे आतंकवाद, मादक पदार्थों और संगठित अपराध के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित किया गया है।
कल तक फर्जी खबर पहचानना कठिन था, आज फर्जी वीडियो और नकली आवाज को पहचानना भी आम आदमी के लिए मुश्किल होता जा रहा है। किसी नेता की नकली आवाज में बयान, किसी अधिकारी का फर्जी वीडियो या किसी रिश्तेदार की आवाज में मदद के नाम पर फोन यह तकनीक यदि अपराधियों के हाथ में बेलगाम रही तो समाज में केवल आर्थिक नुकसान नहीं होगा, बल्कि विश्वास का संकट पैदा होगा।
लोकतंत्र की बुनियाद ही विश्वास पर टिकी है। यदि नागरिक को यह भरोसा न रहे कि उसने जो देखा वह सच है, जो सुना वह वास्तविक है और जो संदेश आया वह असली है, तो सूचना का पूरा तंत्र संदिग्ध हो जाएगा।
प्रधानमंत्री ने ठीक कहा कि तकनीक का विस्तार तभी संभव है जब उस पर भरोसा कायम हो। भारत ने डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है। करोड़ों लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे उनके खातों तक पहुंचा है। बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और सरकारी धन की लीकेज रोकने में डिजिटल व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लेकिन डिजिटल व्यवस्था का विस्तार जितना बड़ा होगा, उसके खिलाफ साजिश की संभावना भी उतनी ही बड़ी होगी।
इसलिए अब सरकार की प्राथमिकता केवल डिजिटल विस्तार नहीं, बल्कि डिजिटल सुरक्षा भी होनी चाहिए।
सरकार, बैंक, टेलीकॉम कंपनियां, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और टेक्नोलॉजी कंपनियां यदि अपनी-अपनी दीवारों के भीतर काम करती रहीं तो साइबर अपराधी हमेशा एक कदम आगे रहेंगे। संदिग्ध लेन-देन की सूचना तत्काल साझा हो, फर्जी नंबर और खातों पर तेजी से कार्रवाई हो, डीपफेक की पहचान के लिए साझा तकनीक विकसित हो और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के बीच डिजिटल साक्ष्यों का आदान-प्रदान आसान बनाया जाए तभी प्रभावी परिणाम संभव होगा।
साथ ही नागरिकों को भी डिजिटल सुरक्षा का प्रशिक्षण देना होगा। हर ओटीपी, हर लिंक और हर वीडियो पर आंख मूंदकर भरोसा करना अब खतरनाक है। डिजिटल साक्षरता को केवल पढ़ना-लिखना जानने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अब नागरिक को यह भी सिखाना होगा कि डिजिटल धोखे को पहचाना कैसे जाए।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल निजता का है। नागरिक का डेटा किसके पास है, उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है और उसके दुरुपयोग की स्थिति में जवाबदेह कौन होगा—इन सवालों के जवाब स्पष्ट होने चाहिए। डिजिटल विकास के नाम पर नागरिक की निजता से समझौता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
भारत के पास इस क्षेत्र में दुनिया को नेतृत्व देने का अवसर है। लेकिन नेतृत्व केवल इंडिया मोबाइल कांग्रेस में वैश्विक ढांचे का आह्वान करने से नहीं मिलेगा। इसके लिए भारत को ठोस अंतरराष्ट्रीय पहल करनी होगी और ऐसा तंत्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा, जहां अपराधी की भौगोलिक सीमा चाहे जो हो, कानून की पहुंच उससे आगे हो।
तकनीक की रफ्तार को रोकना समाधान नहीं है। उसे सुरक्षित बनाना समाधान है।
5जी से 6जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से क्वांटम तकनीक तक दुनिया आगे बढ़ेगी। लेकिन इस पूरी यात्रा में यदि नागरिक का भरोसा पीछे छूट गया तो विकास खोखला साबित होगा।
आज जरूरत केवल स्मार्ट फोन और तेज नेटवर्क की नहीं है। जरूरत है स्मार्ट सुरक्षा, विश्वसनीय सूचना और जवाबदेह डिजिटल व्यवस्था की।
क्योंकि आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि तकनीक कितनी शक्तिशाली है।
सवाल यह होगा उस तकनीक पर भरोसा कितना किया जा सकता है?

