छोटे सरकार की बगावत: मोकामा में किसका खेल, किसका हिसाब?
राष्ट्र संवाद डेस्क
मोकामा की राजनीति में अनंत सिंह की खुली बगावत ने बिहार के सियासी गलियारों में एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ खुलकर प्रचार करना, विरोधी प्रत्याशी के नामांकन में पहुंचना और रोड शो तक करना महज नाराजगी नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी है। सवाल यह है कि इतनी खुली चुनौती के पीछे सिर्फ व्यक्तिगत हिसाब-किताब है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक गणित काम कर रहा है?
अनंत सिंह बिहार की राजनीति में कोई सामान्य राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। मोकामा में उनका प्रभाव और सामाजिक पकड़ लंबे समय से चर्चा में रही है। ऐसे में उनकी बगावत का सीधा असर केवल एक विधानसभा सीट पर नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर के समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल पार्टी नेतृत्व की भूमिका को लेकर है। यदि एक विधायक खुले तौर पर पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में उतरता है, तो अनुशासन का डंडा कहां है? क्या नेतृत्व कार्रवाई से बच रहा है या फिर राजनीतिक परिस्थितियां उसे कठोर फैसला लेने से रोक रही हैं?
यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि अनंत सिंह को सत्ता का संरक्षण हासिल है। लेकिन राजनीति में मौन भी कई बार संदेश देता है। भाजपा-जदयू गठबंधन के बीच भूमिहार वोट का महत्व और मोकामा का स्थानीय समीकरण इस पूरे घटनाक्रम को और संवेदनशील बनाता है।
मोकामा में असली मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं है। यह परीक्षा इस बात की भी है कि सत्ता बड़ी है या संगठन, और राजनीतिक प्रभाव के सामने पार्टी अनुशासन कितना मजबूत है।

