भारत की विविध पहचान बेहतर दुनिया बनाने में योगदान दे सकती है : आरएसएस प्रमुख भागवत
मुंबई, दो अक्टूबर (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंयेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत की पहचान भाषाओं, धर्मों, जातियों और संस्कृतियों की विविधता से बनी है तथा वह अपने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक प्रगति के साथ जोड़कर एक बेहतर दुनिया बनाने में योगदान दे सकता है।
भागवत ने यहां प्रभादेवी क्षेत्र में एक सभा को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि युवा पीढ़ी को भारतीय समाज और उसकी परंपराओं के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए तथा समाज की बेहतरी के लिए दुनिया भर से मिली जानकारी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक अंतर-धार्मिक बैठक में किसी व्यक्ति ने उनसे कहा था कि धर्मों के बीच टकराव से मानव जानें जा रही हैं, लेकिन इस समस्या का कोई आसान समाधान नहीं मिल रहा है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा, ‘‘उसने मुझसे अपने देश आने और भारत की शिक्षाओं एवं ज्ञान को दुनिया तक पहुंचाने को कहा।’’
भागवत ने कहा कि भगवद गीता में मौजूद शाश्वत ज्ञान भारत और देश के बाहर की विभिन्न परंपराओं में झलकता है, भले ही समय और परिस्थितियों के अनुसार इसकी अभिव्यक्ति के तरीके और शब्द अलग-अलग रहे हों।
उन्होंने कहा, ‘‘पुरानी परंपराओं से लेकर आधुनिक समय तक, अलग-अलग विचारधाराओं का निष्कर्ष एक ही है। दुनिया के बारे में सोचने वाले मनुष्यों के प्राचीन दौर से लेकर युवाल नोआ हरारी (इजराइली मध्यकालीन इतिहासकार) तक, विचारों का दायरा और उनका निष्कर्ष एक ही रहा है।’’
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि लोगों को दुनिया, अपने आस-पास के माहौल और अपने आचरण को समझने के लिए शाश्वत सत्य को समझने की आवश्यकता है।
भागवत ने कहा कि अलग-अलग परंपराएं एक ही मूल सिद्धांतों को बताने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को केवल अपने बाहरी तौर-तरीकों का पालन करने के बजाय शिक्षाओं की दिशा पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि आप संदेश की अनदेखी करके केवल शब्दों के चयन पर ध्यान देते हैं, तो इससे उलझन पैदा होती है।
भागवत ने चेतना पर वैज्ञानिक अध्ययनों का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘आज दुनिया की एक साझा चेतना है। यह हर चीज की शुरुआत है। हर चीज की शुरुआत पहले से मौजूद एक सार्वभौमिक चेतना से हुई है।’’
उन्होंने कहा कि बुद्धि की तुलना सारथी से, आत्मा की स्वामी से और शरीर के अंगों की तुलना रथ के घोड़ों से की जा सकती है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि अहंकार कभी-कभी मनुष्य को गलत रास्ते पर ले जा सकता है और दुख व निराशा का कारण बन सकता है। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि जीवन की चुनौतियों का सामना करते समय लोगों को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा, ‘‘छोटी-सी निराशा से ही लोग हताश हो जाते हैं और कुछ तो अपनी जान भी दे देते हैं। अगर आप रोजमर्रा के काम करना चाहते हैं, तो आपको मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। जिन लोगों ने ऐसी जिंदगी जी है, उन्होंने हमें यह बताया है।’’
भागवत ने कहा कि महान हस्तियां और उनके कार्य समाज को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलते हुए अपने मूल्यों को बनाए रखने में लोगों की मदद करते हैं।
युवाओं के बारे में भागवत ने कहा कि ‘जेन जी’ के जो युवा विदेश जाते हैं, उन्हें लोग याद दिलाते हैं कि उनकी जड़ें भारत, इसकी परंपराओं एवं ज्ञान से जुड़ी हैं।
भागवत ने कहा कि लोग चाहते हैं कि ‘जेन जी’ उन्हें अपनी खासियत और पहचान के बारे में बताएं।
उनके अनुसार, एक प्रतिभागी ने भारत को एक प्रभावशाली देश बताया और गुजरात के जामनगर में एक अत्याधुनिक तेल रिफाइनरी की अपनी यात्रा को याद किया। भागवत ने बताया कि रिफाइनरी में काम कर रहे लोगों की गहमागहमी के बीच, उन्होंने भगवान गणेश की एक विशाल प्रतिमा देखी और कहा – ‘यही भारत है’।
भागवत ने कहा, ‘‘यह भारत की पहचान है और हमें इस पर गर्व है। इसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाया जाना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को यह सिखाया जाना चाहिए कि आने वाली चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए, सफलता या असफलता की परवाह किए बिना आगे कैसे बढ़ा जाए और अपने जीवन को सार्थक कैसे बनाया जाए।
भागवत ने यह भी कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि नयी पीढ़ी के लोगों की अपनी मातृभाषा पर अच्छी पकड़ नहीं होती और मौजूदा पीढ़ी का ध्यान केंद्रित करने का समय भी कम होता है।

