लेखक: यदुनंदन
राष्ट्रकवि दिनकर की 118वीं जयंती के उपलक्ष्य में सिमरिया स्थित विवेकानंद कोचिंग संस्थान में रविवार को दिनकर स्मृति विकास समिति के तत्वावधान में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर क्षेत्र के गणमान्य साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षाविद एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित होकर राष्ट्रकवि को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं दिनकर जी के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। सिमरिया, जो दिनकर जी की जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है, वहां उनकी जयंती मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे दिनकर स्मृति विकास समिति बखूबी निभा रही है।
दिनकर मनुष्य होकर कीर्ति से देवता हो गए: सच्चिदानंद। बीहट।यदुनंदन।दिनकर स्मृति विकास समिति सिमरिया के तत्वावधान में राष्ट्रकवि दिनकर की 118वीं जयंती के आठवें दिन रविवार को विवेकानंद कोचिंग संस्थान, सिमरिया में समारोह का आयोजन किया गया।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए दिनकर पुस्तकालय के अध्यक्ष विश्वंभर सिंह ने कहा कि सिमरिया दिनकर को हमेशा श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। इसका मूल्यांकन आने वाले समय में होगा। दिनकर की रचनाएं कालजयी हैं। उन्होंने कहा कि दिनकर ने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी और उनकी कविताओं में राष्ट्रीय चेतना का ज्वार साफ दिखाई देता है। सिमरिया की माटी ने ऐसे महान सपूत को जन्म दिया, यह इस क्षेत्र के लिए गौरव की बात है।
राष्ट्रकवि दिनकर की 118वीं जयंती पर प्रमुख वक्ताओं के उद्गार
मुख्य वक्ता लोकगायक सच्चिदानंद पाठक ने कहा कि दिनकर मनुष्य होकर कृति से देवता हो गए। बच्चों में दिनकर का स्वरूप देखने से दिनकर का स्वभाव दिखता है। उन्होंने कहा कि दिनकर साहित्य का विरोध करने वाला मृतक समान है। लोकगायक पाठक ने अपनी ओजस्वी वाणी से दिनकर की रचनाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए युवा पीढ़ी से उनके साहित्य को आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दिनकर केवल कवि नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा थे जिनकी वाणी में जन-जन की पीड़ा और आकांक्षा मुखरित होती है।
समारोह को संबोधित करते हुए साहित्यकार एस. मनोज ने कहा कि दिनकर हमसबों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। जिसने दिनकर को जितना मजबूती से पकड़ा वह जीवन में उतनी अधिक ऊंचाई तक पहुंचा। उन्होंने दिनकर के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी कविताएं संघर्षरत मानवता का संबल हैं। ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ जैसी कालजयी कृतियों के रचयिता दिनकर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कल थे।
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण प्रियदर्शी ने कहा कि बच्चों को दिनकर की कविताओं को आत्मसात करने की जरूरत है। दिनकर साहित्य के अध्ययन से उनके करियर में भी मदद मिलेगा। उन्होंने शिक्षा पद्धति में दिनकर के साहित्य को अनिवार्य रूप से शामिल करने पर जोर देते हुए कहा कि दिनकर की भाषा शैली और भाव पक्ष विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी है। पत्रकार प्रियदर्शी ने दिनकर के पत्रकारीय जीवन पर भी प्रकाश डाला।
छात्र-छात्राओं ने दिनकर की कविताओं का पाठ किया। अमन कुमार ने रश्मिरथी के तीसरे सर्ग का पाठ किया वहीं अभय कुमार, आर्यन, पुष्पम भारद्वाज, लक्ष्मी कुमारी, आदर्श कुमार समेत दर्जनाधिक बच्चों ने दिनकर की रचनाओं का सस्वर पाठ किया। बच्चों द्वारा ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ और ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को’ जैसी पंक्तियों का सस्वर पाठ सुनकर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि दिनकर की कविताएं आज भी युवा मन को झकझोरने और प्रेरित करने की क्षमता रखती हैं।
मौके पर राजेश कुमार सिंह, दीनबंधु कुमार, अजीत कुमार, अमन गौतम, प्रियव्रत कुमार, श्यामनंदन निशाकर, संजीव फिरोज, रामकुमार, मनीष कुमार समेत कई वक्ताओं ने दिनकर के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विचार व्यक्त किया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में दिनकर स्मृति विकास समिति के प्रयासों की सराहना की और इस आयोजन को साहित्यिक चेतना के प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए संयोजक ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
समारोह के अंत में दिनकर स्मृति विकास समिति के पदाधिकारियों ने उपस्थित सभी अतिथियों, साहित्यकारों और प्रतिभागी छात्र-छात्राओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि रामधारी सिंह दिनकर की विरासत सिमरिया की माटी में ही नहीं, बल्कि हर हिंदी प्रेमी के हृदय में जीवंत है। ऐसी साहित्यिक गतिविधियां नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं।

