तीज व्रत अखंड सौभाग्य, पति-पत्नी के अनन्य प्रेम, त्याग और भक्ति का प्रतीक है, जिसे मुख्य रूप से महिलाएं मनाती हैं।
तीज भारतीय लोक-संस्कृति का एक अत्यंत पावन, उल्लासपूर्ण और जीवंत पर्व है। तीज का आगमन प्रकृति और मानव मन के अटूट जुड़ाव का संदेश देता है। मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला यह त्योहार अखंड सौभाग्य, पति-पत्नी के अनन्य प्रेम, त्याग और भक्ति का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता है कि जो स्त्री सच्चे मन से तीज का व्रत रखती है, उसे अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है। यह पर्व केवल व्रत या पूजा-पाठ तक सीमित न होकर वर्तमान समय में स्त्रियों के उल्लास, श्रृंगार, और सामाजिक एकजुटता के महाउत्सव का रूप लेता जा रहा है।
तीज व्रत की पौराणिक कथा
तीज का व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि माता पार्वती बाल्यावस्था से ही भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। परंतु उनके पिता पर्वतराज हिमालय ने नारद जी के सुझाव पर पार्वती जी का विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया, तो माता पार्वती अत्यंत व्यथित हुईं क्योंकि वे मन ही मन शिव जी को अपना पति मान चुकी थीं। अपनी इच्छा की रक्षा के लिए माता पार्वती अपनी सखियों की मदद से एक घने जंगल की गुफा में चली गईं। जहाँ उन्होंने रेत का शिवलिंग बनाकर निर्जला और निराहार रहकर दिन रात जागकर वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी इस अनन्य भक्ति और अडिग संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। अतः विवाहित महिलाएँ, सुखी दांपत्य जीवन, पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुखी-समृद्ध पारिवारिक जीवन की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं
तीज व्रत की पूजा विधि और परंपराएं
इस व्रत की शुरुआत एक दिन पहले नहाए खाए से शुरू होती है, महिलाएं नदियों में स्नान कर नदी से बलुई मिट्टी निकाल कर लाती है और उससे शिवलिंग और गौरी गणेश का निर्माण करती है। इस दिन विशेष पकवान जैसे घेवर, अनरसा, गुजिया, खीर और मालपुआ बनाने व खाने का भी विशेष महत्व है। तीज व्रत के दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर शिवलिंग और मां गौरी की विधिवत् पूजन करती है। साथ ही निराहार और निर्जला व्रत रखते हुए रात्रि में रतजगा करती हैं। जो महिलाओं के असीम संयम और मानसिक बल , दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है। रतजगा के लिए महिलाएं एकजुट होकर और रात भर शिवलिंग की पूजा, शिवलिंग के ऊपर चुटकी (हाथ की दो उँगलिया अंगूठा और अनामिका) से सिंदूर चढ़ाया जाता है, जिसे “शीरी पूजन” कहते हैं और नाचारी लोकगीत (शिवजी के लिए गाए जाने वाले गीत), कोहबर, कजरी और झूमर गाते हुए रात भर जगी रहती है। कहीं कहीं लंबी नदियों से सटे गावों में रहनेवाले नई नवेली दुल्हन अपना पहला तीज व्रत बहुत धूमधाम से मनाते हुए रात्रि में नदियों में महिलाएं पुरुषों की भागीदारी से नाव पर बैठकर रात भर भ्रमण करती थी । तीज की रात नदी का नजारा मन मस्त करने वाला होता था। किंतु नदियों में घटती जल प्रवाह के कारण यह सुखद क्षण लगभग खत्म हो चुका है। वहीं कुछ स्थानों पर वृक्षों की शाखाओं में झूला झूलने का भी नियम है शास्त्रों में निद्रा को अज्ञान और आलस्य का प्रतीक माना गया है। पौराणिक धारणा है कि तीज की रात जागरण करने से साधक की चेतना जागृत होती है और साधना पूर्ण होती है।
तीज व्रत का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में तीज का पर्व विभिन्न रूपों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के द्वारा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत जैसे लोकगीतों, पकवानों, लोककला और रीति-रिवाजों को संरक्षित और संचारित किया जाना संभव हो पा रहा है। वहीं माता पार्वती की कथा “अपने जीवनसाथी को स्वयं चुनने के अधिकार” और उस निर्णय पर अडिग रहने के संकल्प को संबल देता है। आज समय में कई युवा पुरुष भी अपनी पत्नी के प्रति सम्मान और एकजुटता दर्शाने के लिए इस दिन साथ में व्रत रखते हैं या घर के कामों में मदद करते हैं। जो बदलते समय में केवल स्त्री के एकतरफा त्याग का प्रतीक न रहकर दांपत्य के आपसी प्रेम और सहयोग का उत्सव बन रहा है। अधिक जानकारी के लिए तीज पर्व पर विकिपीडिया देखें।
आधुनिक समय में तीज व्रत का स्वरूप
तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या उपवास मात्र नहीं है बल्कि यह भारतीय नारी की अनन्य निष्ठा, संकल्प शक्ति, सौंदर्यबोध और लोक-संस्कृति का महापर्व है। यह हमें सिखाता है कि सच्चे प्रेम और अडिग संकल्प से किसी भी लक्ष्य को पाया जा सकता है। आधुनिक समय में इस पर्व को आडंबर, अंधविश्वास से दूर रखकर, इसके मूल भाव प्रेम, प्रकृति से जुड़ाव, स्वास्थ्य का ध्यान और आपसी सौहार्द के साथ मनाना ही इसकी वास्तविक सार्थकता है। तीज व्रत का यह पावन पर्व हर स्त्री के भीतर छिपी उस शक्ति और उल्लास, समर्पण को प्रदर्शित करता है जो समाज और परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रखती है।
लेखक
डॉ सुमन लता
असिस्टेंट प्रोफेसर
रंभा कॉलेज ऑफ़ एजूकेशन

