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    Home » हुदू में दो जाति वर्ग के बीच वर्षों से बढ़ती खाई*
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    हुदू में दो जाति वर्ग के बीच वर्षों से बढ़ती खाई*

    News DeskBy News DeskAugust 25, 2026Updated:August 25, 2026No Comments3 Mins Read
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    Jamshedpur News | Rashtra Samvad
    Rashtra Samvad
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    *आपसी संघर्ष की सुगबुगाहट से उभर रहे खतरे को प्रशासन ने नजरअंदाज किया?*

     

    *जमीन से शुरू हुई दरार प्रशासनिक उपेक्षा से संघर्ष में क्यों बदली?*

     

    मृत्युंजय बर्मन,

    राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला

     

    हुदू पंचायत के उपरबेड़ा और आसपास के गांवों में संथाल और सरदार समुदाय के बीच जमीन को लेकर लंबे समय से चली आ रही खींचतान अब संवेदनशील मामला बन चुका है। 23 अगस्त को उपरबेड़ा में ग्रामीणों के बीच जिस तरह का तनाव और संघर्ष सामने आया, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस विवाद की जड़ें वर्षों पुरानी बताई जा रही हैं, उसे समय रहते प्रशासन और पुलिस ने गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

     

    सूत्र बताते हैं कि जमीन, तालाब के विवाद अंचल कार्यालय के संज्ञान में देकर निष्पादन की गुहार लगाई गई थी। यदि यह तथ्य सही है तो सवाल केवल पुलिस की भूमिका का नहीं, बल्कि अंचल प्रशासन की कार्यप्रणाली का भी है। जमीन संबंधी विवाद यदि राजस्व स्तर पर लंबित रहते हैं और पक्षकारों को स्पष्ट न्यायिक अथवा प्रशासनिक समाधान नहीं मिलता, तो धीरे-धीरे वही विवाद सामाजिक टकराव का रूप लेने लगता है।

     

    सूत्रों का कहना है कि 23 अगस्त को पुलिस के संज्ञान में यह मामला आया था, लेकिन नकस्ली प्रभावित क्षेत्र कहकर पुलिस त्वरित कार्यवाही से कन्नी काट गई। पुलिस अधीक्षक स्तर से यदि क्षेत्र में नक्सली गतिविधियां लगभग समाप्तप्राय होने की बात कही जा रही है, तो जमीनी स्तर पर पुलिसिंग की रणनीति भी उसी वास्तविकता के अनुरूप होनी चाहिए।

     

    हुदू, कालाझोर जैसे इलाकों को लेकर ग्रामीणों की यह शिकायत भी गंभीर है कि वहां नियमित पुलिस पेट्रोलिंग और आम लोगों से सीधा संपर्क पर्याप्त नहीं है। स्वस्थ पुलिसिंग केवल मुखिया या ग्राम प्रधान से सूचना प्राप्त करने तक सीमित नहीं हो सकती। केवल मुखबिर तंत्र पर अत्यधिक निर्भरता भी जोखिमपूर्ण है, क्योंकि किसी भी सूचना के पीछे व्यक्तिगत अथवा समूहगत स्वार्थ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

     

    काण्ड्रा के चर्चित डबल मर्डर मामले का उदाहरण भी इसी संदर्भ में पुलिस की प्रारंभिक प्रतिक्रिया को लेकर उठे सवालों को और गंभीर बनाता है। आरोप है कि एक पक्ष पहले मारपीट और कथित अपहरण की शिकायत लेकर थाना पहुंचा था, लेकिन आवेदन नहीं लिया गया। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल होगा जिसमें संभावित खतरे के संकेत मिलने के बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं हुई।

     

    हुदू की स्थिति को मणिपुर के मैतेई और कुकी-जो संघर्ष से जोड़कर देखना एक चेतावनी के रूप में उपयोगी हो सकता है, लेकिन दोनों परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। फिर भी एक महत्वपूर्ण समानता जरूर दिखाई देती है भूमि, पहचान, अधिकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर अविश्वास जब लंबे समय तक अनसुलझा रहता है, तो सामाजिक दूरी धीरे-धीरे सामुदायिक तनाव में बदल सकती है।

     

    काण्ड्रा पुलिस को संवेदनशील गांवों में नियमित गश्त, बीट पुलिसिंग और प्रत्यक्ष जनसंवाद बढ़ाना चाहिए। विवादित जमीनों की राजस्व स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और दोनों पक्षों को कानून के दायरे में निष्पक्ष समाधान का भरोसा मिलना चाहिए।

     

    हुदू को यदि समय रहते नहीं संभाला गया तो जमीन का एक विवाद सामाजिक अविश्वास की स्थायी दरार बन सकता है। आज सवाल यह नहीं कि संघर्ष में कौन जीता और कौन हारा; सवाल यह है कि प्रशासन ने संघर्ष पैदा होने से पहले उसे रोकने के लिए क्या किया? यदि इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो कल की घटना को केवल ग्रामीणों की आपसी झड़प कहकर समाप्त कर देना समस्या की जड़ से आंखें मूंद लेना होगा।

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