नई दिल्ली. देश में न्यायालयों की कार्यवाही की रिपोर्टिंग और डिजिटल माध्यमों पर उसके प्रसारण को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि मान्यता प्राप्त समाचार संस्थान अदालतों की कार्यवाही की रिपोर्टिंग पहले की तरह जारी रख सकते हैं. हालांकि, न्यायालय ने यह भी साफ किया कि अदालत की सुनवाई के ऑडियो या वीडियो क्लिप का उपयोग, प्रसारण, अपलोड, साझा करना या रिपोर्टिंग के दौरान इस्तेमाल करना बिना पूर्व अनुमति स्वीकार्य नहीं होगा. शीर्ष अदालत ने कहा कि उसका पूर्व अंतरिम आदेश मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाने के लिए नहीं था, बल्कि न्यायालयीन कार्यवाही के रिकॉर्डेड ऑडियो-वीडियो के अनधिकृत और संदर्भ से हटकर उपयोग को रोकने के उद्देश्य से जारी किया गया था.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने 31 जुलाई 2026 को हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ एवं अन्य (Case Number: W.P.(C) No. 751/2026)मामले में यह स्पष्टीकरण दिया. यह मामला पत्रकार हर्षिता ग्रोवर द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें अदालतों की लाइव स्ट्रीमिंग से जुड़े ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत निष्कर्षण, संपादन, प्रसार, व्यावसायिक उपयोग और सोशल मीडिया पर प्रसारण को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 24 जुलाई 2026 को पारित अंतरिम आदेश के पैरा-11 को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति बनी हुई थी. अदालत ने स्पष्ट किया कि उक्त आदेश को मान्यता प्राप्त समाचार संस्थानों द्वारा न्यायालयीन कार्यवाही की रिपोर्टिंग पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए. न्यायालय ने कहा कि समाचार संस्थान अदालतों की कार्यवाही, कानूनी घटनाक्रम और न्यायिक निर्णयों की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करते रहेंगे तथा आम जनता को न्यायिक विकास की जानकारी देते रहेंगे. हालांकि, ऐसी रिपोर्टिंग के दौरान अदालत की कार्यवाही के ऑडियो या वीडियो क्लिप का उपयोग नहीं किया जा सकेगा.
अदालत ने स्पष्ट किया कि समाचार माध्यमों की भूमिका लोकतांत्रिक व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है और न्यायिक कार्यवाहियों की निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक रिपोर्टिंग न्यायिक पारदर्शिता को मजबूत करती है. लेकिन यदि अदालतों की रिकॉर्ड की गई ऑडियो या वीडियो सामग्री को चुनिंदा अंशों में काटकर या संदर्भ से अलग प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे न्यायिक कार्यवाही की गलत तस्वीर सामने आ सकती है. इसी संभावना को देखते हुए रिकॉर्डेड सामग्री के उपयोग पर नियंत्रण आवश्यक माना गया है.
गौरतलब है कि 24 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए बिना पूर्व अनुमति अदालतों की कार्यवाही के ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग के निष्कर्षण, पोस्ट, री-पोस्ट, अपलोड, डाउनलोड, प्रसारण, संग्रहण, संपादन और व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगाई थी. अदालत ने यह भी कहा था कि इस प्रकार की कोई भी रिकॉर्डिंग सुप्रीम कोर्ट के सचिव जनरल अथवा संबंधित उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना उपयोग नहीं की जा सकती. उसी आदेश के पैरा-11 को लेकर उत्पन्न भ्रम को दूर करने के लिए यह नया स्पष्टीकरण जारी किया गया है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पिछली सुनवाई में केंद्र सरकार को संबंधित मंत्रालयों के साथ विचार-विमर्श कर याचिका में मांगी गई राहतों को लागू करने के संबंध में एक प्रस्ताव तैयार कर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था. इसके साथ ही सभी उच्च न्यायालयों से अदालतों की लाइव स्ट्रीमिंग एवं रिकॉर्डिंग संबंधी मॉडल नियमों को अपनाने की स्थिति पर स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी गई थी. इससे स्पष्ट है कि शीर्ष अदालत पूरे देश के लिए न्यायालयीन कार्यवाहियों की डिजिटल रिकॉर्डिंग और उसके उपयोग को लेकर एक समान व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर हस्तक्षेप आवेदनों को भी स्वीकार कर संबंधित आवेदकों को कार्यवाही में हस्तक्षेप कर्ता के रूप में सहायता करने की अनुमति प्रदान की. वहीं प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है.
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश मीडिया की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण कदम है. एक ओर अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्यायालयीन कार्यवाहियों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर कोई रोक नहीं है, वहीं दूसरी ओर रिकॉर्डेड ऑडियो और वीडियो क्लिप के अनियंत्रित प्रसार पर प्रतिबंध लगाकर न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और विश्वसनीयता बनाए रखने का प्रयास किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में अदालतों की कार्यवाही के चुनिंदा अंशों के प्रसार से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका रहती है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आम नागरिकों सभी के लिए भविष्य की स्पष्ट कानूनी दिशा तय करता है.
यह आदेश यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायालय खुली अदालत की परंपरा, पारदर्शिता और मीडिया की भूमिका का सम्मान करता है, लेकिन न्यायालयीन रिकॉर्डिंग का उपयोग एक नियंत्रित और विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकेगा. आने वाली सुनवाई में केंद्र सरकार, उच्च न्यायालयों और अन्य पक्षों के जवाब के आधार पर सुप्रीम कोर्ट देशभर में अदालतों की लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग के उपयोग से संबंधित व्यापक दिशा-निर्देश तय कर सकता है.

