लेखक: मृत्युंजय बर्मन
झारखंड में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर नया आरक्षण रोस्टर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
झारखंड में अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में पंचायत चुनाव होने की संभावना के साथ गांवों में चुनावी चर्चा तेज होने लगी है। सबसे ज्यादा सवाल मुखिया और पंचायत के दूसरे पदों के आरक्षण को लेकर है। कई गांवों में यह चर्चा है कि पिछली बार जिस पंचायत में मुखिया का पद महिला के लिए आरक्षित था, क्या इस बार भी वही व्यवस्था रहेगी? इसका सीधा जवाब है, जरूरी नहीं।
झारखंड पंचायत राज अधिनियम में महिलाओं को पंचायतों में कम से कम 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। यह व्यवस्था ग्राम पंचायत के वार्ड सदस्य से लेकर मुखिया, पंचायत समिति, प्रमुख, जिला परिषद सदस्य और जिला परिषद अध्यक्ष तक लागू है। इसके लिए झारखंड पंचायत राज अधिनियम में प्रावधान किए गए हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार वही पंचायत महिला के लिए आरक्षित रहेगी। कानून में रोस्टर यानी बारी-बारी से आरक्षण की व्यवस्था है। इसलिए जिस पंचायत में पिछली बार महिला मुखिया थी, अगली बार वह सीट सामान्य या किसी दूसरी आरक्षित श्रेणी में जा सकती है। इसी तरह दूसरी पंचायत को महिला के लिए आरक्षित किया जा सकता है। कौन-सी पंचायत किस वर्ग के लिए आरक्षित होगी, इसका फैसला नया रोस्टर तय करेगा।
नया आरक्षण रोस्टर का प्रभाव
यहां एक बात समझना जरूरी है कि आरक्षण तय करने का अधिकार राज्य निर्वाचन आयोग के पास नहीं है। आरक्षण की श्रेणी और रोस्टर तैयार करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग की होती है। सरकार द्वारा आरक्षण रोस्टर और उससे संबंधित अधिसूचना जारी होने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग उसी आधार पर चुनाव कराता है।
आगामी चुनाव में एक और बड़ा मुद्दा पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का है। ओबीसी को पंचायत चुनाव में आरक्षण देने के लिए समर्पित आयोग/एजेंसी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी। रिपोर्ट समय पर आती है और कानूनी प्रक्रिया पूरी होती है, तो ओबीसी आरक्षण के साथ चुनाव का रास्ता साफ हो सकता है। इस संबंध में भारत निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देश भी अहम होंगे।
इसलिए गांवों में अभी से किसी सीट को पक्का मान लेना जल्दबाजी होगी। महिला आरक्षण खत्म नहीं होगा, लेकिन महिला आरक्षित सीटों का स्थान बदल सकता है। जब तक सरकार नया आरक्षण रोस्टर जारी नहीं करती, तब तक किसी पंचायत के बारे में यह दावा करना कि “इस बार यहां महिला ही मुखिया बनेगी” या “यह सीट सामान्य हो गई है”, सिर्फ अनुमान होगा। अंतिम तस्वीर राज्य सरकार के नए आरक्षण रोस्टर के जारी होने के बाद ही साफ होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि रोस्टर प्रणाली ग्रामीण राजनीति में नए समीकरण पैदा करेगी। पिछले चुनाव में आरक्षित सीटों पर विजयी उम्मीदवारों को इस बार नए क्षेत्रों में किस्मत आजमानी पड़ सकती है। इससे राजनीतिक दलों की रणनीति भी बदलेगी। ग्रामीण मतदाताओं को भी नए उम्मीदवारों को परखने का मौका मिलेगा।
पंचायती राज विभाग के सूत्रों के अनुसार, रोस्टर तैयार करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। जनवरी तक अधिसूचना जारी होने की उम्मीद है। इसके बाद उम्मीदवारों को नामांकन के लिए पर्याप्त समय मिलेगा। चुनाव आयोग भी मतदाता सूची के पुनरीक्षण में जुटा है।
