दिल्ली से उदयपुर की अविस्मरणीय यात्रा के दौरान हमारे पत्रकार दल ने श्री सांवलिया सेठ मंदिर के पावन दर्शन किए, जो मेवाड़ की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
श्री सांवलिया सेठ मंदिर: आस्था और इतिहास का संगम
दिल्ली की भागदौड़, शोर-शराबे और व्यस्त जीवन से दूर, राजस्थान की ऐतिहासिक धरा की ओर बढ़ते हमारे कदम केवल एक पर्यटन यात्रा का हिस्सा नहीं थे, बल्कि यह भावनाओं, मित्रता, संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक अनुभूति से परिपूर्ण एक अविस्मरणीय अनुभव था। यह यात्रा जीवन की उन मधुर स्मृतियों में शामिल हो गई, जिन्हें समय बीतने के बाद भी मन बार-बार स्नेह के साथ याद करता है।
दिल्ली प्रेस क्लब की वरिष्ठ पत्रकार स्नेहा जी के स्नेहपूर्ण सहयोग और विशेष पहल पर आठ पत्रकारों का हमारा दल तथा शारदा विश्वविद्यालय की छात्रा डेज़ी उदयपुर की ओर रवाना हुआ। यात्रा के आरम्भ में हममें से अधिकांश एक-दूसरे के लिए अपरिचित थे, लेकिन कुछ ही समय में औपचारिकता की दीवारें टूट गईं और आत्मीयता का एक सुंदर रिश्ता बन गया। हँसी-मज़ाक, संवाद, अनुभवों का आदान-प्रदान और सहज अपनापन पूरे सफर को आनंदमय बना रहे थे। देखते ही देखते यह यात्रा केवल सहयात्रियों का नहीं, बल्कि एक परिवार का सफर बन गई।
जैसे ही हमने झीलों की नगरी उदयपुर की पावन धरती पर कदम रखा, ऐसा लगा मानो इतिहास स्वयं हमारा स्वागत कर रहा हो। राजाओं-महाराजाओं के भव्य महल, विशाल दुर्ग, कलात्मक स्थापत्य और मेवाड़ की गौरवगाथा से जुड़े ऐतिहासिक स्मारकों को देखकर मन रोमांचित हो उठा। उन प्राचीन महलों की दीवारें आज भी वीरता, स्वाभिमान, त्याग और बलिदान की अमर गाथाएँ सुनाती प्रतीत होती हैं। ऐसा महसूस होता था मानो महाराणा प्रताप और मेवाड़ के वीर योद्धाओं की अमर स्मृतियाँ आज भी इस भूमि की हवाओं में जीवित हैं।
राजमहलों के समीप स्थित प्राचीन मंदिरों में प्रवेश करते ही मन को अद्भुत शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव हुआ। वहाँ की शांत, पवित्र और भक्तिमय वातावरण ने मन को भीतर तक स्पर्श किया। इतिहास और अध्यात्म का ऐसा अद्वितीय संगम शायद ही कहीं और देखने को मिलता है।
उदयपुर प्रवास को और अधिक सुखद एवं अविस्मरणीय बनाने में होटल कुशल बाग का विशेष योगदान रहा। यहाँ बिताई गई दो रातें अत्यंत आरामदायक और आनंदमयी रहीं। होटल के स्वामी श्री बालमुकुंद वैरागी जी का आत्मीय व्यवहार, विनम्रता और अतिथि-सत्कार वास्तव में प्रशंसनीय है। उन्होंने हमें अतिथि नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह स्नेह और सम्मान दिया। उनकी उदारता और आत्मीयता ने इस यात्रा की मधुर स्मृतियों में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ दिया।
उदयपुर की मनोहारी स्मृतियों को हृदय में संजोए जब हमारा दल माउंट आबू और चित्तौड़गढ़ की ओर आगे बढ़ा, तब हमारी यात्रा का सबसे पवित्र और भावनात्मक पड़ाव आया—श्री सांवलिया सेठ मंदिर के दर्शन।
लोकविश्वास और श्रद्धा
इस मंदिर से जुड़ी सबसे अनोखी मान्यता यह है कि श्रद्धालु भगवान सांवलिया सेठ को अपने व्यापार और जीवन का वास्तविक भागीदार मानते हैं। उनका विश्वास है कि भगवान की कृपा से उनके व्यवसाय में निरंतर उन्नति होती है। इसलिए वे अपनी आय का एक अंश श्रद्धापूर्वक भगवान के चरणों में समर्पित करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

मंदिर का इतिहास
वर्ष 1840 में सड़क निर्माण के दौरान बागंड-भादसोड़ा गाँव के समीप भूमि की खुदाई करते समय भगवान श्रीकृष्ण की काले पत्थर से निर्मित तीन अत्यंत सुंदर प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं। इनमें से मुख्य प्रतिमा को मंडलफिया में स्थापित किया गया, जहाँ आज भव्य श्री सांवलिया सेठ मंदिर स्थित है। तब से यह स्थान करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का पवित्र धाम बन चुका है।
दर्शन का समय
प्रातःकाल: सुबह 5:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक।
विश्राम: दोपहर 12:00 बजे से अपराह्न 2:30 बजे तक।
सायंकालीन दर्शन: अपराह्न 2:30 बजे से रात्रि 11:00 बजे तक।
कैसे पहुँचें
सड़क मार्ग: मंदिर उदयपुर से लगभग 80–85 किलोमीटर तथा चित्तौड़गढ़ से लगभग 35–40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्ग-27 के माध्यम से बस, टैक्सी अथवा निजी वाहन द्वारा लगभग डेढ़ से दो घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है।
वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा महाराणा प्रताप हवाई अड्डा (डबोक), उदयपुर है, जहाँ से मंदिर की दूरी लगभग 70–75 किलोमीटर है।
रेल मार्ग: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन चित्तौड़गढ़ जंक्शन तथा उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन हैं।
यात्रा की अविस्मरणीय यादें
दिल्ली से आरम्भ हुई यह यात्रा केवल नए स्थानों का भ्रमण भर नहीं थी, बल्कि यह जीवन के अनेक अनमोल अनुभवों को संजोने का एक सुनहरा अवसर भी थी। पत्रकारिता जैसे अत्यंत व्यस्त और चुनौतीपूर्ण पेशे के बीच इस प्रकार की यात्राएँ मन को नई ऊर्जा, नई प्रेरणा और जीवन को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। उदयपुर की ऐतिहासिक विरासत, वहाँ का आत्मीय आतिथ्य, मेवाड़ की गौरवशाली संस्कृति और श्री सांवलिया सेठ मंदिर के पावन दर्शन—इन सभी ने इस यात्रा को जीवन की अविस्मरणीय धरोहर बना दिया।
यह यात्रा समाप्त अवश्य हुई, किंतु इसकी स्मृतियाँ सदैव हमारे हृदय में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेंगी। अधिक जानकारी के लिए राजस्थान पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

