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    Home » बिहार विधानसभा में सत्ता पक्ष ने सरकार को घेरा: जातीय पहचान और आरक्षण पर तीखे सवाल
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    बिहार विधानसभा में सत्ता पक्ष ने सरकार को घेरा: जातीय पहचान और आरक्षण पर तीखे सवाल

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 24, 2026No Comments5 Mins Read
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    बिहार विधानसभा
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    बिहार विधानसभा में शुक्रवार को जातीय पहचान और आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर असामान्य स्थिति देखने को मिली जब सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।

    बिहार विधानसभा में उठे सवाल

    बिहार विधानसभा में शुक्रवार को जातीय पहचान और आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर उस समय असामान्य स्थिति देखने को मिली, जब सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी ही सरकार से जवाब-तलब किया। भाजपा और जद(यू) के विधायकों ने अलग-अलग मुद्दों पर सरकार से स्पष्ट रुख अपनाने और आवश्यक कार्रवाई की मांग की।

    ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान भाजपा विधायक जीवेश मिश्रा ने कहा कि राज्य सरकार के राजस्व अभिलेखों, जिला गजेटियर और अन्य आधिकारिक दस्तावेजों में संबंधित जाति के लिए ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द का उल्लेख है, जबकि बिहार सरकार की जाति सूची और जाति प्रमाण पत्र में केवल ‘भूमिहार’ लिखा जाता है। उन्होंने इसे सरकारी अभिलेखों में असंगति बताते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 1931 की जनगणना रिपोर्ट तथा राजस्व अभिलेखों में भी इस समुदाय की पहचान ‘भूमिहार ब्राह्मण’ के रूप में दर्ज है।

    सत्ता पक्ष के कई अन्य विधायकों ने भी इस मांग का समर्थन किया।

    इस पर उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि संबंधित आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार इस जाति के लिए केवल ‘ब्राह्मण’ शब्द मान्य है और ‘भूमिहार ब्राह्मण’ नाम से कोई पृथक वर्ग मान्यता प्राप्त नहीं है। हालांकि, उनके जवाब से सत्ता पक्ष के कई विधायक संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने सदन में अपनी आपत्ति दर्ज कराई।

    भाजपा विधायक विशाल प्रशांत ने मंत्री के जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि सरकार ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द के प्रयोग के पक्ष में नहीं है, तो भूमिहारों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की श्रेणी में शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए।

    इसी दौरान जद(यू) विधायक मनीष कुमार ने आरोप लगाया कि विभिन्न सरकारी भर्तियों में अनुसूचित जाति (एससी) के अभ्यर्थियों को नियमों के अनुरूप आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिससे पात्र उम्मीदवारों के साथ अन्याय हो रहा है।

    वहीं, जद(यू) विधायक श्याम रजक ने राज्य में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से संबंधित मामलों में केंद्र सरकार की आरक्षण नीति लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “एक देश, एक विधान” की बात करते हैं और केंद्र सरकार ने दलितों के हित में आवश्यक प्रावधान किए हैं। उन्होंने कहा कि यदि इस संबंध में उच्चतम न्यायालय का कोई निर्देश आता है, तो उसका भी पालन किया जाना चाहिए। रजक ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार केंद्र की नीति के अनुरूप कार्रवाई नहीं कर रही है।

    मनीष कुमार के सवाल के जवाब में उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि राज्य सरकार निर्धारित आरक्षण नीति का पूरी तरह पालन करती है। उन्होंने बताया कि आरक्षण की गणना स्वीकृत पदों की कुल संख्या के आधार पर की जाती है और उसी के अनुरूप नियुक्तियां होती हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस संबंध में प्राप्त सुझावों और शिकायतों की जांच कराई जाएगी।

    इस दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के विधायकों ने जातीय पहचान और आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर सरकार से शीघ्र और स्पष्ट कार्रवाई की मांग की।

    पृष्ठभूमि और प्रभाव

    बिहार में जातीय पहचान का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का केंद्र रहा है। भूमिहार ब्राह्मण समुदाय की स्थिति को लेकर ऐतिहासिक अभिलेखों और वर्तमान सरकारी दस्तावेजों में अंतर लंबे समय से चर्चा का विषय है। वर्ष 1931 की जनगणना के आंकड़े अक्सर विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आकलन का आधार बनते रहे हैं। इस बार सदन में सत्ता पक्ष के ही विधायकों द्वारा अपनी सरकार को घेरना एक असामान्य घटना है, जो आंतरिक लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जाति प्रमाण पत्रों में विसंगतियों का सीधा असर आरक्षण लाभ, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में अवसरों पर पड़ता है। उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव का यह कहना कि आयोग की अनुशंसा के अनुसार केवल ‘ब्राह्मण’ शब्द मान्य है, एक तकनीकी रुख है, लेकिन विधायकों का असंतोष व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर इशारा करता है। विशाल प्रशांत का सुझाव कि भूमिहारों को एसटी श्रेणी में शामिल किया जाए, मांग की गंभीरता को दर्शाता है।

    आरक्षण नीति पर बहस

    मनीष कुमार और श्याम रजक द्वारा उठाए गए एससी/एसटी आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़े सवाल बिहार की नौकरशाही में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करते हैं। श्याम रजक का यह तर्क कि केंद्र की नीति लागू न होना “एक देश, एक विधान” की भावना के विपरीत है, संवैधानिक संघवाद पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है। उपमुख्यमंत्री का आश्वासन कि शिकायतों की जांच कराई जाएगी, एक सकारात्मक कदम है, लेकिन देखना होगा कि जमीनी स्तर पर कब तक सुधार होता है।

    अधिक जानकारी के लिए बिहार सरकार की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

    निष्कर्ष

    बिहार विधानसभा का यह सत्र सामाजिक न्याय और प्रशासनिक पारदर्शिता के प्रति सत्ता पक्ष की प्रतिबद्धता का परीक्षण बन गया है। जातीय पहचान के दस्तावेजीकरण में एकरूपता और आरक्षण नीतियों का ईमानदार क्रियान्वयन ही बिहार में समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई की अपेक्षा रहेगी।

    आरक्षण नीति जातीय पहचान बिहार राजनीति बिहार विधानसभा सामाजिक न्याय
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