लेखक: देवानंद सिंह
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव एक बार फिर पूरी दुनिया को असमंजस में खड़ा कर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ती सैन्य गतिविधियां, समुद्री मार्गों पर असुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों की सुस्ती ने वैश्विक चिंता को बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में “तीसरे विश्व युद्ध” जैसी आशंकाएं स्वाभाविक रूप से सामने आती हैं। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों को सीधे विश्व युद्ध कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह भी सच है कि यदि तनाव पर समय रहते नियंत्रण नहीं हुआ तो इसके गंभीर अंतरराष्ट्रीय परिणाम सामने आ सकते हैं।
क्या तीसरे विश्व युद्ध का खतरा वास्तविक है?
वर्तमान में वैश्विक व्यवस्था अत्यधिक जटिल हो चुकी है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और दक्षिण चीन सागर में जारी गतिरोध जैसी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि दुनिया गुटबाजी की ओर बढ़ रही है। इतिहास में जब भी महाशक्तियों के बीच संवाद के रास्ते बंद हुए हैं, तब बड़े संघर्षों का जन्म हुआ है। आज के समय में सैन्य तकनीक और परमाणु हथियारों की मौजूदगी के कारण किसी भी बड़े युद्ध का परिणाम पूरी मानवता के विनाश के रूप में सामने आ सकता है।
वैश्विक विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक अंतर्संबंधों के बावजूद राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं कई बार देशों को युद्ध की धकेल देती हैं। हालांकि, आज की तारीख में कोई भी जिम्मेदार राष्ट्र सीधे तौर पर एक महायुद्ध की शुरुआत नहीं करना चाहता। लेकिन छद्म युद्ध (Proxy Wars) और सैन्य टुकड़ियों की अनपेक्षित झड़पें अनजाने में एक बड़े पैमाने के संघर्ष को जन्म दे सकती हैं, जिसे नियंत्रित करना किसी भी पक्ष के लिए संभव नहीं होगा।
आज का विश्व केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और आर्थिक तंत्र से भी एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। किसी भी बड़े युद्ध का सबसे पहला असर आम नागरिकों पर पड़ता है। महंगाई बढ़ती है, ऊर्जा संकट गहराता है, आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित होती हैं और विकास की गति थम जाती है। इतिहास गवाह है कि युद्ध विनाश देता है, जबकि शांति विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
आर्थिक मंदी के इस दौर में किसी भी नए संघर्ष का प्रभाव सीधे तौर पर वैश्विक जीडीपी पर पड़ेगा। पश्चिम एशिया से होने वाले तेल निर्यात में बाधा आने से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इससे गरीब और विकासशील देशों में खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा का संकट और गंभीर हो जाएगा। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति ही एकमात्र सहारा बचती है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र समाचार के माध्यम से भी बार-बार रेखांकित किया जाता है कि वैश्विक स्थिरता के लिए सभी पक्षों को संयम बरतना होगा।
भारतीय विदेश नीति की रणनीतिक स्वायत्तता
इस संकट में कुछ देश तटस्थ रहने का प्रयास करेंगे, तो कुछ अपने रणनीतिक और सुरक्षा हितों के अनुरूप पक्ष चुनेंगे। भारत की भूमिका ऐसे समय में विशेष महत्व रखती है। भारत ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित विदेश नीति और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। यही नीति आज भी देश के हितों की रक्षा के साथ-साथ वैश्विक शांति के लिए सबसे उपयुक्त प्रतीत होती है।
भारत ने हमेशा से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत पर चलते हुए विश्व को एक परिवार माना है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान भी भारत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है”। भारत की यह संतुलित कूटनीति उसे एक ऐसे मध्यस्थ के रूप में स्थापित करती है, जो दोनों पक्षों से सीधे बात कर सकता है। इस प्रकार की शांति स्थापना की पहल न केवल भारत के वैश्विक कद को बढ़ाती है, बल्कि युद्ध की विभीषिका को टालने में भी मदद करती है।
संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय की जिम्मेदारी
संयुक्त राष्ट्र और विश्व समुदाय की जिम्मेदारी केवल चिंता व्यक्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें सक्रिय कूटनीतिक पहल करते हुए संवाद का ऐसा मंच तैयार करना होगा, जहां मतभेदों का समाधान हथियारों से नहीं बल्कि वार्ता से निकले.
दुनिया ने दो विश्व युद्धों की विभीषिका देखी है। करोड़ों लोगों की जान गई, अनेक देश तबाह हुए और मानव सभ्यता ने अपूरणीय क्षति झेली। इसलिए तीसरे विश्व युद्ध की आशंका मात्र भी पूरी मानवता के लिए चेतावनी है। यह समय शक्ति प्रदर्शन का नहीं, बल्कि धैर्य, विवेक और संवाद का है।
विश्व को युद्ध नहीं, विश्वास चाहिए। संघर्ष नहीं, सहयोग चाहिए। यदि महाशक्तियां इतिहास से सबक लें और कूटनीति को प्राथमिकता दें, तो न केवल एक बड़े संकट को टाला जा सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुरक्षित और शांतिपूर्ण विश्व की नींव भी रखी जा सकती है।

