निरोगी रहे तेरी अनमोल काया”
काव्य
मनुष्यों, नित्य तुम योगमय जीवन जीना,
स्वस्थ रहे अविरल, यह प्रकृति की माया।
योगमय हो यह जीवन सदा मनुष्य तेरा,
निरोगी बनी रहेगी तेरी, यह अनमोल काया।
सर्वदा योगमय ही जीते जाना जीवन,
यही तुम्हें वास्तविक सुख दिलाएगा।
यही जीवन जीने का सलीका सिखाएगा,
व अंतर्मन की शक्ति भी जगाता जाएगा।
मानवतावादी एवं मानवीय संवेदनाओं के प्रखर शिल्पी,
युगपुरुष कविवर ‘सूर्य’
*( मीडिया प्रभारी: वैदिक प्रकाशन, हरिद्वार )*

