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    Home » सुप्रीम कोर्ट का फैसला: फुटपाथ पर मौलिक अधिकार और अतिक्रमण की हकीकत
    उत्तर प्रदेश राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला: फुटपाथ पर मौलिक अधिकार और अतिक्रमण की हकीकत

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 21, 2026No Comments8 Mins Read
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    फुटपाथ पर मौलिक अधिकार
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    लेखक: संजय सक्सेना

    शहरों के भीड़भाड़ वाले इलाकों में सड़कों के किनारे बने फुटपाथ और लंबी दूरी के मार्गों पर हरियाली सहित पथिकों को छाया देने वाले वृक्ष अब अतीत की बात हो गए हैं। फुटपाथों पर दुकानदारों ने कब्जा कर लिया है, जबकि वृक्ष मार्ग चौड़ीकरण या विकास की भेंट चढ़ गए हैं। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून 2026 के अपने फैसले में पैदल यात्रियों के फुटपाथ पर सुरक्षित चलने को उनका मौलिक अधिकार करार दिया। इस ऐतिहासिक निर्णय ने एक बार फिर शहरी नियोजन और नागरिक सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जहां फुटपाथ पर मौलिक अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह गया है।

    गुज़रे ज़माने के फुटपाथ और छाँव देते दरख़्त: एक विडंबना

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले एक स्कूल जा रहे पाँच वर्षीय बच्चे की मौत का मुआवजा बढ़ाते हुए यह निर्देश दिया। एक वक्त था जब लखनऊ की हज़रतगंज हो या बनारस की गोदौलिया या अन्य छोटे-छोटे शहरों की सड़कों के किनारे चौड़े और साफ फुटपाथ हुआ करते थे। उन पर इमली, नीम और पीपल के घने पेड़ छाया बिछाए खड़े रहते थे। दोपहर की तपती धूप में एक थका-हारा मजदूर उस छाँव में दो पल बैठ लेता था, स्कूल जाते बच्चे उसी फुटपाथ पर बेफिक्र चहलकदमी करते थे और बूढ़े-बुजुर्ग शाम को टहलने निकलते तो सड़क की गाड़ियों का खौफ उन्हें नहीं सताता था। वह भारत अब केवल पुरानी तस्वीरों में दिखता है। आज की हकीकत यह है कि फुटपाथ दुकानों के गोदाम बन चुके हैं, पेड़ विकास की बलिवेदी पर चढ़ चुके हैं और पैदल चलने वाला आम आदमी अपनी ही सड़क पर बेगाना हो गया है।

    यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून को अपने फैसले में ऐसा कुछ नहीं कहा जो हमारे संविधान में नहीं लिखा हो, लेकिन सवाल यह है कि कानून की धज्जियां उड़ाने वालों पर कार्रवाई कौन करे। हालत यह है कि पिछले कुछ दशकों में बड़े-बड़े व्यापारियों ने पहले तो फुटपाथ घेरकर अतिक्रमण किया, फिर बाद में उनके अतिक्रमण का दायरा सड़क तक फैल गया। व्यापारी, जिन्हें धन्ना सेठ भी कहा जाता है, सिस्टम को पैसे के बल पर और राजनीतिक दलों को चंदा देकर सबका मुंह बंद कर देते हैं। पूरे प्रदेश में अतिक्रमण का यही हाल है। नगर निगम और एलडीए अक्सर अतिक्रमण के खिलाफ मकान मालिकों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, लेकिन वे बाजारों से अतिक्रमण हटाते हुए कभी नहीं दिखाई देते हैं। भू-माफियाओं की तरफ से मुंह मोड़े रहते हैं। सवाल यह है कि जो अधिकार संविधान में पहले से लिखा था, उसे अदालत को घोषित क्यों करना पड़ा? इसका जवाब हमारे शहरों की उन गलियों में मिलता है जहाँ फुटपाथ पर सब्जी वाले का ठेला है, कपड़े वाले का तिरपाल है, मोबाइल ठीक करने वाले की मेज है और उसके आगे एक ऐसा अँधेरा है जिसमें पैदल चलने वाले के लिए कोई जगह नहीं बची।

    सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: फुटपाथ पर मौलिक अधिकार की अनदेखी

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक रिटायर होने जा रहे पुलिस के एक बड़े अधिकारी का किस्सा सुनाया था, जिसमें इस अधिकारी ने सीएम को बताया था कि लखनऊ के पॉश इलाके में एक माफिया ने 120 एकड़ जमीन कब्जा रखी है। यदि उसे माफिया से मुक्त करा दिया जाए तो वहाँ राज्य फॉरेंसिक संस्थान खोला जा सकता है। जिसे योगी ने खाली करा लिया, लेकिन न जाने आज भी ऐसी कितनी जमीनें होंगी जो माफियाओं ने कब्जा करके कहीं कॉलोनी बना दी होंगी तो कहीं बस्तियां बसा दी होंगी। मगर अफसोस यह है कि अतिक्रमण के खिलाफ सिर्फ वहीं पर मोर्चा खोला जाता है जहाँ कार्रवाई करके सरकार को खुश किया जा सकता है या फिर ऐसी जगह से अतिक्रमण हटाया जाता है जहाँ अतिक्रमणकारी थोड़ा लाचार और कमजोर होता है।

    अतिक्रमण की गहरी जड़ें: पचास साल की कहानी

    खैर, बात फुटपाथ की की जाए तो एक समय था जब पैदल यात्री बीच सड़क पर गाड़ियों की चकाचौंध और अंधी दौड़ के साथ धूप और बरसात से बचते हुए आराम से फुटपाथ पर सुरक्षित आता-जाता था। मगर यह सब करीब पचास साल पुरानी बातें हुआ करती थीं। बीते पचास सालों में सरकार ने फुटपाथ के नाम पर पैसा तो खूब लुटाया, लेकिन किसी पैदल चलने वाले राहगीर को इससे फायदा नहीं हुआ। 70 और 80 के दशक में जब शहर छोटे थे और आबादी का दबाव कम था, तब फुटपाथ बनाए गए थे और उन पर पेड़ लगाए गए थे। नगरपालिकाएँ उनकी देखभाल करती थीं। धीरे-धीरे शहर फैलने लगे, आबादी बढ़ने लगी और सड़कों पर वाहनों की तादाद बेतहाशा बढ़ गई। इसी के साथ एक ऐसी व्यवस्था पनपी जिसमें पैसे वाले व्यापारी ने पहले फुटपाथ के कोने में अपना सामान रखा, फिर धीरे-धीरे पूरे फुटपाथ को घेर लिया और बाद में उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उसने सड़क का एक हिस्सा भी हड़प लिया। इस पूरी प्रक्रिया में नगर निगम के अधिकारी, पुलिस के सिपाही और नेताओं के दलाल सब शामिल रहे। पैसे का लेन-देन होता रहा और अतिक्रमण बढ़ता रहा। मतलब यह है कि यह अतिक्रमण एक दिन में नहीं हुआ। इसकी जड़ें पचास साल पीछे तक जाती हैं।

    सरकारी तंत्र की कमज़ोरी और बड़े व्यापारियों का दबदबा

    असली त्रासदी यह है कि सरकारी सिस्टम केवल वहाँ काम करता है जहाँ कमज़ोर और बेसहारा लोग होते हैं। जब नगर निगम अतिक्रमण हटाने निकलता है तो उसका निशाना आमतौर पर वह गरीब रेहड़ी वाला या छोटा दुकानदार होता है जो किसी नेता की शरण में नहीं है, जिसके पास रिश्वत देने के पैसे नहीं हैं। जो बड़े व्यापारी हैं, जिन्हें धन्ना सेठ कहा जाता है, वे राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं, अधिकारियों की मुट्ठी गरम करते हैं और शांति से अपना अतिक्रमण बनाए रखते हैं। यही कारण है कि शहर के बड़े बाज़ारों में, जहाँ सबसे ज़्यादा अतिक्रमण है, वहाँ कार्रवाई कभी नहीं होती। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    पेड़ों का दर्दनाक अंत और कागज़ी विकास

    शहर से गायब हो गए फुटपाथ की तरह ही पेड़ों की कहानी है, जो और भी दर्दनाक है। जब सड़कें चौड़ी करने का काम शुरू हुआ तो सबसे पहले पेड़ों पर आरी चली। विकास के नाम पर हज़ारों पुराने और घने पेड़ काट दिए गए। जो पेड़ दशकों से छाया दे रहे थे, जो पक्षियों के घर थे, जो शहर की हवा को साफ रखते थे, वे सब एक झटके में ज़मीन पर आ गए। सड़क चौड़ी हो गई, गाड़ियाँ ज्यादा दौड़ने लगीं, लेकिन पैदल चलने वाले के लिए न छाया बची, न फुटपाथ बचा। नए पेड़ लगाने की बात ज़रूर होती है, सरकारी कागज़ों में लाखों पेड़ लगाने के दावे भी होते हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका नामोनिशान नहीं मिलता।

    योजनाएँ बनीं, पैसा बहा, पर पैदल यात्री कहाँ?

    सरकारें आईं और गईं, योजनाएँ बनती रहीं और फुटपाथ के नाम पर सरकारी खज़ाने से करोड़ों रुपये बहाए जाते रहे। कभी फुटपाथ को नए पत्थरों से ढका गया, कभी उस पर रंग-बिरंगी टाइलें लगाई गईं, कभी उसके किनारे लोहे की जालियाँ और लैंप पोस्ट खड़े किए गए। लेकिन इन सब कामों के बाद फुटपाथ पर पैदल यात्री के लिए जगह नहीं बनी। जो टाइलें लगाई गईं वे कुछ महीनों में उखड़ गईं, जो रोशनी के खंभे लगाए गए वे अँधेरे में डूब गए और जो फुटपाथ बने वे फिर से दुकानों और ठेलों से भर गए। पूरी कवायद केवल कागज़ी खानापूरी बनकर रह गई। शहरों की योजना बनाने वाले विभाग, जो जगह पैदल चलने वालों के लिए छोड़ते थे, उन्होंने भी धीरे-धीरे अपनी प्राथमिकता बदल ली। अब नई सड़कें बनती हैं तो उनमें गाड़ियों के लिए कई-कई लेन होती हैं लेकिन फुटपाथ या तो होता ही नहीं या इतना संकरा होता है कि दो लोग एक साथ नहीं चल सकते। यह मानसिकता बताती है कि हमारे नगर नियोजकों की नज़र में पैदल चलने वाला नागरिक दोयम दर्जे का है। उधर, अदालतें अक्सर पैदल यात्रियों के पक्ष में फैसला देती रहती हैं, परंतु यह लालफीताशाही की भेंट चढ़ जाते हैं।

    सर्वोच्च न्यायालय का फैसला और देश की नियति

    लब्बोलुआब यह है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला कि फुटपाथ पर चलना पैदल यात्रियों का मौलिक अधिकार है, भले ही नगर निगम से लेकर राज्य सरकार तक हर स्तर पर जवाबदेही तय करता हो, जिस अधिकारी की देखरेख में फुटपाथ पर अतिक्रमण हो, उसे ज़िम्मेदार मानता हो, जो व्यापारी सड़क को अपना गोदाम समझे, उस पर सख्त कार्रवाई हो, की बात करता हो, लेकिन हकीकत यही है कि अब काफी देर हो चुकी है। सबसे बड़ी बाधा तो यही है कि जो सरकार सड़क से अतिक्रमण हटाने और फुटपाथ खाली कराने की बात सोचती है, उसको विरोध स्वरूप लामबंद वोटर लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने से गुरेज नहीं करते हैं। यही देश की नियति है, जिसे आसानी से नहीं बदला जा सकता है।

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