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    क्या बेलपत्र डेंटल क्लिनिक कानून से ऊपर है? या स्वास्थ्य विभाग ने आंखें मूंद रखी हैं?

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJune 4, 2026No Comments3 Mins Read
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    क्या बेलपत्र डेंटल क्लिनिक कानून से ऊपर है? या स्वास्थ्य विभाग ने आंखें मूंद रखी हैं?

    अमन शांडिल्य

    जमशेदपुर के विजय गार्डन स्थित बेलपत्र डेंटल क्लिनिक को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल एक निजी क्लिनिक तक सीमित नहीं रह गए हैं। यह मामला धीरे-धीरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन पर बहस का विषय बनता जा रहा है। आरोपों के केंद्र में हैं डॉ. संगीता प्रकाश तिवारी और उनके पति आनंद प्रकाश, जिनके क्लिनिक के संचालन को लेकर विभिन्न स्तरों पर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

    आरोप है कि वर्ष 2022 से क्लिनिक के संचालन में आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाओं और पंजीकरण से जुड़ी अनियमितताएं रही हैं। यदि यह आरोप सही हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इतने लंबे समय तक संबंधित विभाग क्या कर रहे थे? क्या स्वास्थ्य विभाग, सिविल सर्जन कार्यालय और जिला प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी? और यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति या संस्थान को आरोप लगते ही दोषी नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि पत्रकारिता का धर्म आरोपों के साथ-साथ संबंधित पक्ष का पक्ष भी सामने लाना है। इस मामले में भी राष्ट्र संवाद द्वारा संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने का दावा किया गया है। लेकिन यदि आरोपों का खंडन नहीं आता और विभागीय स्तर पर भी स्पष्ट स्थिति सामने नहीं रखी जाती, तो स्वाभाविक रूप से संदेह और सवाल दोनों गहराते हैं।

    यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न डॉ. संगीता प्रकाश तिवारी या आनंद प्रकाश से अधिक उस व्यवस्था से है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के नियमन की जिम्मेदारी निभाती है। आखिर छोटे-छोटे क्लिनिकों और नर्सिंग होम पर नियमों के नाम पर त्वरित कार्रवाई होती है, नोटिस जारी होते हैं, लाइसेंस जांचे जाते हैं, लेकिन जब किसी चर्चित या प्रभावशाली प्रतिष्ठान का नाम सामने आता है तो जांच की रफ्तार धीमी क्यों पड़ जाती है?

    जनता यह जानना चाहती है कि क्या स्वास्थ्य कानून सभी के लिए समान हैं या फिर कुछ लोगों के लिए अलग व्यवस्था है? यदि क्लिनिक के पास सभी आवश्यक दस्तावेज और प्रमाणपत्र मौजूद हैं तो विभाग को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लेकिन यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो कार्रवाई में देरी स्वयं कई नए सवालों को जन्म देती है।

    इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा होना है। यहां मामला केवल कागजी औपचारिकताओं का नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा, चिकित्सा मानकों और सार्वजनिक विश्वास का है। स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है जवाबदेही भी।

    आज जमशेदपुर में चर्चा का विषय केवल बेलपत्र डेंटल क्लिनिक नहीं है। चर्चा का विषय यह है कि क्या प्रशासनिक तंत्र निष्पक्ष रूप से काम कर रहा है? क्या नियमों का पालन सुनिश्चित करने वाली एजेंसियां अपना दायित्व निभा रही हैं? और क्या प्रभावशाली लोगों के मामलों में भी वही कठोरता दिखाई जाती है, जो आम लोगों के मामलों में दिखाई जाती है?

    जब तक इन सवालों के स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब सामने नहीं आते, तब तक यह मामला केवल एक क्लिनिक पर लगे आरोपों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा बना रहेगा।

    जनता अब अफवाह नहीं, तथ्य चाहती है। आरोप नहीं, जांच चाहती है। और सबसे बढ़कर, स्वास्थ्य विभाग से जवाब चाहती है।

    क्या बेलपत्र डेंटल क्लिनिक कानून से ऊपर है? या स्वास्थ्य विभाग ने आंखें मूंद रखी हैं?
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