लेखक: तरुणा एस गौड़
एक तस्वीर ने भीतर तक झकझोर दिया। पेड़ के नीचे पड़े एक वरिष्ठ पत्रकार का निर्जीव शरीर, बगल में सस्ती पानी की बोतल और पास में सल्फास की गोलियां। यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का दृश्य नहीं था, बल्कि उस पेशे की त्रासदी का प्रतीक था जिसे कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था।
आज सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र एक टीवी एंकर की टिप्पणी है। अंजना ओम कश्यप और यूट्यूब पर पढ़ाने वाले शिक्षकों के बीच पैदा हुए विवाद पर लाखों शब्द लिखे जा रहे हैं। समर्थन और विरोध में अभियान चल रहे हैं। लेकिन इसी शोर के बीच राजेश अवस्थी जैसे पत्रकारों की मौत पर सन्नाटा पसरा हुआ है। यह सन्नाटा केवल समाज का नहीं, पत्रकार बिरादरी का भी है।
राजेश अवस्थी कोई चर्चित टीवी चेहरा नहीं थे। वे उन हजारों पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बड़े स्टूडियो, चमकदार स्क्रीन और मोटे वेतन से दूर, जमीनी पत्रकारिता के सहारे अपना जीवन चला रहे थे। नौकरी जाने के बाद आर्थिक संकट, लगातार घटते अवसर और मीडिया उद्योग की बदहाली ने उन्हें उस मोड़ पर पहुंचा दिया जहां जीवन से अधिक आसान उन्हें मृत्यु दिखाई दी।
गुमनाम पत्रकारों का जीवन संघर्ष
यह सच है कि मीडिया के कुछ बड़े चेहरों और संस्थानों ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। सत्ता के करीब दिखने वाले एंकरों और चैनलों ने पूरे पेशे की छवि पर प्रश्नचिह्न लगाया है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। देश भर में हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो न सत्ता के दरबार में हैं, न बड़े कॉरपोरेट के संरक्षण में। वे बेहद कम संसाधनों में, जोखिम उठाकर और आर्थिक असुरक्षा के बीच काम कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि जनता का गुस्सा अक्सर पूरे पेशे पर एक साथ निकलता है।
पत्रकारिता का संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। नोटबंदी के बाद विज्ञापन बाजार पर पड़ा असर, प्रिंट मीडिया की घटती आय, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की चुनौती और मुफ्त खबरों की बढ़ती संस्कृति ने मीडिया संस्थानों की आर्थिक नींव को कमजोर किया। लोगों ने अखबार खरीदना कम कर दिया, लेकिन खबरें पढ़ने की अपेक्षा बनी रही। नतीजा यह हुआ कि सबसे पहले असर पत्रकारों की नौकरियों और वेतन पर पड़ा।
डिजिटल युग ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन साथ ही पत्रकारिता के पारंपरिक मॉडल को भी कमजोर किया। आज एक वायरल वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच जाता है, जबकि वर्षों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट शायद उतने लोगों तक नहीं पहुंचती। इस बदलाव ने पत्रकारिता के आर्थिक ढांचे को झकझोर दिया है। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन पत्रकारों को हुआ जो संस्थागत सुरक्षा के बिना काम कर रहे थे।
संकट में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
अंजना ओम कश्यप के बयान पर असहमति हो सकती है। उनकी आलोचना भी हो सकती है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम पत्रकारिता के वास्तविक संकट पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं? क्या किसी पत्रकार की आर्थिक मजबूरी, बेरोजगारी और आत्महत्या पर उतना ही आक्रोश दिखाई देता है जितना किसी वायरल बयान पर?
राजेश अवस्थी की मौत केवल एक व्यक्ति की निजी त्रासदी नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता है जिसमें खबरें बनाने वाले लोग खुद खबर बनते जा रहे हैं। यह उस समाज के लिए भी चेतावनी है जो सूचना तो चाहता है, लेकिन सूचना देने वालों की परिस्थितियों को समझना नहीं चाहता।
पत्रकारिता: एकजुटता का अभाव और भविष्य की चुनौती
सबसे दुखद बात यह है कि पत्रकारों के बीच भी वह एकजुटता नहीं बन पाई जो दूसरे पेशों में दिखाई देती है। जब किसी शिक्षक, डॉक्टर या कर्मचारी वर्ग पर संकट आता है तो सामूहिक आवाज उठती है। पत्रकारिता में अक्सर यह आवाज बिखरी हुई दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि हजारों संघर्षरत पत्रकारों की पीड़ा कभी राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं बन पाती।
राजेश अवस्थी अब लौटकर नहीं आएंगे। लेकिन उनकी मौत एक सवाल छोड़ गई है—क्या हम पत्रकारिता को केवल टीवी स्टूडियो और चर्चित चेहरों से पहचानेंगे, या उन गुमनाम पत्रकारों को भी याद रखेंगे जो अपनी कलम और कैमरे के सहारे लोकतंत्र की आखिरी पंक्ति में खड़े हैं?
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में पत्रकार की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, वह समाज की संवेदनशीलता की भी एक परीक्षा होती है। और इस परीक्षा में हम शायद लगातार असफल होते जा रहे हैं।
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