धर्मांतरण के खिलाफ फिर मुखर हुए चंपाई सोरेन, उठाई संवैधानिक बदलाव की मांग
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने धर्मांतरण और आदिवासी पहचान के मुद्दे पर विस्तृत बयान जारी करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्कृति, आस्था और जीवनशैली पर लगातार संकट बढ़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले लगभग 180 वर्षों में ईसाई मिशनरियों द्वारा बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के कारण कई क्षेत्रों में आदिवासी परंपराएं कमजोर हुई हैं और कुछ स्थानों पर सरना स्थल एवं जाहेरस्थान उपेक्षित हो गए हैं।
चंपाई सोरेन ने कहा कि आदिवासी और मूलवासी समाज सदियों से आपसी सौहार्द और धार्मिक सह-अस्तित्व के साथ रहते आए हैं तथा एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करते हैं। उन्होंने दावा किया कि धर्मांतरण केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, संस्कृति, भाषा और परंपराओं से जुड़ा विषय है।
उन्होंने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ मिलने पर भी सवाल उठाते हुए डीलिस्टिंग अथवा संविधान के अनुच्छेद 342 में आवश्यक संशोधन की मांग की। साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में चर्च निर्माण के लिए भूमि हस्तांतरण की वैधता की जांच कराने की भी मांग उठाई।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर गंभीर पहल करने का आग्रह किया।

