लेखक: देवानंद सिंह
देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है, उसने लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा द्वारा राहुल गांधी पर ‘‘अराजकता फैलाकर’’ मोदी सरकार को गिराने की साजिश रचने का आरोप और इसके जवाब में कांग्रेस का लगातार सरकार पर हमला, यह दर्शाता है कि राजनीतिक विमर्श अब मुद्दों से अधिक व्यक्तिगत और वैचारिक टकराव का रूप ले चुका है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी विदेशी ताकतों और तथाकथित ‘‘टूलकिट गैंग’’ के प्रभाव में देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रही है कि केंद्र सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है और विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक हितों के अनुसार जनता के सामने नैरेटिव गढ़ने में जुटे हैं।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और जनता की समस्याओं को सामने लाने की होती है। उसी तरह सत्तापक्ष की जिम्मेदारी आलोचनाओं का जवाब तथ्यों और कार्यों के आधार पर देना है। लेकिन जब राजनीतिक बहस केवल ‘‘देशभक्ति बनाम देशविरोध’’ या ‘‘षड्यंत्र बनाम विकास’’ जैसे नारों तक सीमित हो जाती है, तब असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और सामाजिक असमानता जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा कम होती जा रही है।
राहुल गांधी की टिप्पणियों को लेकर भाजपा ने जिस तरह आक्रामक रुख अपनाया है, वह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह भी सच है कि किसी भी बयान की व्याख्या जिम्मेदारी और संतुलन के साथ होनी चाहिए। दूसरी ओर, विपक्ष को भी यह समझना होगा कि सरकार की आलोचना और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने के बीच भाषा और मर्यादा का ध्यान रखना आवश्यक है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन भय, अविश्वास और टकराव का वातावरण बनाना किसी के हित में नहीं हो सकता।
आज देश की जनता राजनीतिक दलों से केवल आरोपों की राजनीति नहीं, बल्कि समाधान और सकारात्मक राजनीति की अपेक्षा रखती है। जनता यह देखना चाहती है कि राजनीतिक दल रोजगार कैसे बढ़ाएंगे, शिक्षा को सुलभ कैसे बनाएंगे, किसानों की आय कैसे सुधरेगी और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित कैसे किया जाएगा। यदि राजनीति केवल सोशल मीडिया पोस्ट, आरोप और प्रत्यारोप तक सीमित रह जाएगी, तो लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होगी।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी शक्ति जनता की जागरूकता, संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और स्वस्थ राजनीतिक संवाद में निहित है। ऐसे समय में सभी दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और राष्ट्रहित की जिम्मेदारी भी है। राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें संवाद, शालीनता और संवैधानिक मर्यादा के भीतर रहकर व्यक्त करना ही लोकतंत्र की असली ताकत है।

