बंगाल विजय के गुमनाम सूत्रधार: रामचंद्र पांडेय का संगठन तप
देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती ताकत को अक्सर चुनावी रैलियों, बड़े नेताओं की लोकप्रियता या फिर विपक्ष के आरोपों के नजरिए से देखा जाता है। कोई इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति का परिणाम मानता है, तो कोई चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई और ईवीएम पर सवाल उठाकर भाजपा की सफलता को परिभाषित करने की कोशिश करता है। लेकिन राजनीति की सच्चाई केवल मंचों की रोशनी और टीवी कैमरों में नहीं छिपी होती। जीत की असली बुनियाद अक्सर उन गुमनाम चेहरों के संघर्ष पर टिकी होती है, जो वर्षों तक बिना किसी प्रचार और प्रशंसा के संगठन की जमीन तैयार करते हैं।
पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार के पीछे भी ऐसे ही एक गुमनाम किंतु अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व का नाम सामने आता है रामचंद्र पांडेय। ऐसा नाम, जिसे आम लोग शायद ही जानते हों, लेकिन संघ और भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजनीतिक इतिहास के जानकार बताते हैं कि 2018 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर कार्यक्रम में जाना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति में मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत था। कांग्रेस की पृष्ठभूमि से आने वाले और बंगाली समाज में अत्यंत सम्मानित प्रणब मुखर्जी का नागपुर जाना उस वर्ग के लिए बड़ा संदेश था, जो वर्षों से संघ और भाजपा को संदेह की दृष्टि से देखता था। इस पूरी रणनीति के पीछे रामचंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
दरअसल, 2016 के विधानसभा चुनाव के बाद संघ ने पश्चिम बंगाल में संगठन को मजबूत करने के लिए रामचंद्र पांडेय को अहम जिम्मेदारी सौंपी। कोलकाता को केंद्र बनाकर उन्होंने राज्य के विभिन्न हिस्सों में संपर्क अभियान शुरू किया। सिलीगुड़ी से लेकर आसनसोल, मुर्शिदाबाद, मालदा और कोलकाता की गलियों तक उन्होंने ऐसे लोगों से संवाद कायम किया, जो अपने पुराने राजनीतिक संगठनों से निराश थे। यही वह दौर था जब भाजपा बंगाल में धीरे-धीरे वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगी।
राजनीति में केवल भाषण या प्रचार से सफलता नहीं मिलती। संगठन की वास्तविक ताकत बूथ स्तर पर तैयार होती है। रामचंद्र पांडेय ने इसी स्तर पर काम किया। उन्होंने पुराने संघ कार्यकर्ताओं, भाजपा समर्थकों और वैचारिक रूप से असंतुष्ट लोगों को जोड़ने का प्रयास किया। कहा जाता है कि उन्होंने बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने को गहराई से समझते हुए ऐसे संपर्क बनाए, जिनका असर आने वाले वर्षों में दिखाई दिया।
रामचंद्र पांडेय का जीवन स्वयं में एक तपस्या की तरह माना जाता है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से निकलकर उन्होंने 1967 में संघ का प्रचारक जीवन शुरू किया। पिछले पांच दशकों में उन्होंने पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और बाद में पश्चिम बंगाल में संगठन विस्तार के लिए काम किया। कई बड़े भाजपा नेताओं और संगठन पदाधिकारियों के निर्माण में भी उनकी भूमिका बताई जाती है। मौजूदा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को शुरुआती दौर में संगठन से सक्रिय रूप से जोड़ने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी प्रचार या पद की इच्छा नहीं रखी। साधारण जीवन, सीमित संसाधन और लगातार प्रवास उनकी पहचान बने रहे। बंगाल में उन्होंने वर्षों तक कार्यकर्ताओं के घरों में रहकर संगठनात्मक बैठकों और संपर्क अभियानों को गति दी। यही कारण है कि भाजपा के लिए कभी बेहद कठिन मानी जाने वाली बंगाल की जमीन पर पार्टी धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई।
यह भी सत्य है कि किसी भी राजनीतिक सफलता का श्रेय केवल एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार के पीछे कई नेताओं, कार्यकर्ताओं और रणनीतिकारों की भूमिका रही है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में बड़े बदलाव अचानक नहीं होते। उनके पीछे वर्षों की मेहनत, वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक धैर्य काम करता है।
आज जब राजनीति त्वरित लोकप्रियता और सोशल मीडिया प्रचार के दौर में प्रवेश कर चुकी है, तब रामचंद्र पांडेय जैसे लोग यह याद दिलाते हैं कि संगठन की असली ताकत जमीन पर खड़े उन कार्यकर्ताओं में होती है, जो बिना किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लगातार काम करते रहते हैं। बंगाल में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय तक चले संगठनात्मक प्रयासों का भी नतीजा है।
राजनीति के इतिहास में अक्सर वही चेहरे याद रखे जाते हैं, जो मंच पर दिखाई देते हैं। लेकिन हर बड़ी जीत के पीछे कुछ ऐसे गुमनाम चेहरे भी होते हैं, जिनकी तपस्या इतिहास की दिशा बदल देती है। रामचंद्र पांडेय उन्हीं नामों में से एक माने जा सकते हैं।

