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    Home » परिसीमन के पेंच में फंसा महिला आरक्षण विधेयक | राष्ट्र संवाद
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    परिसीमन के पेंच में फंसा महिला आरक्षण विधेयक | राष्ट्र संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghApril 22, 2026No Comments8 Mins Read
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    महिला आरक्षण विधेयक
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    परिसीमन के पेंच में फंसा आधी आबादी का हक

    – महेन्द्र तिवारी
    भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आधी आबादी की आकांक्षाओं को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। सरकार द्वारा प्रस्तुत संविधान (131वां संशोधन) विधेयक का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2023 में पारित कानून को धरातल पर उतारने के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा तैयार करना था, परंतु नियति और राजनीतिक मतभेदों को कुछ और ही स्वीकार्य था। यह विधेयक मात्र एक विधायी दस्तावेज नहीं था, बल्कि यह 2029 के आम चुनावों से पूर्व देश की राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदलने वाला एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा था। इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने लोकसभा की सीटों की संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा था, जो सीधे तौर पर परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था।

     

    संसद के इस विशेष सत्र की पृष्ठभूमि अत्यंत नाटकीय रही। सरकार का तर्क था कि महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सीटों में वृद्धि अनिवार्य है ताकि किसी भी वर्तमान प्रतिनिधित्व को क्षति पहुँचाए बिना महिलाओं को 33 प्रतिशत स्थान सुनिश्चित किया जा सके। इस रणनीति के पीछे तर्क यह था कि जब सीटों की कुल संख्या बढ़कर 850 हो जाएगी, तब महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का आंकड़ा स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा और पुरुषों के प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों में भी भारी कटौती की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सत्ता पक्ष ने इसे एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम बताते हुए प्रचारित किया कि यह नारी शक्ति के वास्तविक वंदन का समय है। प्रधानमंत्री ने सदन की कार्यवाही शुरू होने से पूर्व ही यह स्पष्ट कर दिया था कि उनकी सरकार महिलाओं को उनका उचित अधिकार दिलाने के लिए कृतसंकल्प है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखकर इस पवित्र कार्य में सहयोग की अपील की थी। प्रधानमंत्री के उस पत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव था, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि विपक्षी दल इस विधेयक का समर्थन करते हैं, तो सरकार उन्हें इस सफलता का पूरा श्रेय देने के लिए एक कोरे धनादेश जैसा अधिकार देने को तैयार है। उनका आशय स्पष्ट था कि वे राजनीति से ऊपर उठकर इस सामाजिक सुधार को देखना चाहते थे।

    महिला आरक्षण विधेयक

    परंतु विपक्षी खेमे में इस विधेयक को लेकर भारी संशय और विरोध की स्थिति बनी हुई थी। कांग्रेस, समाजवादी दल और विभिन्न क्षेत्रीय दलों के गठबंधन ने सरकार की नीयत पर गंभीर प्रश्न उठाए। विपक्ष का सबसे प्रबल विरोध परिसीमन के आधार को लेकर था। सरकार ने इस संशोधन में सीटों के निर्धारण के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव रखा था। विपक्षी नेताओं का तर्क था कि वर्ष 2026 में 2011 की जनगणना के आधार पर भविष्य की राजनीति तय करना न केवल अतार्किक है, बल्कि यह उन राज्यों के साथ अन्याय है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने सदन में अपने संबोधन के दौरान अत्यंत तल्ख लहजे में कहा कि सरकार की मंशा महिलाओं को आरक्षण देने की कम और चुनावी लाभ लेने की अधिक प्रतीत होती है। उन्होंने इसे एक छलावा करार देते हुए मांग की कि जब तक नई जाति आधारित जनगणना नहीं हो जाती और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए इस 33 प्रतिशत के भीतर अलग से कोटा निर्धारित नहीं किया जाता, तब तक यह विधेयक सामाजिक न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा।

     

    विपक्ष की इस मांग ने सदन के भीतर और बाहर एक नई बहस को जन्म दे दिया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए तो आरक्षण का प्रावधान पहले से ही प्रस्तावित था, परंतु अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग श्रेणी की मांग ने सत्ता पक्ष को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया। उत्तर भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दलों ने इस मुद्दे पर लामबंदी तेज कर दी और यह स्पष्ट कर दिया कि बिना जातिगत डेटा के परिसीमन करना अंधेरे में तीर चलाने जैसा होगा। अमित शाह ने सरकार का पक्ष रखते हुए विपक्ष के इन तर्कों को विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाला बताया। उन्होंने सदन में जोर देकर कहा कि सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में किसी भी प्रकार की देरी नहीं चाहती और परिसीमन ही वह एकमात्र वैधानिक मार्ग है जिसके माध्यम से सीटों का न्यायोचित वितरण संभव है। उन्होंने विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा यदि उन्होंने इस अवसर को केवल राजनीतिक द्वेष के कारण गंवा दिया।

     

    घटनाक्रम अपनी चरम सीमा पर तब पहुँचा जब 16 अप्रैल को इस विधेयक पर मतदान की घोषणा हुई। संसद के गलियारों में तनाव स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता था। उस दिन कुल 528 सांसद सदन में उपस्थित थे। नियम के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक था। जब मतों की गणना हुई, तो परिणाम सरकार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थे। विधेयक के पक्ष में 298 मत पड़े, जबकि विपक्ष में 230 सांसदों ने मतदान किया। गणितीय दृष्टि से देखें तो दो-तिहाई बहुमत के लिए सरकार को कम से कम 352 मतों की आवश्यकता थी। इस प्रकार, मात्र 54 मतों के अंतर से यह ऐतिहासिक विधेयक गिर गया। यह भारतीय संसदीय इतिहास की एक विरल घटना थी क्योंकि 1990 के दशक के बाद यह पहला अवसर था जब कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में आवश्यक बहुमत न मिल पाने के कारण असफल हुआ हो।

     

    इस असफलता ने देश की राजनीतिक दिशा को एक नया मोड़ दे दिया। मतदान के तुरंत बाद सदन के भीतर और बाहर आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया। विपक्षी नेताओं ने इसे अपनी नैतिक विजय बताया और कहा कि सरकार को अब यह समझ लेना चाहिए कि वे बिना आम सहमति के देश की लोकतांत्रिक संरचना के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष ने इस हार को जनता की अदालत में ले जाने का निर्णय लिया। सरकार के प्रवक्ताओं ने इसे महिलाओं के अधिकारों पर विपक्ष का प्रहार बताया। उन्होंने जनता के बीच यह संदेश प्रसारित करना शुरू किया कि कैसे एक प्रगतिशील कानून को केवल संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए बलि चढ़ा दिया गया। विशेष रूप से 850 सीटों वाली नई संसद की परिकल्पना पर जो ग्रहण लगा, उसने भविष्य के चुनावों के लिए एक नया विमर्श तैयार कर दिया।

     

    इस पूरे विवाद में परिसीमन की तकनीकी जटिलताएं सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरीं। 543 से 850 सीटों की छलांग कोई सामान्य प्रशासनिक बदलाव नहीं था। इसके लिए राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण की आवश्यकता थी, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों में असंतोष की लहर उठने की संभावना थी। विपक्ष ने इसी बिंदु को अपनी ढाल बनाया और इसे क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा बना दिया। उनका तर्क था कि यदि 2011 की जनगणना को ही आधार माना गया, तो उत्तर भारत के राज्यों की सीटें अत्यधिक बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा। इस क्षेत्रीय अस्मिता और जातिगत आरक्षण के दोहरे पेच ने महिला आरक्षण जैसे सर्वमान्य मुद्दे को भी विवादित बना दिया।

     

    सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद भी इसकी गूंज शांत नहीं हुई। समाज के विभिन्न वर्गों में इस पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। महिला संगठनों ने जहाँ इस विधेयक के गिरने पर दुख व्यक्त किया, वहीं कुछ विशेषज्ञों ने इसे संवैधानिक शुचिता की जीत बताया। उनका मानना था कि बिना व्यापक विचार-विमर्श और पारदर्शी जनगणना के सीटों की संख्या में इतना बड़ा बदलाव करना भविष्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न कर सकता था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस परिणाम पर अपनी संक्षिप्त लेकिन गंभीर प्रतिक्रिया में कहा कि उनकी सरकार हार मानने वालों में से नहीं है और वे महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए भविष्य में और अधिक दृढ़ता के साथ प्रयास करेंगे।

     

    निष्कर्षतः 131वें संशोधन विधेयक की यह विफलता मात्र एक विधायी प्रक्रिया का थम जाना नहीं है अपितु यह उन गहन सामाजिक और क्षेत्रीय विषमताओं का प्रतिबिंब है जो हमारी राजनीति की आधारशिला रही हैं। क्या यह वास्तव में विपक्षी दलों की एकजुटता का ठोस परिणाम था अथवा शासन के रणनीतिक आकलन में कोई बड़ी चूक रह गई थी? इन जिज्ञासाओं के समाधान तो भविष्य की गर्त में छिपे हैं परंतु वर्तमान का यथार्थ यही है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का पूर्ण क्रियान्वयन अब एक अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गया है। यह संपूर्ण घटनाक्रम इस सत्य को रेखांकित करता है कि लोकतंत्र में केवल संख्या बल ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि संविधान की मर्यादा और सामाजिक न्याय की मांगें उससे कहीं अधिक ऊँचा स्थान रखती हैं। 16 अप्रैल की उस संध्या जब सदन की कार्यवाही समाप्त हुई तो वह अपने पीछे ऐसे अनेक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई जिनका उत्तर हम सभी को आने वाले समय में खोजना होगा।

     

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