*त्वरित टिप्पणी*
महिला आरक्षण बिल पर अटका लोकतंत्र का संतुलन
देवानंद सिंह
लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 का पारित न हो पाना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और विचारणीय क्षण है। 298 के समर्थन और 230 के विरोध के बावजूद बिल का दो-तिहाई बहुमत से पीछे रह जाना यह दर्शाता है कि संख्या से अधिक सहमति की राजनीति यहां निर्णायक होती है।
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है। वर्षों से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर व्यापक सहमति दिखाई देती रही है। फिर भी, जब इसे संवैधानिक रूप देने का अवसर आया, तो राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आ गए। यह विडंबना ही है कि जिस विषय पर सार्वजनिक रूप से लगभग सभी दल समर्थन जताते हैं, वही संसद के भीतर ठोस सहमति में तब्दील नहीं हो सका।

सरकार ने इस बिल को सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया, वहीं विपक्ष ने परिसीमन और राजनीतिक संतुलन से जुड़े सवाल उठाए। विपक्ष की आशंकाएं पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकतीं, क्योंकि परिसीमन की प्रक्रिया का सीधा असर राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के समीकरणों पर पड़ता है। वहीं, यह भी सच है कि इन आशंकाओं के कारण महिला आरक्षण जैसे मूल मुद्दे का अटक जाना एक व्यापक सामाजिक लक्ष्य को पीछे धकेलता है।
इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह भी है कि संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए केवल बहुमत नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति आवश्यक होती है। यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है, लेकिन साथ ही यह भी दर्शाता है कि संवाद और विश्वास की कमी किस तरह नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकती है।
महिला आरक्षण बिल का पास न होना अंत नहीं, बल्कि एक संकेत है राजनीतिक दलों को अपने-अपने रुख से आगे बढ़कर साझा रास्ता निकालना होगा। यदि वास्तव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना लक्ष्य है, तो उसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखना होगा।
बहरहाल यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि गंभीर संवाद का है, ताकि लोकतंत्र का यह अधूरा वादा आने वाले समय में पूरा किया जा सके।

