इंसानियत के खिलाफ संगठित अपराध का काला सच
1996-97 में जमशेदपुर भी किडनी रैकेट को लेकर राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा था
देवानंद सिंह
कानपुर में उजागर हुआ किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था, निगरानी तंत्र और सामाजिक असमानताओं पर गहरा सवाल है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गरीब और जरूरतमंद लोगों को लालच देकर उनकी किडनी कम कीमत पर ली गई और फिर मरीजों को कई गुना अधिक रकम में बेची गई। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि इंसानियत के मूल्यों के खिलाफ भी एक गंभीर अपराध है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरे नेटवर्क में निजी अस्पतालों, डॉक्टरों और बिचौलियों की कथित संलिप्तता सामने आई है। हालिया कार्रवाई में कुछ डॉक्टरों की गिरफ्तारी भी हुई है, जो यह दर्शाता है कि यह रैकेट केवल दलालों तक सीमित नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र के भीतर तक अपनी जड़ें जमा चुका है। यदि इलाज के नाम पर भरोसे की जगह सौदेबाजी होने लगे, तो आम आदमी का स्वास्थ्य व्यवस्था से विश्वास उठना तय है। एक आठवीं पास एंबुलेंस चालक का ‘फर्जी डॉक्टर’ बनकर इस नेटवर्क का हिस्सा होना व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
यह पहली बार नहीं है जब इस तरह का मामला सामने आया हो। सन् 1996-97 में जमशेदपुर भी किडनी रैकेट को लेकर राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा था। यानी दशकों बाद भी हालात में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है, जो चिंताजनक है। यह बताता है कि केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और संरचनात्मक सुधार की जरूरत है।
टेलीग्राम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए डोनर और रिसीवर को जोड़ना इस अपराध के आधुनिक और खतरनाक रूप को दर्शाता है। यह नेटवर्क अब तकनीक का सहारा लेकर और अधिक संगठित तथा गोपनीय होता जा रहा है।
अब जरूरत है कड़ी और पारदर्शी कार्रवाई की। दोषियों को सख्त सजा मिले, अवैध ट्रांसप्लांट में शामिल अस्पतालों की मान्यता रद्द हो, और निगरानी प्रणाली को तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जाए। साथ ही, अंगदान की वैध और पारदर्शी प्रक्रिया को बढ़ावा देकर इस काले कारोबार की जमीन को कमजोर करना होगा।
गरीबी और मजबूरी का फायदा उठाकर मानव अंगों का सौदा करने वालों के खिलाफ सिर्फ कानूनी ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी सख्त संदेश देना जरूरी है। क्योंकि जब इंसान की जिंदगी बाजार बन जाए, तो समाज को खुद अपने मूल्यों पर पुनर्विचार करना पड़ता है।

