जब एक मां रो पड़ी विधायक पूर्णिमा साहू के आंसुओं में दिखा बेटी का दर्द
आंसुओं में बहा आक्रोश एक मां की तरह टूटीं पूर्णिमा साहू
देवानंद सिंह
हजारीबाग की उस 12 वर्षीय मासूम के साथ हुई दरिंदगी ने सिर्फ एक परिवार नहीं, पूरे समाज के दिल को चीर दिया है। जमशेदपुर में जब इस घटना के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे, तो यह आक्रोश केवल विरोध नहीं था, बल्कि एक घायल समाज की चीख थी। इसी बीच जब विधायक पूर्णिमा साहू मंच पर बोलते-बोलते भावुक होकर रो पड़ीं, तो वह दृश्य किसी राजनीतिक बयान से कहीं ज्यादा मानवीय था। उस पल में एक जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक मां की पीड़ा साफ झलक रही थी—एक ऐसी मां, जो हर बेटी में अपनी बेटी को देख रही थी।
यह घटना हमें भीतर तक झकझोरती है। आखिर कैसी व्यवस्था है यह, जहां एक मासूम बच्ची सुरक्षित नहीं? त्योहारों की खुशियों के बीच जब एक बच्ची के साथ इतनी क्रूरता होती है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज के संवेदनहीन होते जाने का भी प्रमाण है। विधायक पूर्णिमा साहू का यह कहना कि उनका दिल एक मां और बहन के रूप में रो रहा है, दरअसल हर उस इंसान की भावना है, जो इस दर्द को महसूस कर पा रहा है।
लेकिन सवाल सिर्फ आंसुओं का नहीं, न्याय का है। क्या यह आक्रोश कुछ दिनों में शांत हो जाएगा? या फिर इस बार सच में बदलाव की शुरुआत होगी? जरूरत है कि सरकार और प्रशासन इस पीड़ा को समझें, दोषियों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाएं और यह भरोसा लौटाएं कि बेटियां सुरक्षित हैं। क्योंकि जब एक मां रोती है, तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं, पूरे समाज के भविष्य के लिए रोती है।

