एनसीईआरटी न्यायिक भ्रष्टाचार विवाद
देवानंद सिंह
देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में खड़ी संस्था एनसीईआरटी एक बार फिर विवादों के घेरे में है। पाठ्यपुस्तकों में किए गए बदलाव, विशेषकर “न्यायिक भ्रष्टाचार” जैसे अध्याय को लेकर उठे प्रश्नों ने सरकार और न्यायपालिका के बीच असहज स्थिति पैदा कर दी है। इस संदर्भ में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का यह बयान “जवाबदेही तय की जाएगी, न्यायिक भ्रष्टाचार पर अध्याय तैयार करने में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी” मामले को केवल शैक्षणिक विमर्श तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि इसे संस्थागत गरिमा और संवैधानिक संतुलन के प्रश्न से जोड़ देता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक गणराज्य में शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि मूल्य-निर्माण की आधारशिला है। स्कूल की किताबें विद्यार्थियों के मन में शासन, न्याय, अधिकार और कर्तव्य की पहली समझ गढ़ती हैं। ऐसे में यदि पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को लेकर यह आरोप लगे कि वह किसी संवैधानिक संस्था की गरिमा को प्रभावित करती है या संतुलन खो देती है, तो स्वाभाविक है कि प्रश्न उठेंगे। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि शिक्षा का उद्देश्य कठिन और जटिल विषयों से विद्यार्थियों को दूर रखना नहीं, बल्कि उन्हें समझने की बौद्धिक क्षमता देना है।
मंत्री का दूसरा बयान “हम न्यायपालिका का अत्यंत सम्मान करते हैं, न्यायालय के निर्देशों का पालन किया जाएगा” संकेत देता है कि सरकार इस विवाद को टकराव के बजाय समाधान की दिशा में ले जाना चाहती है। परंतु यहाँ मूल प्रश्न यह है कि पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और संस्थागत रूप से स्वायत्त है। यदि किसी अध्याय को हटाने या संशोधित करने का निर्णय लिया जाता है, तो क्या वह शैक्षणिक मानदंडों के आधार पर होगा या राजनीतिक-संवेदनशीलता के दबाव में? यही वह बिंदु है, जहाँ सार्वजनिक विश्वास की परीक्षा होती है।
न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। दोनों की अपनी-अपनी सीमाएँ और दायित्व हैं। यदि न्यायपालिका को यह प्रतीत होता है कि किसी पाठ्यसामग्री से उसकी संस्थागत साख प्रभावित हो सकती है, तो वह अपनी संवैधानिक भूमिका के तहत हस्तक्षेप कर सकती है। वहीं, कार्यपालिका का दायित्व है कि वह शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम के निर्धारण में विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता दे। टकराव तब पैदा होता है, जब संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप ले लेते हैं।

“न्यायिक भ्रष्टाचार” जैसे विषय पर चर्चा अपने-आप में वर्जित नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी संस्था की आलोचनात्मक समीक्षा अस्वस्थ नहीं, बल्कि स्वस्थ परंपरा का हिस्सा है। परंतु समीक्षा और सनसनी के बीच एक महीन रेखा होती है। यदि पाठ्यपुस्तक में प्रस्तुत सामग्री संदर्भहीन, अपूर्ण या पक्षपातपूर्ण हो, तो वह विद्यार्थियों के मन में अविश्वास की भावना पैदा कर सकती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे विषयों को तथ्यपरक, संतुलित और संदर्भ-सम्मत तरीके से प्रस्तुत किया जाए।
इस विवाद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है क्या एनसीईआरटी जैसी संस्थाएँ पर्याप्त शैक्षणिक स्वायत्तता का उपभोग कर पा रही हैं? वर्षों से यह बहस चलती रही है कि पाठ्यक्रम निर्माण को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाना चाहिए। यदि हर परिवर्तन के साथ पाठ्यपुस्तकों की दिशा बदलती रहेगी, तो शिक्षा की निरंतरता और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होंगी। विद्यार्थियों को स्थिर, शोध-आधारित और दीर्घकालिक दृष्टि वाली सामग्री चाहिए, न कि तात्कालिक विवादों से प्रभावित संशोधन।
सरकार द्वारा “जवाबदेही तय करने” की बात स्वागतयोग्य है, बशर्ते यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो। यदि किसी स्तर पर त्रुटि हुई है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। परंतु कार्रवाई का संदेश ऐसा नहीं होना चाहिए कि भविष्य में विषय-विशेषज्ञ संवेदनशील मुद्दों पर लिखने से हिचकें। शिक्षा का क्षेत्र भय-मुक्त बौद्धिक संवाद का क्षेत्र होना चाहिए।
अंततःयह विवाद केवल एक अध्याय या एक पुस्तक तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करता है कि हम अपने बच्चों को किस प्रकार का लोकतांत्रिक बोध देना चाहते हैं। क्या हम उन्हें यह सिखाएँगे कि संस्थाएँ अचूक हैं, या यह कि संस्थाएँ भी मानवीय सीमाओं के अधीन होती हैं और सुधार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है? एक परिपक्व लोकतंत्र अपने विद्यार्थियों को आलोचनात्मक सोच सिखाने से नहीं डरता।
इस समय आवश्यकता है संयम, संवाद और संस्थागत गरिमा की रक्षा की। सरकार, न्यायपालिका और शैक्षणिक समुदाय तीनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा का मंच राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा न बने। एनसीईआरटी की विश्वसनीयता, न्यायपालिका की गरिमा और विद्यार्थियों के भविष्य तीनों की रक्षा संतुलित और विवेकपूर्ण निर्णयों से ही संभव है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, परंतु उनका समाधान टकराव नहीं, संवाद से ही निकलता है।

