तेजस्वी यादव का ‘नौकरी मॉडल’ और आर्थिक यथार्थ का सवाल
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति में एक बार फिर वादों की झड़ी लग गई है। विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं, और विपक्षी खेमे में बैठे नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार नए-नए ऐलान कर जनता को लुभाने की रणनीति पर चल पड़े हैं। बेरोज़गारी, महंगाई और संविदा कर्मियों के शोषण जैसे मुद्दे पहले से ही जनता के बीच चर्चा में हैं। ऐसे में, तेजस्वी का हर घर में नौकरी और अब हर जीविका दीदी को स्थाई सरकारी कर्मचारी बनाने का वादा न सिर्फ़ राजनीतिक दृष्टि से साहसिक है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से चौंकाने वाला भी है।
तेजस्वी यादव ने बुधवार को ऐलान किया कि अगर, महागठबंधन की सरकार बनती है, तो बिहार की 1.36 करोड़ जीविका दीदियों को स्थायी सरकारी नौकरी दी जाएगी। अब वे केवल मानदेय पर निर्भर नहीं रहेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि इन दीदियों को हर महीने 30,000 रुपये वेतन के साथ सरकारी नौकरी की अन्य सभी सुविधाएं मिलेंगी। इतना ही नहीं, उन्हें 2,000 रुपये प्रति माह अन्य कार्यों के लिए और 5 लाख रुपये का जीवन बीमा भी मिलेगा। इसके अलावा जिन जीविका समूहों ने ऋण लिया है, उनके ब्याज को पूरी तरह माफ करने का वादा भी उन्होंने किया है।
यह घोषणा सिर्फ़ एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से एक विशाल सामाजिक तबके पर पकड़ बनाने की कोशिश है। बिहार में जीविका मिशन के तहत करीब 1.36 करोड़ महिलाएं कार्यरत हैं। यदि, तेजस्वी के वादे को शाब्दिक रूप में लिया जाए, तो इसका अर्थ है कि इतने ही परिवार सीधे तौर पर उनकी इस नीति से प्रभावित होंगे। यानी राजनीतिक गणित में देखें तो यह कदम लगभग राज्य के आधे मतदाताओं को संबोधित करता है।
लेकिन, इस घोषणा का आर्थिक पक्ष कुछ अलग कहानी कहता है। यदि, 1.36 करोड़ दीदियों को 30,000 रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है, तो राज्य सरकार पर हर महीने लगभग 4,08,000 करोड़ रुपये (4.08 लाख करोड़) का बोझ आएगा। यह राशि बिहार के पूरे वार्षिक बजट से कई गुना अधिक है। वित्तीय यथार्थ यही कहता है कि राज्य के पास इतनी बड़ी आर्थिक क्षमता नहीं है कि वह हर महीने इतना खर्च उठा सके। बिहार का कुल वार्षिक बजट लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये का है, यानी तेजस्वी के वादे पर अमल करने के लिए राज्य को अपनी सालाना आय से भी कहीं अधिक राशि खर्च करनी होगी।
सवाल यह उठता है कि क्या यह वादा राजनीतिक व्यवहार्यता के स्तर पर संभव है? या यह मात्र एक चुनावी सपना है, जो रोजगार और संविदा कर्मियों के शोषण जैसे वास्तविक मुद्दों को भुनाने की कोशिश है? तेजस्वी यादव के राजनीतिक करियर को देखें तो यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने इतनी बड़ी घोषणा की हो। 2020 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने कहा था कि अगर उनकी सरकार बनती है तो हर घर के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी। उन्होंने यहां तक कहा था कि 20 महीने में बिहार में कोई भी बेरोज़गार नहीं रहेगा। उस समय यह बयान युवाओं में उत्साह तो जगाता था, पर व्यवहारिकता के स्तर पर इसे भी एक लोकलुभावन घोषणा माना गया था। सरकार न बनने के बाद यह वादा हवा में ही रह गया।
अब 2025 के चुनावों से पहले तेजस्वी यादव एक बार फिर उसी दिशा में लौटते दिख रहे हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार उन्होंने बेरोज़गारी के साथ महिला सशक्तिकरण को जोड़ दिया है। बिहार में जीविका दीदियों का नेटवर्क ग्रामीण स्तर पर बेहद सशक्त है। यह महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए आर्थिक गतिविधियों में जुड़ी हैं और स्थानीय स्तर पर सामाजिक परिवर्तन की वाहक मानी जाती हैं। इस वर्ग को स्थाई सरकारी नौकरी देने का वादा करके तेजस्वी यादव ने एक ही तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। जैसे- महिला वोट बैंक को अपने पक्ष में करना, ग्रामीण इलाकों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना, और मौजूदा सरकार को संवेदनहीन व नौकरी विरोधी बताना।
तेजस्वी का अगला निशाना संविदाकर्मी हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार इन संविदाकर्मियों का शोषण करती है, उनकी तनख्वाह से 18 प्रतिशत जीएसटी तक वसूला जाता है, और उन्हें किसी भी समय नौकरी से निकाल दिया जाता है। तेजस्वी ने वादा किया कि वे उर्मिला एजेंसी और बेलट्रॉन कंपनी के जरिए विभिन्न विभागों में बहाल संविदाकर्मियों को भी स्थाई सरकारी कर्मचारी बनाएंगे। इस बयान के जरिए वे सीधे तौर पर राज्य के लाखों अस्थाई कर्मचारियों को संबोधित कर रहे हैं, जो लंबे समय से स्थायित्व की मांग कर रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से यह रणनीति बेहद चतुराई भरी है। तेजस्वी जानते हैं कि बिहार में सरकारी नौकरी का आकर्षण सिर्फ़ एक रोजगार का विकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। बेरोज़गार युवाओं और अस्थाई कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ा है, और सरकार पर भर्ती प्रक्रिया में देरी तथा कमीशनखोरी के आरोप पहले से ही लगते रहे हैं। ऐसे में तेजस्वी का यह बयान एक भावनात्मक हथियार बन जाता है, ऐसा वादा, जो जनता की अपेक्षाओं और नाराजगी दोनों को एक साथ संबोधित करता है, लेकिन समस्या वहीं लौट आती है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियां देना वित्तीय रूप से संभव है? बिहार पहले से ही राजकोषीय घाटे और केंद्रीय अनुदान पर निर्भरता से जूझ रहा है।
राज्य की अपनी कर वसूली सीमित है, और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर पहले से ही बड़ा खर्च होता है। यदि, 1.36 करोड़ दीदियों और लाखों संविदाकर्मियों को स्थाई नौकरी दी जाती है, तो राज्य की वित्तीय संरचना चरमरा सकती है, इससे विकास योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर खर्च में भारी कटौती करनी पड़ सकती है। फिर भी, चुनावी राजनीति में संभावना नहीं, बल्कि संदेश मायने रखता है। तेजस्वी का यह वादा जनता को यह संदेश देता है कि वे रोजगार देने वाली राजनीति के पैरोकार हैं, जबकि मौजूदा सरकार विकास की बातें करती है, लेकिन रोजगार की हकीकत से दूर है। इसका राजनीतिक असर क्या होगा, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतना तय है कि तेजस्वी यादव ने एक बार फिर बिहार की चुनावी बहस को नौकरी, संविदा कर्मी और महिला सशक्तिकरण की ओर मोड़ दिया है। यह रणनीति भले ही आर्थिक दृष्टि से अव्यावहारिक लगे, लेकिन जनभावनाओं के स्तर पर यह गहराई से असर डाल सकती है।
बिहार की राजनीति में यह नया दौर है जहां चुनावी घोषणाएं सिर्फ़ आंकड़ों की बात नहीं करतीं, बल्कि भावनाओं और उम्मीदों को बेचती हैं। तेजस्वी यादव इस समय उसी कला का उपयोग कर रहे हैं, बेरोज़गारों को सपनों का पैकेज, संविदाकर्मियों को स्थायित्व का आश्वासन, और महिलाओं को सम्मान व सुरक्षा का वादा।
पर सवाल यही है — क्या इन सपनों की नींव यथार्थ पर टिक पाएगी? या फिर यह भी बिहार की राजनीति में एक और अगर सरकार बनती है तो… वाला वादा बनकर रह जाएगा? जनता को यह तय करना होगा कि उसे वादा करने वाली राजनीति चाहिए या वास्तविक समाधान देने वाली शासन व्यवस्था, क्योंकि बिहार को अब वादों की नहीं, जवाबदेही की ज़रूरत है।

