देवानंद सिंह
बिहार की सियासत में चुनाव सिर्फ सीटों का खेल नहीं होता, यह सम्मान, अस्तित्व और भविष्य की राजनीति का संग्राम भी होता है। गठबंधन की राजनीति में हिस्सेदारी का खेल दरअसल बार्गेनिंग के उच्च शिखर से खेला जाता है। यह राजनीति अब उतनी सीधी नहीं रही, जहां साथ का मतलब नीतियों का मेल हुआ करता था। अब साथ का अर्थ सीटों की संख्या, मंत्री पद और अपने राजनीतिक वारिस की भूमिका से तय होता है। यही तस्वीर एनडीए और महागठबंधन दोनों खेमों में देखने को मिल रही है।
इस बार बिहार के चुनावी रण में जब गठबंधन के घटक दलों ने अपनी मांगें रखनी शुरू कीं, तो ऐसा लगा मानो हर दल अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए मैदान में उतर आया हो। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर (एचएएम-से) के संस्थापक जीतन राम मांझी और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा दोनों अपने-अपने तरीके से ‘सम्मानजनक हिस्सेदारी’ की मांग करते नजर आए।
मांझी की राजनीति को समझने के लिए उनके दो सपनों को समझना जरूरी है। पहला, अपनी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाना, और दूसरा, अपने पुत्र संतोष सुमन को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाना। ये दोनों सपने आपस में गहराई से जुड़े हैं। अगर, पार्टी को ज्यादा सीटें मिलेंगी, तो बेहतर प्रदर्शन से वह राष्ट्रीय पार्टी की योग्यता हासिल कर सकती है, और अगर दलित नेतृत्व की मजबूती दिखेगी, तो उपमुख्यमंत्री की मांग को राजनीतिक वैधता मिल जाएगी।
शुरुआत में मांझी ने 25 से 30 सीटों की मांग रखी थी। उनकी गणित सीधी थी। अगर, 20 सीटें भी जीत ली जाएं तो पार्टी की हैसियत एक बार फिर राज्य की राजनीति में निर्णायक हो जाएगी। वे एनडीए रणनीतिकारों को बार-बार याद दिलाते रहे कि पिछली विधानसभा में उनका स्ट्राइक रेट 60 प्रतिशत और लोकसभा में 100 प्रतिशत रहा है। उनका संकेत साफ था कि हम भले छोटे हैं, पर जीत दिलाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन राजनीति सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होती, यह संदेश और मनोविज्ञान का भी खेल है। मांझी को पता था कि सीटों के सवाल पर खुलकर टकराव से नुकसान ज्यादा होगा। इसलिए उन्होंने न तो कभी एनडीए छोड़ने की धमकी दी, और न ही सार्वजनिक रूप से असंतोष जाहिर किया। उनकी रणनीति थी, दबाव बनाए रखो, पर पुल मत तोड़ो।
वर्तमान राजनीति की एक दिलचस्प प्रवृत्ति यह है कि दिग्गज नेता अब अपने वारिसों को स्थापित करने में जुटे हैं। लालू यादव ने तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी दिलाकर यह रास्ता पहले ही बना दिया। रामविलास पासवान ने अपने बेटे चिराग पासवान को एलजेपी की कमान देकर यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी को नेतृत्व देना अब मजबूरी नहीं, रणनीति है।
मांझी भी इसी रेखा पर चल रहे हैं। संतोष सुमन को उपमुख्यमंत्री बनाने की उनकी चाहत महज पारिवारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ी है। उन्हें पता है कि उम्र और दौर दोनों तेजी से बदल रहे हैं। अगर उन्होंने अपने बेटे को इस चुनावी बिसात पर स्थापित नहीं किया, तो शायद अगली बार उनके दल के पास न तो नेतृत्व बचेगा, न पहचान, इसीलिए सीटों की संख्या उनके लिए केवल चुनावी लक्ष्य नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक आवश्यकता है। 25 से 30 सीटों पर लड़ने की मांग के पीछे उनका तर्क यह था कि तभी वे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। भारतीय चुनाव आयोग के नियम के अनुसार किसी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तब मिलता है जब वह चार राज्यों में मान्यता प्राप्त हो या कुल वोटों का 6% और चार लोकसभा सीटें हासिल करे। मांझी इस दिशा में पहला कदम बिहार से ही उठाना चाहते हैं।
गठबंधन के दौरान बार्गेनिंग सिर्फ शीर्ष स्तर का खेल नहीं होती, इसका असर निचले स्तर तक जाता है। जब कोई नेता अधिक सीटों की मांग करता है, तो वह अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश भी देता है कि हमारे संघर्ष का मूल्य है, हम हाशिए पर नहीं। इस तरह का दबाव राजनीतिक संगठन को जीवंत रखता है। मांझी के आक्रामक बयानों का उद्देश्य यही था, अपने कैडर को ऊर्जा देना। उन्होंने यह एहसास दिलाया कि पार्टी के हर कार्यकर्ता का संघर्ष किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सामूहिक स्वप्न का विस्तार है। यह स्वप्न है, दलित नेतृत्व की राजनीतिक मान्यता और सामाजिक बराबरी का प्रतीक बनना।
अगर, मांझी राजनीति में भावनात्मक बार्गेनिंग का चेहरा हैं, तो उपेंद्र कुशवाहा तर्कसंगत रणनीति के प्रतीक हैं। बिहार की राजनीति में वे हमेशा एक ‘थिंकिंग पॉलिटिशियन’ के रूप में पहचाने जाते रहे हैं। इस बार भी उन्होंने न तो सीटों के लिए उतावला व्यवहार दिखाया, न ही असंतोष का नाटक किया। कुशवाहा जानते थे कि इस बार का चुनाव भाजपा के लिए बेहद निर्णायक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों इस लड़ाई को किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं। ऐसे में, कुशवाहा के लिए यह समय था संयम और रणनीतिक धैर्य का। उन्होंने कभी भी गठबंधन के बाहर जाने की बात नहीं की, बल्कि सम्मानजनक हिस्सेदारी की मांग को शालीनता के साथ दोहराते रहे।
उनका मिशन सीटों की राजनीति से आगे बढ़कर शिक्षा सुधार का है। वे बार-बार यह कह चुके हैं कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था को बदले बिना राज्य की राजनीति में वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं। यही वजह है कि वे नीतीश कुमार से मतभेद होने के बावजूद इस मिशन को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आज भी वे मानते हैं कि शिक्षा सुधार के अपने विजन को मूर्त रूप देने के लिए उन्हें केंद्र की भाजपा सरकार का सहयोग जरूरी है।
इसलिए, जब भाजपा ने उन्हें गठबंधन में सीमित हिस्सेदारी दी, तो उन्होंने इसे ‘न्यायोचित और यथार्थवादी’ मानकर स्वीकार कर लिया। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तय किए गए गठबंधन नियम को उन्होंने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसका राजनीतिक अर्थ भी समझा। यह नियम एक तरह से छोटे दलों के लिए सम्मान की न्यूनतम गारंटी है, और कुशवाहा इस सच्चाई को बखूबी समझते हैं। बिहार की राजनीति में गठबंधन की मजबूरी और सम्मान का समीकरण एक साथ चलता है। कोई भी बड़ा दल यह नहीं चाहता कि उसका छोटा सहयोगी नाराज होकर विरोधी खेमे में चला जाए। वहीं छोटा दल भी यह जानता है कि गठबंधन छोड़ने का मतलब होगा राजनीतिक अस्तित्व का संकट, इसलिए दोनों के बीच बार्गेनिंग की यह रस्साकशी अंततः सम्मानजनक समझौते पर जाकर टिकती है।
मांझी और कुशवाहा दोनों इस समीकरण को भलीभांति समझते हैं। मांझी जानते हैं कि एनडीए छोड़ना उनके राजनीतिक भविष्य के लिए जोखिम भरा होगा, जबकि कुशवाहा समझते हैं कि भाजपा के सहयोग से ही वे अपने मिशन को पूरा कर सकते हैं। दोनों नेताओं का दृष्टिकोण अलग जरूर है, पर लक्ष्य एक ही—सम्मान और स्थायित्व का।
अगर, पिछले एक दशक के गठबंधन इतिहास को देखें, तो बार्गेनिंग की भाषा में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले सीटों की मांग को लेकर खुली धमकियां दी जाती थीं, अगर इतनी सीटें नहीं मिलीं तो हम अलग रास्ता अपनाएंगे। अब यह भाषा बदलकर सम्मानजनक हिस्सेदारी की मांग में तब्दील हो चुकी है। यह शब्दावली शालीन है, पर संदेश स्पष्ट, हम बराबरी चाहते हैं। यह परिवर्तन इसलिए भी हुआ है, क्योंकि आज का मतदाता गठबंधन की स्थिरता को महत्व देता है, जो नेता हर बार नाराज होकर गठबंधन तोड़ देता है, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। मांझी और कुशवाहा दोनों ने इस नई राजनीतिक संवेदना को समझा है।
बिहार की राजनीति में जो सबसे दिलचस्प तत्व है, वह है संघर्ष का सौंदर्य, जहां विरोध भी रणनीति है, और मौन भी संदेश। जीतन राम मांझी की दिनकर प्रेरित कविता हो या उपेंद्र कुशवाहा की संयमित चुप्पी, दोनों दरअसल एक ही कहानी कहते हैं, हम अपने हिस्से का सम्मान चाहते हैं, पर गठबंधन को अस्थिर नहीं करेंगे।
यह परिपक्वता बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ती है। यह बताती है कि छोटे दलों ने अब भावनाओं के बजाय रणनीति से सोचना सीख लिया है। कुल मिलाकर, बिहार की वर्तमान चुनावी परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन राजनीति अब ‘टकराव’ की नहीं बल्कि ‘सम्मान आधारित सहभागिता’ की दिशा में बढ़ रही है। जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता इस नई राजनीति के प्रतीक बन रहे हैं, जहां सीटों की मांग भावनात्मक भी है, रणनीतिक भी, लेकिन विनाशकारी नहीं।
मांझी के सपने अभी अधूरे हैं, संतोष सुमन का राजनीतिक उदय और एचएएम-से का राष्ट्रीय दर्जा पर उनकी रणनीति बताती है कि वे जल्दबाज़ नहीं हैं। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा की दृष्टि शिक्षा सुधार जैसे दीर्घकालिक मिशन पर टिकी है, जहां राजनीति माध्यम है, उद्देश्य नहीं।
बिहार की यह नई तस्वीर बताती है कि अब गठबंधन सिर्फ सत्ता का समीकरण नहीं रहा, बल्कि अस्तित्व और सम्मान का तंत्र बन गया है। यह राजनीति का वह दौर है जहां गठबंधन छोड़ने की धमकी की जगह सम्मानजनक हिस्सेदारी ने ले ली है, और शायद यही बिहार की सियासत का नया संस्कार है, जश्न संघर्ष भी संवाद है, और बार्गेनिंग भी परिपक्वता की पहचान।

