बिहार में मोदी की ‘कौशल क्रांति’ वास्तविक बदलाव या चुनावी प्रयोग देवानंद सिंह
बिहार के चुनावी परिदृश्य में इस बार एक पुराना जख्म फिर से ताजा हो गया है, और यह जख्म है, रोजगार के लिए हो रहा पलायन। यह कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन इस बार इसका भावनात्मक और राजनीतिक तापमान कहीं अधिक ऊंचा है। दिल्ली, पंजाब, गुजरात या महाराष्ट्र की फैक्ट्रियों और निर्माण स्थलों पर काम करते बिहार के युवाओं की कहानी दशकों से चली आ रही है। परंतु इस बार यह कहानी बिहार की चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा विमर्श बन चुकी है।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पर विपक्ष का यह आरोप रहा है कि वह राज्य से पलायन रोकने में असफल रहा है। कांग्रेस, राजद और अब प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, तीनों इस मुद्दे पर खुलकर हमलावर हैं। राजद का कहना है कि भाजपा और जद(यू) ने डेढ़ दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहकर भी बिहार के युवाओं को आत्मनिर्भर नहीं बना पाया। कांग्रेस इसे केंद्र की विफल नीतियों का परिणाम बताती है। वहीं, प्रशांत किशोर ने इसे बिहार की व्यवस्था की विफलता करार दिया है, जो न तो शिक्षा दे पाई, न रोजगार।
इसी माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटना में एक बड़ा आयोजन किया। उन्होंने बिहार में कर्पूरी ठाकुर कौशल विकास विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया और 62,000 करोड़ रुपये की योजनाओं की घोषणा की। यह आयोजन प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह सिर्फ एक विश्वविद्यालय का उद्घाटन नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था कि अब बिहार में पलायन नहीं, प्रगति होगी।
मोदी ने इस मंच से दो प्रमुख राष्ट्रीय योजनाएं शुरू कीं, पहला, पीएम सेतु योजना और दूसरा, कौशल विकास लैब्स का राष्ट्रीय नेटवर्क। पीएम सेतु योजना के तहत देशभर के आईटीआई संस्थानों को उद्योगों से जोड़ा जाएगा ताकि छात्र सिर्फ तकनीकी शिक्षा न लें, बल्कि उद्योग जगत की वास्तविक ज़रूरतों के अनुसार प्रशिक्षित हों। इस योजना पर 60,000 करोड़ रुपये का निवेश होगा। साथ ही, देशभर के नवोदय विद्यालयों और एकलव्य मॉडल स्कूलों में 1,200 स्किल लैब्स की स्थापना की गई है।
इस आयोजन की खासियत यह रही कि यह आईटीआई पास छात्रों के दीक्षांत समारोह के साथ जोड़ा गया, यानी मोदी ने उन युवाओं से सीधे संवाद किया जो रोजगार के मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं को माइग्रेशन फॉर सर्वाइवल नहीं बल्कि मोबिलिटी फॉर एक्सीलेंस की दिशा में बढ़ाना होगा। यह वाक्य सिर्फ भाषण का हिस्सा नहीं था, बल्कि बिहार के संदर्भ में इसका गहरा राजनीतिक अर्थ था। इस विश्वविद्यालय का नाम कर्पूरी ठाकुर के नाम पर रखा गया है, एक ऐसा नाम, जो बिहार की सामाजिक चेतना में गहराई से रचा-बसा है। पिछड़े वर्गों और वंचितों की राजनीति के प्रतीक कर्पूरी ठाकुर का नाम इस्तेमाल करना भाजपा-जद(यू) गठबंधन के लिए एक रणनीतिक कदम भी है।
एक ओर इससे ओबीसी और अतिपिछड़ा वर्ग को यह संदेश देने की कोशिश है कि एनडीए सामाजिक न्याय की राजनीति से विमुख नहीं है, वहीं दूसरी ओर यह नीतीश कुमार के राजनीतिक आधार को भी मजबूत करने का प्रयास है। यह वही वर्ग है जो परंपरागत रूप से एनडीए का वोट बैंक नहीं रहा, परंतु 2010 के बाद से धीरे-धीरे भाजपा-जद(यू) गठबंधन के साथ आना शुरू हुआ। कर्पूरी ठाकुर विश्वविद्यालय के उद्घाटन के साथ मोदी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि एनडीए की विकास नीतियों में सामाजिक न्याय का भी स्थान है, यानी यह महज आर्थिक विकास का एजेंडा नहीं, बल्कि सम्मान और अवसर का एजेंडा है।
बिहार से पलायन की कहानी लंबे समय से देश की आर्थिक असमानता का प्रतीक रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार के लगभग 1.7 करोड़ लोग अपने गृह राज्य से बाहर रहकर काम करते हैं। यह देश में कुल प्रवासी श्रमिकों का लगभग 18% है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्टों में भी बिहार को सप्लायर ऑफ मैनुअल लेबर कहा गया है। राज्य के श्रम बल में लगभग 60% लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, और इनमें से अधिकांश दूसरे राज्यों में मजदूरी या ठेका कार्य करते हैं।
यह प्रवृत्ति केवल रोजगार की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि संरचनात्मक असमानता का दर्पण है, कमजोर औद्योगिक आधार, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, और शिक्षा-कौशल के बीच बड़ा अंतर। नीतीश कुमार सरकार 2006 में औद्योगिक नीति लाई, फिर 2016 में उसका संशोधित संस्करण, लेकिन बिहार में औद्योगीकरण का ठोस आधार अब भी नहीं बन पाया। पावर सप्लाई, लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियों ने निवेशकों को दूर रखा। प्रधानमंत्री मोदी की हालिया घोषणाएं निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं बिहार के पलायन संकट को वास्तविक रूप से कम कर पाएंगी या यह महज चुनावी घोषणा बनकर रह जाएंगी?
पीएम सेतु योजना का उद्देश्य उद्योग और शिक्षा को जोड़ना है, यानी स्किल टू जॉब का पुल बनाना। परंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या बिहार के आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थानों में पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षक हैं? वर्तमान में बिहार के लगभग 140 सरकारी और 500 निजी आईटीआई हैं, परंतु इनमें से आधे से अधिक में प्रशिक्षकों की भारी कमी है।
इसी तरह, कौशल विकास विश्वविद्यालय का विचार दूरगामी है, परंतु अगर राज्य में उद्योग नहीं बढ़ते तो कौशल विकास का फायदा सीमित रहेगा।
सवाल यह भी है कि क्या बिहार के छात्र अपने ही राज्य में रोजगार पाने के लिए उद्योगों के स्थापित होने तक रुकेंगे, या फिर बेहतर अवसरों की तलाश में देश के अन्य हिस्सों में चले जाएंगे? मोदी ने अपने भाषण में नीतीश सरकार की स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की प्रशंसा की। अब इस योजना के तहत छात्रों को मिलने वाला ऋण पूरी तरह ब्याज-मुक्त कर दिया गया है। इसके अलावा, छात्रवृत्ति राशि को 1,800 रुपये से बढ़ाकर 3,600 रुपये कर दिया गया है।
यह निश्चित रूप से छात्रों के लिए राहत की खबर है, लेकिन शिक्षा और कौशल के इस निवेश को तभी सार्थक कहा जा सकता है जब यह रोजगार सृजन से जुड़ सके।
बिहार के लाखों युवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि वे पढ़ नहीं पाते, बल्कि यह कि पढ़ने के बाद उनके राज्य में रोजगार नहीं है। बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव तेजी से नजदीक आ रहा है। विपक्ष ने पलायन को अपनी मुख्य रणनीति का केंद्र बना लिया है।
तेजस्वी यादव लगातार कह रहे हैं कि बिहार का नौजवान दिल्ली में मजदूर और गुजरात में ड्राइवर बन गया है, क्योंकि नीतीश और मोदी ने बिहार को ठगा है। कांग्रेस इसे केंद्र की रोजगारहीन वृद्धि कहती है, जबकि प्रशांत किशोर इसे बिहार की शासन व्यवस्था की नैतिक विफलता मानते हैं।
ऐसे माहौल में मोदी की यह पहल न सिर्फ एक आर्थिक कार्यक्रम, बल्कि एक राजनीतिक जवाब के रूप में भी देखी जा रही है। एनडीए इस आयोजन को यह संदेश देने के लिए भुना रहा है कि वह सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि समाधान लेकर आया है। बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यह राज्य जनसंख्या के लिहाज से संपन्न है, परंतु आर्थिक अवसरों के लिहाज से गरीब। राज्य की युवा आबादी लगभग 60% है, यानी यह जनसांख्यिकीय लाभांश हो सकता था, परंतु रोजगार की कमी ने इसे जनसांख्यिकीय बोझ बना दिया।
जब भी चुनाव आते हैं, बिहार में रोजगार, पलायन, शिक्षा और बुनियादी ढांचे की बातें होती हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही ये मुद्दे फिर विकास योजनाओं की फाइलों में दब जाते हैं। मोदी की हालिया घोषणाएं अगर सही मायने में लागू होती हैं, तो यह बिहार के इतिहास की दिशा बदल सकती हैं, लेकिन अगर यह सिर्फ राजनीतिक आडंबर रह गया, तो यह युवाओं के भरोसे की एक और असफलता होगी।
कुल मिलाकर, आज का बिहार दो भावनाओं आशा और आशंका के बीच खड़ा है। एक ओर प्रधानमंत्री मोदी की घोषणाएं और नीतीश सरकार की नीतियां राज्य को नई दिशा देने का दावा करती हैं, और दूसरी ओर, पलायन का पुराना दर्द अब भी जीवंत है। बिहार के युवाओं के लिए यह सवाल अब सबसे बड़ा है कि क्या उन्हें अपने ही राज्य में सम्मानजनक रोजगार और अवसर मिलेंगे, या वे आने वाले वर्षों में भी किसी और राज्य के निर्माण स्थलों पर अपनी ताकत झोंकते रहेंगे? बिहार की राजनीति में यह प्रश्न सिर्फ एक चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रश्न बन चुका है। अगर, मोदी की कौशल क्रांति और नीतीश का शिक्षा विस्तार वास्तव में धरातल पर उतरे, तो शायद यह पहली बार होगा, जब बिहार का युवा अपने राज्य में रहकर अपनी कहानी लिखेगा, पलायन की नहीं, प्रगति की।

