देवानंद सिंह
लद्दाख में जो ताज़ा घटनाक्रम सामने आया है, वह न सिर्फ़ क्षेत्रीय राजनीति बल्कि भारत की संघीय संरचना और संवैधानिक विमर्श के लिए भी एक गहरी चुनौती पेश करता है। चार लोगों की मौत, दर्जनों घायल, पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक टकराव, यह तस्वीर उस लद्दाख की है, जिसे हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देकर नई दिल्ली ने शांति और विकास की नई प्रयोगशाला बताया था, लेकिन 27 अगस्त 1989 के बाद बुधवार का दिन वहां का सबसे हिंसक साबित हुआ। यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है कि क्या यह उभार केवल तात्कालिक आक्रोश है या लद्दाख की जनभावनाओं में गहराई से बैठी असुरक्षा और असंतोष का विस्फोट है।
लद्दाख की चार प्रमुख मांगें, जिसमें पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची का विस्तार, लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें और रोजगार में आरक्षण किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अव्यावहारिक नहीं कही जा सकतीं, बल्कि इन्हें वहां की भौगोलिक, सांस्कृतिक और जनजातीय विशेषताओं के परिप्रेक्ष्य में समझना ज़रूरी है। संविधान का अनुच्छेद 244 और छठी अनुसूची, विशेष रूप से जनजातीय और सांस्कृतिक विविधता वाले क्षेत्रों को स्वायत्तता देने का प्रावधान करता है। असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में इसका प्रयोग इसलिए हुआ, क्योंकि वहां जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न गहरे थे। लद्दाख भी इनसे अलग नहीं है। बौद्ध, मुस्लिम और अन्य स्थानीय समुदायों का ताना-बाना, हिमालयी भौगोलिक स्थिति और सीमावर्ती संवेदनशीलता, ये सब मिलकर उसे एक विशिष्ट पहचान देते हैं, लेकिन अब तक यह व्यवस्था वहां लागू नहीं की गई।
1989 में जब पुलिस फायरिंग में तीन लोगों की जान गई थी, तब भी मांगें लगभग ऐसी ही थीं। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश तो मिला, लेकिन उसके पास न तो पूर्ण राज्य की शक्तियां हैं और न ही संविधान की छठी अनुसूची का संरक्षण। यही खालीपन आज के आंदोलन की नींव बना। बुधवार की घटनाएं कई स्तरों पर चिंता पैदा करती हैं। सुबह युवाओं का निकलना, आगजनी, बीजेपी दफ्तर और सरकारी दफ्तरों पर हमले, ये सब महज़ गुस्से का इज़हार नहीं बल्कि राजनीतिक दिशा विहीन आक्रोश का प्रदर्शन लगते हैं। पुलिस ने आंसू गैस और बल प्रयोग से हालात संभालने की कोशिश की, लेकिन चार मौतें और 59 घायल यह साबित करते हैं कि प्रशासन पूरी तरह विफल रहा। उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता ने इसे साज़िश कहा और दोषियों को सख्त सज़ा देने का ऐलान किया। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीधे तौर पर सोनम वांगचुक को ज़िम्मेदार ठहराया। मंत्रालय का तर्क है कि हाई पावर कमिटी पहले से बातचीत कर रही थी और सकारात्मक परिणाम भी निकले थे। ऐसे में, भूख हड़ताल और अरब स्प्रिंग जैसे संदर्भों ने युवाओं को भड़काया।
यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि, संवाद प्रक्रिया सचमुच प्रगति पर थी, तो फिर इतनी बड़ी हिंसा कैसे भड़की? क्या प्रशासनिक मशीनरी जमीनी हकीकत से अनजान थी? या फिर वास्तव में कोई राजनीतिक ताकतें इसे दिशा दे रही थीं? पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक नेता सोनम वांगचुक ने पिछले पांच सालों में लद्दाख की पहचान को शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाने की कोशिश की। पांच बार भूख हड़ताल, दिल्ली तक पदयात्रा, और वैश्विक मंचों पर पर्यावरणीय खतरे की ओर ध्यान दिलाना, यह उनकी पहचान है। बुधवार की हिंसा के बाद उन्होंने खुद भूख हड़ताल तोड़ते हुए युवाओं से हिंसा रोकने की अपील की। उनका यह बयान कि यह लद्दाख और मेरे लिए सबसे दुखद दिन है, इस बात को रेखांकित करता है कि उनकी रणनीति शांति पर आधारित थी, लेकिन सरकार का यह आरोप कि उन्होंने भड़काऊ भाषणों में अरब स्प्रिंग और नेपाल के जेन-ज़ी आंदोलन का ज़िक्र किया, स्थिति को जटिल बनाता है। अगर यह सच है, तो आंदोलनकारियों को दी गई दिशा की समीक्षा करनी होगी, लेकिन अगर यह सिर्फ़ राजनीतिक दोषारोपण है, तो इससे आंदोलन की नैतिक वैधता को कमजोर करने का प्रयास माना जाएगा।
बीजेपी ने हिंसा को कांग्रेस की नापाक साज़िश बताया। वहीं, स्थानीय कांग्रेस नेताओं पर उत्तेजक भाषण देने का आरोप भी लगा। यह पैटर्न भारतीय राजनीति में नया नहीं है, हर आंदोलन को विपक्षी साज़िश बताकर सत्ता अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश करती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या लद्दाख जैसे सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र में भी यही राजनीति चलेगी? क्या यहां जनता की वास्तविक मांगों को विपक्ष-सत्ता के चश्मे से देखना उचित है? लद्दाख में छठी अनुसूची का विस्तार कई समस्याओं का समाधान कर सकता है। इससे स्थानीय जनजातीय समूहों को भूमि, वन, संसाधन और सांस्कृतिक मामलों पर निर्णय लेने की शक्ति मिलेगी। यह क्षेत्र के लोगों में स्वामित्व की भावना जगाएगा और बाहरी हस्तक्षेप से उन्हें सुरक्षा देगा। लेकिन सरकार की झिझक साफ है। शायद, केंद्र को डर है कि इतनी स्वायत्तता सीमावर्ती इलाके में सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है।
फिर भी, भारत के संघीय ढांचे की ताकत यही रही है कि उसने विविधताओं को स्वीकार कर उन्हें संवैधानिक ढांचे में समायोजित किया। नागालैंड, मिजोरम, असम, जम्मू-कश्मीर—हर जगह विशेष प्रावधान दिए गए, तो फिर लद्दाख को क्यों वंचित रखा जाए? हिंसा ने आंदोलन की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न जरूर खड़ा कर दिया है, लेकिन यह भी सच है कि हिंसा तब फूटती है जब संवाद में भरोसा टूट जाता है। अगर, हाई पावर कमिटी की बैठकें वास्तव में समाधान की ओर बढ़ रही थीं, तो प्रशासन को चाहिए था कि वह पारदर्शिता से जनता के बीच यह संदेश फैलाता। इसके विपरीत, बार-बार साज़िश और भड़काऊ भाषण की बात करके सरकार यह आभास देती है कि वह जनता की असल भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर रही है।
लद्दाख का यह उभार भारत के लोकतंत्र के सामने एक चेतावनी है। यह चेतावनी है कि संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में जनता की आकांक्षाओं को केवल सुरक्षा और विकास की भाषा में नहीं बांधा जा सकता। सांस्कृतिक पहचान, जनजातीय अधिकार और राजनीतिक भागीदारी—इन सबको साथ लेकर ही कोई स्थायी समाधान निकल सकता है। सोनम वांगचुक की शांतिपूर्ण कोशिशें और जनता की चारों मांगें लोकतांत्रिक विमर्श के दायरे में आती हैं, लेकिन बुधवार की हिंसा ने यह दिखा दिया है कि अगर, इन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
अब ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है। उसे न तो कांग्रेस या किसी और विपक्षी दल पर दोष मढ़कर बचना चाहिए और न ही सिर्फ़ कानून-व्यवस्था की भाषा में बात करनी चाहिए। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले या छठी अनुसूची का विस्तार, इस पर अंतिम निर्णय भले ही समय ले, लेकिन संवाद और विश्वास बहाली की प्रक्रिया तुरंत और पारदर्शी होनी चाहिए। भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब लेह की गलियों और कारगिल की घाटियों में भी वही भरोसा पनपे, जो दिल्ली की संसद में दिखता है, और अगर यह भरोसा हिंसा की आग में जलने लगा, तो इसका नुकसान सिर्फ़ लद्दाख नहीं, पूरे राष्ट्र को होगा।

