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    Home » सारण और चंपारण पर बीजेपी का फोकस विपक्ष के लिए चुनौती
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    सारण और चंपारण पर बीजेपी का फोकस विपक्ष के लिए चुनौती

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 24, 2025No Comments7 Mins Read
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    सारण और चंपारण पर बीजेपी का फोकस विपक्ष के लिए चुनौती
    देवानंद सिंह
    बिहार की राजनीति का अपना ही रंग है। यहां चुनाव आते ही पूरे राज्य का माहौल बदल जाता है। गली-मोहल्लों से लेकर बड़े-बड़े राजनीतिक अड्डों तक हर जगह सिर्फ एक ही चर्चा होती है, कौन जीतने वाला है और किसकी रणनीति सफल होने वाली है। 2025 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे नज़दीक आ रहा है और जैसे-जैसे तारीख़ नज़दीक आती जा रही है, वैसे-वैसे राजनीति का तापमान भी बढ़ रहा है। इस बार मुकाबला सिर्फ दलों और गठबंधनों का नहीं है, बल्कि रणनीति और संगठन की ताक़त का भी है। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार की धरती पर अपने दौरे लगातार तेज़ कर दिए हैं। पिछले दस दिनों में उनका यह दूसरा बिहार दौरा है। यह अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि भाजपा इस बार चुनाव को बिल्कुल नए अंदाज़ में लड़ने की तैयारी में है। शाह सिर्फ औपचारिक दौरे पर नहीं आ रहे, बल्कि वे लगातार ज़मीनी समीकरणों का आकलन कर रहे हैं, कार्यकर्ताओं को नई दिशा दे रहे हैं और सबसे अहम, उन क्षेत्रों पर फोकस कर रहे हैं जहां से भाजपा के लिए सत्ता का रास्ता और चौड़ा हो सकता है।

     

     

     

    सबसे पहले बात सारण की। बिहार की राजनीति में सारण का नाम हमेशा से केंद्रीय भूमिका निभाता आया है। जयप्रकाश नारायण की यह धरती सत्ता के बड़े-बड़े उतार-चढ़ाव देख चुकी है। लालू प्रसाद यादव की राजनीति की जड़ें भी यहीं गहरी हैं। सारण का ज़िक्र आते ही यह धारणा बनती है कि यहां का सामाजिक समीकरण बहुत जटिल है, यादव-मुस्लिम वोट बैंक यहां की राजनीति की धुरी है और इस वजह से राजद यहां मजबूत रहता है, लेकिन भाजपा की रणनीति इस बार कुछ अलग है। 2020 के विधानसभा चुनाव में सारण की 10 में से 6 सीटें राजद के खाते में गई थीं, एक सीट सीपीआईएम के पास गई और सिर्फ 3 सीटें भाजपा को मिलीं। सतही तौर पर देखा जाए तो भाजपा कमजोर दिखती है, लेकिन राजनीति की असली तस्वीर हमेशा सतह के नीचे छिपी होती है। अमित शाह ने यही बारीकी समझी है।

     

     

     

    सारण में जिन सात सीटों पर भाजपा और उसके सहयोगियों को 2020 में हार का सामना करना पड़ा, वही आज भाजपा के निशाने पर हैं। इनमें सोनपुर और गरखा की सीटें हैं जहां भाजपा प्रत्याशी हार गए थे, वहीं एक्मा, मढ़ौरा, परसा, मांझी और बनियापुर जैसी सीटें हैं जो जदयू या वीआईपी के खाते से निकली थीं। अब जब राजनीतिक गठजोड़ की स्थिति बदल चुकी है और जदयू राजद के साथ है, भाजपा को खुला मैदान मिल गया है। इन सातों सीटों पर शाह चाहते हैं कि संगठन पूरी ताक़त से काम करे और जातीय संतुलन साधते हुए भाजपा को नई बढ़त दिलाई जाए।

     

     

    अब जरा चंपारण की ओर रुख़ करें। पश्चिम चंपारण और पूर्वी चंपारण दोनों ही भाजपा के पारंपरिक गढ़ माने जाते हैं। 2020 में पश्चिम चंपारण की 9 सीटों में से 7 पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, सिर्फ दो सीटें उनके हाथ से फिसली थीं, वाल्मीकिनगर जदयू के पास गई और सिकटा सीपीएमएल के पास। पूर्वी चंपारण में भाजपा का प्रदर्शन और भी शानदार रहा। यहां की 12 में से 8 सीटें भाजपा ने जीत लीं, राजद को 3 मिलीं और जदयू को सिर्फ एक। आंकड़े साफ़ बताते हैं कि चंपारण भाजपा के लिए मजबूत किला है। फिर भी शाह की रणनीति यहीं रुक जाने वाली नहीं है। उनका लक्ष्य है कि शेष चार सीटों को भी अपने पाले में लाया जाए। विशेषकर सुगौली, नरकटियागंज और कल्याणपुर जैसी सीटों पर वे संगठन को नई ऊर्जा देना चाहते हैं।

     

     

    अब सवाल उठता है कि आखिर शाह इन इलाकों पर इतना ज़ोर क्यों दे रहे हैं? इसका जवाब छिपा है बिहार की चुनावी राजनीति के गणित में। विधानसभा की 243 सीटों में से अगर भाजपा सिर्फ सारण और चंपारण में ही 30 सीटों पर मजबूत स्थिति बना लेती है, तो पूरे राज्य का चुनावी परिदृश्य बदल सकता है। यह सिर्फ सीटों का खेल नहीं है, बल्कि संदेश का भी खेल है। अगर, भाजपा लालू यादव के गढ़ सारण में बढ़त हासिल कर लेती है, तो यह पूरे राज्य में यह मैसेज जाएगा कि यादव-मुस्लिम समीकरण भी अब भाजपा को रोक पाने में सक्षम नहीं है। दूसरी तरफ, चंपारण में भाजपा की जीत यह दिखाएगी कि संगठन अब भी मजबूत है और जनता का भरोसा पहले जैसा कायम है।

     

     

    लेकिन बिहार चुनाव को सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। यहां का असली खेल जातीय समीकरणों पर आधारित होता है। सारण में यादव और मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं, और यही वजह है कि राजद का प्रभाव हमेशा से यहां मज़बूत रहा है, लेकिन भाजपा की कोशिश है कि अति पिछड़ों, दलितों और अगड़ी जातियों को अपने साथ जोड़कर इस प्रभाव को संतुलित किया जाए। शाह की रणनीति यह है कि जातीय समीकरण को सिर्फ भावनाओं से नहीं, बल्कि संगठनात्मक काम और नेतृत्व की स्पष्टता से साधा जाए। चंपारण में जातीय परिदृश्य कुछ अलग है। यहां थारू, भूमिहार, कुर्मी, ब्राह्मण और दलित समुदाय की मजबूत उपस्थिति है। भाजपा ने पिछली बार इन वर्गों को साधकर शानदार प्रदर्शन किया था। इस बार भी शाह चाहते हैं कि इन समुदायों को और मजबूती से भाजपा से जोड़ा जाए। खासकर, थारू समुदाय को लेकर भाजपा अलग से कार्यक्रम बना रही है ताकि वाल्मीकिनगर और आस-पास के क्षेत्रों में अपनी पकड़ और मजबूत कर सके।

     

     

    अमित शाह का दौरा महज़ औपचारिकता नहीं है। वे जिस अंदाज़ में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हैं, उसमें साफ़ संदेश होता है कि भाजपा बिहार की राजनीति में अब किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती। गठबंधन की राजनीति ने कई बार भाजपा को सीमित किया है, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। शाह लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि भाजपा अपने दम पर लड़ने और जीतने की क्षमता रखती है। राजद-जदयू गठबंधन के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। लालू यादव का गढ़ कहे जाने वाले सारण में अगर भाजपा सेंध लगा देती है तो यह गठबंधन की सबसे बड़ी हार मानी जाएगी। नीतीश कुमार की जदयू जिन सीटों पर पहले हारी थी, वहां भाजपा अब दावा ठोक रही है। यह जदयू के लिए भी संकट का कारण बन सकता है, क्योंकि इसका सीधा मतलब है कि उसका वोट बैंक धीरे-धीरे भाजपा की तरफ खिसक सकता है।

     

     

    अब अगर 2025 के संभावित परिदृश्य पर नज़र डालें तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है। मान लीजिए भाजपा सारण की सात विवादित सीटों में से तीन या चार भी जीत लेती है और चंपारण की शेष चार सीटों में से दो-तीन पर कब्ज़ा कर लेती है, तो उसका कुल स्कोर करीब 30 तक पहुंच जाएगा। बिहार जैसे जटिल राजनीतिक राज्य में 30 सीटों का मज़बूत आधार भाजपा को पूरे राज्य में निर्णायक स्थिति दिला सकता है। शाह की रणनीति यह भी है कि चुनाव को सिर्फ जातीय समीकरण तक सीमित न रखा जाए। वे लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि भाजपा विकास, कानून-व्यवस्था और सुशासन के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। सारण और चंपारण जैसे क्षेत्रों में संगठन की बैठकों के साथ-साथ वे जनता तक यह संदेश पहुंचा रहे हैं कि भाजपा बिहार को पिछड़ेपन से निकाल सकती है।

     

     

    कुल मिलाकर, अमित शाह का यह दौरा बिहार की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। सारण और चंपारण जैसे क्षेत्रों पर फोकस कर भाजपा न सिर्फ अपने संगठन को मजबूत कर रही है, बल्कि विपक्ष को भी असमंजस में डाल रही है। राजद-जदयू गठबंधन को अब यह सोचने पर मजबूर होना होगा कि वे किस तरह से भाजपा के इस आक्रामक अभियान का जवाब देंगे। 2025 का चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा का चुनाव होगा। यह तय करेगा कि बिहार की राजनीति में परंपरागत समीकरण ही हावी रहेंगे या फिर भाजपा अपने नए फार्मूले के साथ इस राज्य की राजनीति को नए मोड़ पर ले जाएगी, और इस पूरी रणनीति के केंद्र में हैं अमित शाह, जिनकी राजनीतिक बिसात अक्सर आख़िरी क्षण में तस्वीर को पूरी तरह बदल देती है।

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