सी.पी. राधाकृष्णन के सामने केवल एक संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अतीत की छाया से बाहर निकलने की भी चुनौती
देवानंद सिंह
सी.पी. राधाकृष्णन की ने शुक्रवार को देश के 15वें उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ले ली है। उनका कार्यकाल सितंबर 2030 तक होगा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार रहे सी.पी. राधाकृष्णन की उपराष्ट्रपति चुनाव में जीत किसी भी लिहाज़ से अप्रत्याशित नहीं थी। संख्या बल शुरू से ही उनके पक्ष में था और विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. ब्लॉक का प्रत्याशी केवल प्रतीकात्मक चुनौती देने के लिए खड़ा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को विपक्ष ने मैदान में उतारकर यह संदेश देना चाहा कि वह इस संवैधानिक पद को केवल राजनीति की चश्मदीद नहीं बनाना चाहता, बल्कि उसे उच्च नैतिकता और संस्थागत स्वतंत्रता की कसौटी पर देखना चाहता है। चुनावी नतीजा भले ही साफ रहा हो, मगर असली कहानी अब शुरू होती है।

यह बात उल्लेखनीय है कि इस चुनाव की नौबत इसलिए आई, क्योंकि तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक सत्र के बीच इस्तीफा दे दिया। भारतीय संसदीय इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना थी कि जब संसद का सत्र चल रहा हो और उसी समय उपराष्ट्रपति, जो कि राज्यसभा के सभापति भी होते हैं।, अचानक पद छोड़ दें। धनखड़ का जाना केवल एक संवैधानिक रिक्ति नहीं था, बल्कि उसने कई सवाल खड़े किए। क्या कारण रहे, किस दबाव में इस्तीफा हुआ, और क्या यह निर्णय पूरी तरह निजी था या राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम इन प्रश्नों ने बहस को गहराई दी।
सी.पी. राधाकृष्णन जब यह पद संभालने जा रहे हैं, तो उनके सामने केवल एक संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उस अतीत की छाया से बाहर निकलना भी एक चुनौती है। उन्हें यह दिखाना होगा कि वह संस्थान की गरिमा को व्यक्तिगत विवादों या दलगत धारणाओं से ऊपर उठाकर पुनः स्थापित कर सकते हैं।
आज भारतीय संसद का सबसे बड़ा संकट है सहमति का अभाव। सरकार और विपक्ष के बीच अविश्वास और तल्ख़ियां इतनी गहरी हो चुकी हैं कि संवाद की संभावनाएं लगातार सिकुड़ रही हैं। यही परिदृश्य उपराष्ट्रपति चुनाव में भी दिखाई दिया। जिस चुनाव को अब तक अपेक्षाकृत गरिमामयी और विवाद से परे माना जाता था, उसमें भी वही आरोप-प्रत्यारोप सुनाई दिए, जो आम चुनावों में गूंजते रहते हैं।

नए उपराष्ट्रपति के लिए यह पहला बड़ा इम्तिहान होगा कि वह इस राजनीतिक खाई को कितना पाट पाते हैं। संसद की कार्यवाही को चलाना मात्र प्रक्रियात्मक काम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक मनोविज्ञान है कि दोनों पक्षों को यह भरोसा दिलाना कि उनकी आवाज़ सुनी जा रही है। यदि, विपक्ष यह महसूस करता है कि सभापति निष्पक्ष हैं, तो स्वाभाविक रूप से सदन का वातावरण बदलने लगता है। भारतीय संविधान में उपराष्ट्रपति का पद स्पष्ट रूप से राजनीतिक नहीं है। उनका मुख्य दायित्व राज्यसभा की अध्यक्षता करना और राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में सेवा देना है। किंतु विडंबना यह है कि हाल के वर्षों में उपराष्ट्रपति का पद भी राजनीतिक विवादों में घिरता रहा है। जगदीप धनखड़ के समय विपक्ष बार-बार यह शिकायत करता रहा कि उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, और अध्यक्षता का रवैया निष्पक्ष नहीं दिखता।
अब जब सी.पी. राधाकृष्णन पदभार संभालेंगे, तो उनकी सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि वह स्वयं को अराजनीतिक और संतुलित साबित करें। उनके हर निर्णय, हर हस्तक्षेप और हर वक्तव्य को इसी नजरिए से परखा जाएगा। जनता के साथ-साथ विपक्ष भी देखेगा कि क्या वह सत्ताधारी दल के प्रवक्ता की तरह आचरण करते हैं, या फिर संस्थागत गरिमा को प्राथमिकता देते हैं। राज्यसभा को अब तक ‘विचारशील सदन’ कहा जाता रहा है। लोकसभा जहां जनता के प्रत्यक्ष प्रतिनिधियों का मंच है, वहीं राज्यसभा से अपेक्षा होती है कि वह गहन बहस, गहराई और संतुलन के साथ कानून निर्माण की प्रक्रिया को परिष्कृत करे। लेकिन हाल के वर्षों में तस्वीर बदली है।

मॉनसून सत्र में राज्यसभा की प्रॉडक्टिविटी महज 38.8% रही। सदन का अधिकांश समय हंगामे और स्थगनों में बीता। कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के पारित हो गए और अनेक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस अधूरी रह गई।
यह स्थिति केवल प्रक्रियात्मक विफलता नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक संकेत है। संसद केवल कानून पारित करने की मशीन नहीं है, बल्कि संवाद और बहस की वह भूमि है, जहां राष्ट्रीय सहमति आकार लेती है। अगर यह मंच लगातार शोर-शराबे में डूबा रहेगा, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी।राधाकृष्णन के सामने यह कठिन कार्य है कि वह राज्यसभा को उसकी खोई हुई छवि वापस दिलाएं। इसके लिए उन्हें केवल नियमों का पालन कराने वाला कठोर प्रशासक ही नहीं, बल्कि संवाद का सेतु भी बनना होगा।भारतीय संसदीय राजनीति की वास्तविकता यह है कि सरकार के पास बहुमत होता है और वह चाहे तो अधिकांश विधेयक पारित करा सकती है। मगर, राज्यसभा में विपक्ष की भूमिका निर्णायक होती है। कई बार सत्ता पक्ष को वहां बहुमत नहीं मिलता, ऐसे में संवाद और सहयोग अपरिहार्य हो जाता है।
नए उपराष्ट्रपति को यह याद रखना होगा कि विपक्ष लोकतंत्र का शत्रु नहीं, बल्कि उसका अनिवार्य अंग है। विपक्ष की बात सुनना, उसे पर्याप्त अवसर देना और उसकी चिंताओं को गंभीरता से लेना ही सदन को संतुलन देता है। यदि विपक्ष केवल शोर करने तक सीमित हो जाए, तो उसकी भी जवाबदेही है, मगर इस स्थिति तक पहुंचने से पहले सभापति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सी.पी. राधाकृष्णन लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहे हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे हैं और विभिन्न चुनावों में उनकी भूमिका रही है। यह पृष्ठभूमि अब उनके लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि उन्हें राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली की गहरी समझ है, और चुनौती इसलिए कि उन्हें यह साबित करना होगा कि वह केवल सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि नहीं हैं।
इतिहास गवाह है कि कई उपराष्ट्रपतियों ने इस कसौटी पर स्वयं को खरा उतारा है। चाहे वह भैरोसिंह शेखावत हों या हामिद अंसारी, उन्होंने अपने-अपने दौर में यह दिखाया कि इस पद की स्वतंत्र गरिमा है। राधाकृष्णन के लिए यह मिसालें मार्गदर्शक हो सकती हैं। संसद के भीतर जो कुछ घटता है, उसका असर सीधे जनता पर पड़ता है। नागरिकों की उम्मीद होती है कि उनके चुने प्रतिनिधि बहस करें, समाधान खोजें और देश की नीतियों को दिशा दें। लेकिन जब संसद केवल राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बन जाती है, तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। नए उपराष्ट्रपति से लोगों की अपेक्षा है कि वह इस विश्वास को पुनः मजबूत करें। उनकी भूमिका सिर्फ प्रक्रियागत नहीं है, बल्कि एक नैतिक नेतृत्व की भी है। यदि, वह निष्पक्ष और संतुलित दिखेंगे, तो न केवल विपक्ष बल्कि जनता भी उन्हें स्वीकार करेगी।

भारत इस समय कई गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा है। आर्थिक असमानता, सामाजिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय दबाव और जलवायु संकट जैसी समस्याएं सामने हैं। इन मुद्दों पर संसद में गहन बहस की आवश्यकता है, लेकिन यदि संसद के सत्र केवल टकराव और शोरगुल में गुजरेंगे, तो इन समस्याओं का समाधान कभी नहीं निकल पाएगा।सी.पी. राधाकृष्णन के सामने इसलिए यह अवसर है कि वह इस पद को केवल औपचारिक न मानें, बल्कि इसे लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण का मंच बनाएं। वह यदि दोनों पक्षों को संवाद के लिए प्रेरित कर पाते हैं, सदन की कार्यवाही को गरिमा और गंभीरता दे पाते हैं, तो यह उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

सी.पी. राधाकृष्णन की जीत पूर्वनिश्चित थी, लेकिन जीत से बड़ी है जिम्मेदारी। उन्हें यह दिखाना होगा कि उपराष्ट्रपति का पद दलगत राजनीति से ऊपर है। राज्यसभा की गरिमा लौटाना, विपक्ष को विश्वास में लेना और निष्पक्षता के मानक पर खरा उतरना, ये सभी चुनौतियां उनके सामने हैं। जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने एक असामान्य परिस्थिति पैदा की है। इस अतीत से सबक लेते हुए राधाकृष्णन को यह साबित करना होगा कि लोकतंत्र में संस्थानों की मजबूती ही असली पूंजी है। यदि, वह यह कर पाए, तो न केवल उनका कार्यकाल याद किया जाएगा, बल्कि भारतीय संसदीय परंपरा को भी नई ऊर्जा मिलेगी।

