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    Home » मोदी-शी मुलाक़ात-अमेरिका का दबाव और भारत की कूटनीतिक दुविधा
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    मोदी-शी मुलाक़ात-अमेरिका का दबाव और भारत की कूटनीतिक दुविधा

    News DeskBy News DeskSeptember 1, 2025No Comments6 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    भारत और चीन के रिश्तों की कहानी सिर्फ़ दो पड़ोसियों की कहानी नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी के वैश्विक शक्ति समीकरणों की कहानी भी है। रविवार को तियानजिन में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (एससीओ) समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने मिले। सात साल बाद मोदी का चीन दौरा हुआ और 2018 के बाद यह पहली बार था जब दोनों नेता चीन की धरती पर एक-दूसरे से आमने-सामने बातचीत कर रहे थे। इस मुलाक़ात को सिर्फ़ एक औपचारिकता या फोटो-ऑप के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे गहरी कूटनीतिक गणनाएं, रणनीतिक मजबूरियां और अंतरराष्ट्रीय दबाव काम कर रहे हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इस बैठक में कहा कि पिछले साल कज़ान (रूस) में दोनों नेताओं की सार्थक चर्चा ने रिश्तों को सकारात्मक दिशा दी थी। उन्होंने सीमा पर डिसइंगेजमेंट और शांति बहाली का ज़िक्र किया और बॉर्डर मैनेजमेंट पर दोनों देशों के स्पेशल रिप्रेंजेटेटिव्स के बीच सहमति को रेखांकित किया। वहीं शी जिनपिंग ने वैश्विक बदलावों का हवाला देते हुए कहा कि चीन और भारत, दोनों ही प्राचीन सभ्यताओं के प्रतिनिधि और दुनिया के सबसे बड़े जनसंख्या वाले देश हैं। उनके मुताबिक ड्रैगन और हाथी का साथ ग्लोबल साउथ और मानवता के लिए बेहद ज़रूरी है।

    मुलाक़ात के दौरान चाहे जितनी भी सकारात्मक बातें कही गईं हों, वास्तविकता यह है कि पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति बहाल नहीं हुई है। चीन अब भी अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत कहता है और बार-बार उसका नामकरण करता रहा है। भारत “वन चाइना पॉलिसी” मानता है, लेकिन चीन वन इंडिया पॉलिसी मानने को तैयार नहीं दिखता। यही द्वंद्व इस रिश्ते का सबसे बड़ा बोझ है।

    पिछले वर्षों में चीन ने न सिर्फ सीमा पर सैन्य उपस्थिति मज़बूत की है, बल्कि पाकिस्तान के साथ भी अपनी रणनीतिक साझेदारी को गहराया है। पाकिस्तान को रियल-टाइम रडार और सैटेलाइट डेटा उपलब्ध कराना हो या सीमा के पास दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने की योजना चीन का हर कदम भारत के लिए सीधे सुरक्षा खतरे पैदा करता है। ऐसे में, यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या मोदी-शी मुलाक़ात वाकई रिश्तों में नया मोड़ लाएगी या यह केवल औपचारिक संवाद भर रह जाएगा?

    इस मुलाक़ात का एक और महत्वपूर्ण आयाम अमेरिका है। भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले दो दशकों में मज़बूत हुए हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन के दबावपूर्ण रवैये ने हालात को जटिल बना दिया है। पूर्व अमेरिकी राजदूत माइकल मैकफ़ॉल ने तो खुले शब्दों में कहा कि ट्रंप ने मोदी को इतना अलग-थलग कर दिया कि अब वह शी जिनपिंग और पुतिन के साथ मंच साझा करने पर मजबूर हैं। यह टिप्पणी केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक संकेत है कि भारत-अमेरिका रिश्तों में असहजता बढ़ रही है।

    भारत जानता है कि अमेरिका के बिना वह अपनी रणनीतिक कमियों को नहीं भर सकता। रक्षा तकनीक, ऊर्जा सहयोग, और इंडो-पैसिफिक रणनीति में अमेरिका की भूमिका बेहद अहम है, लेकिन अगर अमेरिका लगातार भारत को दबाव में रखेगा, तो भारत को विकल्प तलाशने ही होंगे। चीन के साथ संवाद उसी विकल्प तलाशने का हिस्सा है। चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 2024 में दोनों देशों का व्यापार लगभग 127.7 अरब डॉलर तक पहुंचा। भारत ने अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल उपकरणों में ही 48 अरब डॉलर का आयात चीन से किया। यह व्यापारिक असंतुलन भारत के पक्ष में नहीं है, लेकिन भारत के उद्योगों की निर्भरता इतनी गहरी है कि अचानक दूरी बनाना संभव नहीं।

    यही वह आर्थिक मजबूरी है जो राजनीतिक कड़वाहट के बावजूद दोनों देशों को बातचीत की मेज़ पर खींच लाती है। मोदी ने तियानजिन में कैलाश मानसरोवर यात्रा और डायरेक्ट फ्लाइट्स की बहाली का उल्लेख कर यह संदेश देने की कोशिश की कि लोग-से-लोग संपर्क अभी भी संबंधों की रीढ़ है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सब चीन की रणनीतिक चालाकियों पर पर्दा डालने के लिए पर्याप्त है?

    थिंक टैंक ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन की वरिष्ठ फेलो तन्वी मदान का कहना है कि आज रूस और चीन के रिश्ते भारत से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं। यह भारत के लिए एक गंभीर चुनौती है, क्योंकि रूस पारंपरिक रूप से भारत का मित्र रहा है और उसका झुकाव हमेशा चीन-विरोधी ध्रुव पर रहा। लेकिन आज वही रूस, यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से चीन पर निर्भर है।

    भारत को यह भी समझना होगा कि रूस-चीन का गठजोड़ दक्षिण एशिया में उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। भारत के पास अमेरिका, रूस और चीन के बीच संतुलन बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन यह संतुलन एक बेहद नाज़ुक रस्सी पर चलने जैसा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार मोदी इस बार बहुत कमज़ोर स्थिति में चीन जा रहे हैं। अमेरिका से रिश्तों में दरार, सीमा पर चीन की आक्रामकता और पाकिस्तान को लेकर चीन की अडिग स्थिति भारत को दबाव में डाल रही है। चीन ने न तो एलएसी पर कोई रियायत दी, न ही व्यापार या तिब्बत के मुद्दे पर।

    विशेषज्ञों के अनुसार पिछले अनुभव बताते हैं कि चीन भारतीय कमज़ोरी का फ़ायदा उठाएगा, भरोसेमंद साथी बनने की कोशिश नहीं करेगा। उन्होंने याद दिलाया कि जब मोदी ने शुरुआती दिनों में चीन के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की थी, तो चीन ने उसी का फ़ायदा उठाकर सीमा पर चुपचाप बढ़त बनाई। आज भी स्थिति अलग नहीं है। तियानजिन समिट में मोदी का सामना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से भी होना है। यह मुलाक़ात पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार हो रही है। भारत-पाकिस्तान रिश्ते हमेशा से भारत-चीन समीकरणों से जुड़े रहे हैं। चीन पाकिस्तान का ऑल वेदर फ्रेंड है और भारत जानता है कि जब तक चीन पाकिस्तान पर अपना हाथ रखेगा, दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद करना मुश्किल है।

    भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है, कैसे अमेरिका, चीन और रूस के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर होना भी जोखिम भरा है और चीन से नाता तोड़ना भी अव्यावहारिक। यही कारण है कि मोदी का यह दौरा रणनीतिक संतुलन की तलाश का हिस्सा है। विश्लेषक मानते हैं कि मोदी अमेरिकी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। भारत अपनी ऊर्जा नीति और विदेश नीति के फ़ैसले खुद करेगा। इसका मतलब यह नहीं कि भारत-अमेरिका रिश्ते टूट गए हैं, बल्कि यह कि भारत मल्टी-वेक्टर डिप्लोमेसी अपनाना चाहता है।

    कुल मिलाकर, मोदी-शी मुलाक़ात से तत्काल कोई चमत्कारिक नतीजा निकलने की संभावना नहीं है। यह मुलाक़ात प्रतीकात्मक अधिक है, वास्तविक बदलाव कम, लेकिन यह भी सच है कि वैश्विक शक्ति संतुलन की इस घड़ी में भारत को हर मोर्चे पर सक्रिय रहना होगा।
    चीन भरोसेमंद साथी नहीं है, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ करना भी संभव नहीं। अमेरिका ज़रूरी साझेदार है, लेकिन वह भारत को दबाव में रखेगा तो विकल्प तलाशने की बाध्यता होगी। रूस पुराना मित्र है, लेकिन उसकी प्राथमिकताएं अब बदल चुकी हैं। ऐसे में, भारत को न सिर्फ़ अपने रणनीतिक विकल्प मज़बूत करने होंगे, बल्कि आंतरिक रूप से भी अपनी आर्थिक और रक्षा क्षमता को आत्मनिर्भर बनाना होगा। यही वह रास्ता है जो भारत को कमज़ोरी की स्थिति से बाहर निकालकर संतुलनकारी शक्ति की स्थिति में ला सकता है।

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