भारत को अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने की जरूरत
देवानंद सिंह
अमेरिका, भारत और चीन के बीच शक्ति-संतुलन की गुत्थी में हाल ही का घटनाक्रम नया मोड़ लेकर आया है। भारत में चीन के राजदूत शू फ़ेहॉन्ग ने जब यह बयान दिया कि चुप्पी या समझौता करने से धौंस जमाने वालों का हौसला बढ़ता है और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए चीन भारत के साथ मज़बूती से खड़ा रहेगा, तो यह सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी भर नहीं थी। किसी तीसरे देश की धरती से अमेरिका जैसे महाशक्ति की आलोचना करना कूटनीतिक परंपराओं के लिहाज़ से असामान्य कदम है। चीन ने यह जोखिम उठाया, क्योंकि वह जानता है कि अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए पचास प्रतिशत टैरिफ़ का असर केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामरिक समीकरणों पर भी पड़ेगा। भारत को इस समय यह संदेश दिया जाना था कि चीन उसके साथ खड़ा है और बहुपक्षीय व्यवस्था का पक्षधर है।

अमेरिका की नीति पर गौर करें तो डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी के साथ ही अमेरिका फ़र्स्ट एजेंडा पहले से कहीं अधिक कठोरता के साथ लागू किया जा रहा है। वैश्विक व्यापार व्यवस्था, जो कभी डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाओं और बहुपक्षीय वार्ताओं के सहारे चलती थी, अब अमेरिकी दबाव और एकतरफ़ा फ़ैसलों से हिल रही है। चीन और अमेरिका के बीच 2018 से शुरू हुआ टैरिफ़ युद्ध भले ही बीच-बीच में कमज़ोर पड़ा हो, लेकिन अविश्वास की खाई गहराती ही गई। मई 2025 में जेनेवा में हुई वार्ता के बाद लगा कि दोनों देश कुछ हद तक तनाव कम करने की कोशिश करेंगे, पर कुछ ही महीनों बाद ट्रंप प्रशासन ने भारत पर भारी-भरकम टैरिफ़ का ऐलान कर दिया। इससे भारतीय जनमानस में यह धारणा और गहरी हो गई कि अमेरिका अपने साझेदारों के साथ भी कठोर आर्थिक व्यवहार कर सकता है।
यह टैरिफ़ केवल व्यापारिक झटका नहीं है। यह राजनीतिक दबाव का औज़ार भी है। भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाकर वैश्विक ऊर्जा संकट को किसी हद तक नियंत्रित किया, लेकिन अब अमेरिका उसी को रूस का समर्थक करार देकर टैरिफ़ की चोट दे रहा है। दिलचस्प यह है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश या अन्य पड़ोसियों पर ऐसा कोई कठोर कदम नहीं उठाया गया, जबकि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को ही सीधे निशाना बनाया गया। यही कारण है कि भारत में अमेरिका के प्रति असंतोष बढ़ रहा है और विपक्ष सरकार से सवाल कर रहा है कि दोस्त ट्रंप की नीति आखिर क्यों महंगी साबित हो रही है।

ऐसे समय में, चीन का भारत में अमेरिकी नीति की आलोचना करना कई मायनों में रणनीतिक कदम है। चीन जानता है कि भारत और अमेरिका के बीच अविश्वास की खाई टैरिफ़ से और गहरी होगी। ऐसे माहौल में भारत के प्रति सहानुभूति दिखाकर वह अपनी छवि सुधार सकता है। साथ ही, यह बयान शंघाई सहयोग संगठन की आगामी बैठक से ठीक पहले आया है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल होंगे। चीन चाहता है कि माहौल सकारात्मक बने और भारत को यह संकेत मिले कि चीन उसे अलग-थलग नहीं बल्कि सहयोगी की तरह देख रहा है। इससे भी बढ़कर, यह बयान वैश्विक संदेश है। चीन दुनिया को यह बताना चाहता है कि वह अमेरिका की धौंस का विरोध करता है और बहुपक्षीय व्यवस्था की रक्षा करना चाहता है।
भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में देखें तो गलवान की 2020 की झड़प ने रिश्तों को दशकों पीछे धकेल दिया था। सीमा पर तनाव, सैनिक तैनाती और व्यापार में अविश्वास ने दोनों देशों को लगभग आमने-सामने ला खड़ा किया था। परंतु पिछले दो वर्षों में धीरे-धीरे रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें की गई हैं। कॉर्प्स कमांडर स्तर की वार्ताएं, कूटनीतिक संवाद और सीमित स्तर पर व्यापारिक सहयोग ने यह संकेत दिया कि दोनों देश टकराव से निकलकर सहयोग की ओर बढ़ना चाहते हैं। हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री मोदी से उनकी मुलाक़ात इसी दिशा में बड़ा संकेत थी। मोदी ने भी साफ कहा कि स्थिर और भरोसेमंद भारत-चीन संबंध क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए आवश्यक हैं।

विशेषज्ञों की राय इस त्रिकोणीय गुत्थी को और स्पष्ट करती है। प्रोफेसर अलका आचार्य के अनुसार, भारत में अमेरिका और चीन दोनों के खिलाफ जनभावनाओं को समझना होगा। सीमा विवाद और ऐतिहासिक अविश्वास के कारण एंटी-चाइना भावना हमेशा से मौजूद रही है, परंतु अमेरिकी टैरिफ़ ने अचानक एंटी-अमेरिका भावना को भी जन्म दिया है। वहीं, प्रोफेसर चिंतामणि महापात्रा का मानना है कि भारत-चीन की नज़दीकी केवल अमेरिका के कारण नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश पर लगातार बातचीत हुई है। चीन आज भी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और रिश्तों की मरम्मत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

मुद्दा केवल व्यापार या टैरिफ़ का नहीं है। यह क्वाड और इंडो-पैसिफ़िक की राजनीति से भी जुड़ा है। भारत और अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी क्वाड के ज़रिए मजबूत हुई थी। इसका मकसद चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना था। लेकिन यदि भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक व राजनीतिक दरार गहराती है, तो क्वाड की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ सकता है। जापान पहले ही अमेरिकी टैरिफ़ नीति से असंतुष्ट है और ऑस्ट्रेलिया भी ट्रंप प्रशासन के रवैये से नाराज़ है। ऐसे में, यदि भारत भी दूरी बनाने लगे, तो इंडो-पैसिफ़िक में चीन का पलड़ा भारी हो सकता है। इस दृष्टि से अमेरिका का यह टैरिफ़ निर्णय केवल आर्थिक कदम नहीं बल्कि पूरी क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना के लिए चुनौती है।
दूसरी ओर, ग्लोबल साउथ की राजनीति भी यहां अहम है। भारत और चीन दोनों ग्लोबल साउथ के देशों में नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहते हैं। ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर वे सहयोग करते हैं और पश्चिमी प्रभुत्व को संतुलित करने का प्रयास करते हैं। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति उसकी ताक़त है। भारत न पूरी तरह पश्चिम के साथ खड़ा होता है, न ही पूरी तरह चीन के साथ। यही संतुलन उसकी वैश्विक स्थिति को मज़बूत करता है। परंतु यदि भारत चीन के साथ अचानक अधिक निकटता दिखाता है, तो उसकी वैश्विक विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या चीन भारत के लिए अमेरिका का विकल्प बन सकता है। विशेषज्ञों का उत्तर स्पष्ट है—कभी नहीं। पाकिस्तान के साथ चीन की घनिष्ठता भारत की स्थायी चिंता है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुजरता है, जिस पर भारत ने हमेशा कड़ा विरोध किया है। इसके अलावा पाकिस्तान को चीन की सैन्य मदद भारत की सुरक्षा के लिए स्थायी खतरा बनी हुई है। भारत चाहे जितना भी चीन से संबंध सुधार ले, वह अमेरिका को छोड़कर चीन पर दांव नहीं लगा सकता।

अमेरिकी टैरिफ़ ने भारत की घरेलू राजनीति को भी प्रभावित किया है। विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि सरकार की दोस्त ट्रंप वाली नीति क्यों विफल हो रही है और क्यों भारत को ही विशेष रूप से निशाना बनाया गया। वहीं, सरकार इसे अपनी ऊर्जा नीति से जोड़कर बचाव कर रही है। उसका कहना है कि भारत ने रूस से तेल आयात कर वैश्विक ऊर्जा संकट को कम किया, लेकिन अमेरिका अब उसी पर दबाव बना रहा है। यह मुद्दा जनता के बीच भी गूंज सकता है, क्योंकि महंगाई और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं के बीच व्यापार पर अतिरिक्त बोझ लोगों की चिंता बढ़ा देगा।
अब सबकी नज़र प्रधानमंत्री मोदी की संभावित चीन यात्रा पर है। यह यात्रा भारत-चीन संबंधों को नई दिशा दे सकती है। क्या सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कोई ठोस पहल होगी या केवल व्यापार पर ही ज़ोर रहेगा, यह देखने वाली बात होगी। भारत को संतुलन साधने में कठिनाई होगी क्योंकि अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी साझेदारी उसकी दीर्घकालिक आवश्यकता है, जबकि चीन के साथ व्यापारिक संबंध उसकी अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य हैं।
समग्र रूप से देखें तो भारत आज उस चौराहे पर खड़ा है, जहां उसे अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने की चुनौती है। अमेरिका का पचास प्रतिशत टैरिफ़ भारत के लिए बड़ा आर्थिक झटका है, लेकिन चीन की ओर झुकना भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। सीमा विवाद, पाकिस्तान के साथ चीन की नज़दीकी और बीआरआई जैसी परियोजनाओं को देखते हुए भारत को बेहद सतर्क रहना होगा। भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति, जहां वह अलग-अलग मंचों पर विभिन्न साझेदारों के साथ चलता है, जो भविष्य में और प्रासंगिक होगी। यही नीति उसे ग्लोबल साउथ का स्वाभाविक नेता बनाएगी और पश्चिम व चीन दोनों के बीच संतुलन कायम रखने में मदद करेगी।
कुल मिलाकर, अमेरिकी टैरिफ़ की यह नई लड़ाई केवल आर्थिक नहीं है बल्कि वैश्विक राजनीति के नए समीकरणों को भी आकार दे रही है। भारत के लिए यह समय अवसर में बदल सकता है, यदि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे और दोनों महाशक्तियों से अपने हित साध सके। यही उसका भविष्य तय करेगा और यही उसे विश्व राजनीति में संतुलन साधने वाला निर्णायक खिलाड़ी बनाएगा।

