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    जर्जर स्कूल-खतरे में भविष्य

    News DeskBy News DeskAugust 13, 2025No Comments6 Mins Read
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    • टूटी छतों और दीवारों के बीच कैसे पलेगी शिक्षा की नींव?

    भारत में लाखों सरकारी विद्यालय जर्जर हालत में हैं। टूटी छतें, दरारों वाली दीवारें, पानी व शौचालय का अभाव—ये बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई दोनों पर खतरा हैं। पिछले नौ वर्षों में 89 हज़ार सरकारी स्कूल बंद हुए, जिससे शिक्षा में अमीर-गरीब की खाई और गहरी हुई। शिक्षा का अधिकार कानून सुरक्षित भवन की गारंटी देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग है। सरकार, समाज और नागरिकों को मिलकर विद्यालय भवनों की मरम्मत और सुविधाओं में निवेश करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ मलबों पर नहीं, मजबूत नींव पर अपने सपने खड़ी कर सकें।

    -डॉ. सत्यवान सौरभ

    शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और विद्यालय उसके मंदिर। यह वह स्थान है जहाँ बच्चों के सपनों को आकार मिलता है, विचारों को पंख मिलते हैं और भविष्य की नींव रखी जाती है। परंतु दुख की बात है कि भारत में, विशेषकर ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में, इन मंदिरों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। अनेक विद्यालयों में छतें टूटी हुई हैं, दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें हैं, बरसात में पानी टपकता है, खिड़कियाँ टूटी हुई हैं, बेंच जर्जर हो चुकी हैं और पीने के पानी तथा शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है।

    हाल ही में राजस्थान के झालावाड़ ज़िले में एक सरकारी विद्यालय की जर्जर दीवार गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत हो गई। यह घटना किसी एक विद्यालय या राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। हर बार जब ऐसी दुर्घटना होती है, तो कुछ दिन तक चर्चा होती है, परंतु फिर सब सामान्य हो जाता है, और समस्या जस की तस बनी रहती है। सवाल यह है कि क्या हमें बच्चों की जान जाने के बाद ही जागना होगा?

    शिक्षा मंत्रालय के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि भारत में पंद्रह लाख से अधिक प्राथमिक और डेढ़ लाख से अधिक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में है, जहाँ भवनों की देखभाल पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। लाखों विद्यालयों में आज भी लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, पीने के पानी की व्यवस्था अधूरी है और अनेक राज्यों में लगभग एक-तिहाई विद्यालय जर्जर या अर्ध-जर्जर स्थिति में हैं।

    शिक्षा का अधिकार कानून दो हज़ार नौ ने छह से चौदह वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी दी थी। इस कानून में यह भी स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि प्रत्येक विद्यालय का भवन सुरक्षित, सुसज्जित और बच्चों के अनुकूल होना चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि काग़ज़ी प्रावधान ज़मीन पर लागू नहीं हुए। जर्जर भवनों में पढ़ने वाले बच्चों पर हर दिन खतरा मंडराता है, और शिक्षा का अधिकार केवल पुस्तकों में सीमित होकर रह जाता है।

    बीते नौ वर्षों में देश भर में नवासी हज़ार से अधिक सरकारी विद्यालय बंद हो चुके हैं। कारण बताया जाता है कि इन विद्यालयों में नामांकन कम हो गया, लेकिन असली वजह यह है कि विद्यालयों की बदहाली, शिक्षकों की कमी और सुविधाओं के अभाव ने बच्चों और अभिभावकों का विश्वास तोड़ दिया। अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे सुरक्षित वातावरण में पढ़ें, इसलिए वे निजी विद्यालयों का रुख करते हैं, भले ही उसके लिए उन्हें कर्ज़ क्यों न लेना पड़े। परिणाम यह है कि अमीर परिवारों के बच्चे बेहतर सुविधाओं वाले विद्यालयों में पढ़ते हैं, जबकि गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चे जर्जर सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई करते हैं या फिर पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं।

    इससे शिक्षा में गहरी असमानता पैदा हो रही है। जब एक बच्चा वातानुकूलित कक्ष, आधुनिक शिक्षण सामग्री और पुस्तकालय में पढ़ता है और दूसरा बच्चा टूटी बेंच, सीलनभरी दीवारों और टपकती छत के नीचे बैठता है, तो दोनों के लिए समान अवसर कैसे संभव होंगे? यह असमानता केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे चलकर रोजगार, आय और सामाजिक स्थिति पर भी असर डालती है।

    शोध बताते हैं कि असुरक्षित और असुविधाजनक वातावरण में पढ़ने वाले बच्चों में तनाव अधिक होता है, वे विद्यालय में नियमित रूप से उपस्थित नहीं हो पाते और पढ़ाई छोड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है। बरसात के मौसम में कक्षाओं में पानी भर जाता है, गर्मियों में बिना पंखे और हवा के क्लास में बैठना मुश्किल हो जाता है, और सर्दियों में टूटी खिड़कियों से आती ठंडी हवा बच्चों के स्वास्थ्य पर असर डालती है।

    हमारे देश में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दो दशमलव नौ प्रतिशत ही खर्च होता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम से कम छह प्रतिशत की सिफारिश की जाती है। भवनों की मरम्मत और रखरखाव के लिए जो राशि तय होती है, वह ज़रूरत के मुकाबले बहुत कम है। इसके अलावा, जो राशि मंजूर होती भी है, वह अक्सर नौकरशाही की धीमी प्रक्रिया, ठेकेदारी में भ्रष्टाचार और निगरानी की कमी के कारण पूरी तरह खर्च नहीं हो पाती।

    यदि स्थिति सुधारनी है तो सबसे पहले विद्यालय भवनों की मरम्मत और सुरक्षा के लिए विशेष कोष बनाया जाए, जिसमें राज्य और केंद्र दोनों मिलकर धन दें। इस कोष का उपयोग पारदर्शी ढंग से हो और प्रत्येक खर्च का हिसाब सार्वजनिक किया जाए। हर सरकारी विद्यालय का वार्षिक सुरक्षा परीक्षण अनिवार्य हो, जिसमें भवन की मजबूती, फर्नीचर, बिजली और पानी की व्यवस्था, शौचालय और खेल के मैदान जैसी सुविधाओं का मूल्यांकन किया जाए। पंचायत, अभिभावक और स्थानीय समाजसेवी संस्थाएँ निगरानी में शामिल हों, ताकि धन के दुरुपयोग पर रोक लग सके।

    प्रत्येक खंड स्तर पर ऐसे त्वरित मरम्मत दल बनाए जाएँ, जो वर्षा, भूकंप, तूफान या किसी अन्य आपदा के बाद तुरंत विद्यालयों की मरम्मत कर सकें। मरम्मत और निर्माण के काम में स्थानीय मज़दूरों और कारीगरों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि गाँव में ही रोज़गार भी पैदा हो और काम की गुणवत्ता पर भी निगरानी बनी रहे।

    लेकिन केवल भवन सुधारने से समस्या हल नहीं होगी। शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ, खेल का सामान और आधुनिक शिक्षण साधनों की उपलब्धता भी उतनी ही ज़रूरी है। विद्यालय का वातावरण तभी प्रेरणादायक बनेगा, जब बच्चे वहाँ सुरक्षित महसूस करें और उन्हें सीखने के लिए सभी साधन उपलब्ध हों।

    विद्यालय भवन केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं होते, वे बच्चों के सपनों और भविष्य की रक्षा करने वाले किले होते हैं। जब यह किला ही कमजोर और जर्जर हो, तो शिक्षा की नींव कैसे मजबूत होगी? समय आ गया है कि सरकार, समाज और नागरिक सभी मिलकर इन मंदिरों की मरम्मत में जुट जाएँ। शिक्षा में निवेश केवल खर्च नहीं है, बल्कि सबसे लाभकारी पूँजी-निवेश है, क्योंकि एक सुरक्षित और शिक्षित बच्चा ही कल का जिम्मेदार नागरिक बनता है।

    यदि हम आज इन टूटी दीवारों और छतों को नहीं सँभालेंगे, तो कल हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इन्हीं मलबों के बीच अपने सपनों की तलाश करेंगी। यह केवल विद्यालय भवनों को सँभालने का सवाल नहीं है, यह भारत के भविष्य को सँभालने का सवाल है।

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