- संस्कृत दिवस पर विशेष
भाषा मन-मस्तिष्क की अभिव्यंजना है। यह विचारों का परिधान है, संस्कृति की संवाहिका है। इसलिए भाषा वह माध्यम है जिससे हम दिग्दिगंत तक अपनी संस्कृति को प्रसारित कर अपने राष्ट्र की चेतना को पुष्ट करते हुए उसकी सुगन्ध से अखिल विश्व को सुगन्धित कर पूजनीय पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।भाषा की सम्पन्नता मानवीय अभिव्यक्ति का बीज है जो संस्कार – भूमि पर अनुकूल वातावरण से अंकुरित होती हुई पुष्पित और पल्लवित होती है।इस दृष्टि से भारतीय और वैश्विक उन्नयन के लिए संस्कृत भाषा का अध्ययन और उसका व्यवहार अनिवार्य रूप से अपेक्षित है।

आज संस्कृत दिवस है केवल भारत ही नहीं अपितु जहां जहां संस्कृत का उपयोग जान उसे अपरिहार्य समझकर संस्कृत सीखने की परम्परा का निर्माण हो रहा है वहां भी आज श्रावणी पूर्णिमा के दिन संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में समारोह पूर्वक आयोजन होते हैं । आखिर क्यूं श्रावणी पूर्णिमा को ही संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है अन्यथा संस्कृत तो हम नित्य प्रति अनायास ही बोलते हैं।नमस्ते,शुभ प्रभात, वन्दना ,अर्चना ,कथा ,भोजन, खेल ,लेख ,जलपान,योग आदि सभी शब्द संस्कृत के ही हैं जिनकी व्युत्पत्ति अथवा निष्पत्ति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है ,अस्तु। श्रावणी पूर्णिमा अथवा रक्षाबंधन के पुनीत पर्व का दिन ही संस्कृत दिवस के रूप में इसीलिए उल्लास पूर्वक मनाया जाता है क्योंकि रक्षाबंधन का दिन हमारे ऋषिमुनियों के स्मरण का ,उनके पूजन अर्चन का दिन होता हैं,हमारे संस्कृत के सभी आदि ग्रन्थ संस्कृत भाषा में प्रणीत हैं जो प्रारम्भ में केवल श्रुति परम्परा से अर्थात् सुन सुनकर हृदयंगम किये जाते थे और इसी रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित भी होते थे।बाद में लिपि का अविष्कार हुआ लिप्यते अर्थात् अक्षर भोजपत्र अथवा कागज पर लिपे गये,उतारे गये या लिखे गये।मान्यता यह भी है कि जब
हमारे देश में गुरुकुल परम्परा थी तो वेदाध्ययन का आरम्भ इसी श्रावणी पूर्णिमा के दिन किया जाता था। एक अन्य कारण यह भी सम्भव है कि रक्षा बन्धन रक्षा पर्व हैऔर संस्कृत में ही भारतीय संस्कृति की आत्मा निहित है अतः अपनी सांस्कृतिक विरासत हमारी रक्षा करे और हम भी इस विरासत को प्राणपन्न बचाये रक्खें यह भी संस्कृत दिवस मनाने का अप्रत्यक्ष किन्तु मार्मिक कारण हो सकता है। बाद में तो इस परम्परा को देखकर सन् 1969में शिक्षा मन्त्रालय ने विधिवत् श्रावणी पूर्णिमा को संस्कृत दिवस घोषित किया और सभी विद्यालयों और महाविद्यालयों में इस उपलक्ष्य में समारोह आयोजित करने का आदेश दिया।चूंकि रक्षाबंधन के दिन घर घरमें ही राखी पर्व का त्यौहार होता है इसलिए पूर्णिमा से जनममाष्टमी तक संस्कृत दिवसमनाने की परम्परा बन गई। सम्प्रति तो “गृहे गृहे संस्कृतम्” पर केन्द्रित पखवाड़ा मनाया जाता है जिसमें अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से जन जन को संस्कृत से जोड़ा जाता है और लोग सहर्ष जुड़ते भी हैं।

प्रायः सामान्य व्यक्ति के मन में प्रश्न उठता है कि हम संस्कृत क्यों पढ़ें,क्यों जाने ,जब हमारा कार्य सभी मातृ-भाषाओं से अथवा देशज भाषाओं या फिर हिन्दी अंग्रेजी से चल जाता है ।ऊपरी सतह से देखने पर इसमें भले ही कुछ अनुचित सा प्रतीत नहीं होता किन्तु यदि गहरे पैठ कर परिशीलन किया जाये तो समझ में आता है कि संस्कृत ही तो सभी भारतीय भाषाओं की जननी है ,उद्भव स्थल है।यदि किसी वृक्ष की जड़ ही उखाड़ कर फेंक दी जायेगी तो तने क्या हरे रह सकते हैं,उसकी शोभा फूल फल क्या हरे भरे रह सकते हैं ?कभी नहीं।प्राणवयु तो मूल से ही मिलती है।इसी प्रकार संस्कृत के वृक्ष से जिन भाषाओं का उद्गम है वे संस्कृत की टहनियां हैं ,उन पर हँसते फल और फूल है ।मूल के नष्ट-भ्रष्ट होने पर कुछ नहीं बचेगा ।कहा भी गया है:-
भाषाणाम् भारतीयानाम् मूलमेकम् संस्कृतम्।
मूल लोपे च शाखेव सा सर्वा शोषमेष्यति।।
अर्थात् भारतीय भाषाओं का मूल एक मात्र संस्कृत ही है।मूल के लोप होने पर नष्ट हुई शाखा के समान वे सारी भाषाएँ लुप्त हो जायेंगी।

यह नितान्त सत्य है कि साहित्य का साधक विद्यार्थी किसी भी विषय पर बोलने के लिये कहीं भी और कभी भी प्रस्तुत रहता है क्योंकि भाषा के माध्यम से जो कुछ वह पढ़ता है वह सभी सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक -धर्मिक सभी विषयों के समाहृत साहित्य को पढ़ता है ,उससे आन्दोलित होता है और अपनी प्रतिक्रिया भी देता है।हमारे वैदिक वाङ्गमय में जो ज्ञान निहित है वह विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है ,वेद अपौरुषेय हैं इसलिए अनादि और अनन्त है वेद उपनिषद्,आरण्यक ,ब्रह्माण ग्रन्थों का ज्ञान ही तो हमारी सभी भाषाओं की कोख में आता है फलता है फूलता है और इसी वैदिक ज्ञान से “माता भूमिपुत्रोऽहं पृथिव्याः”भाव प्रफुल्लित होता है।”सर्वे भवन्तु सुखिनः”से “वसुधैव कुटुम्बकम् “का अभ्यास हमारी संस्कृति बनती है.।वैदिक और लौकिक संस्कृत साहित्य ही हमारी धरोहर है और वही भारतीय ज्ञान सरोवर में खिला ब्रह्म-कमल है जिसका सनातन सौरभ चतुर्दिक छिटका हुआ है।तभी तो भट्ट मथुरा नाथ शास्त्री अपने गोबिन्द वैभव में लिखते हैं:-
“जिसने लोक में शाखाओं प्रशाखाओं सहित वेदों को प्रकट किया है,जो स्मृतियों की धात्री और उपनिषदों की जन्मदात्री है,जो त्रिभुवन में आध्यात्मिक मार्ग का एक मात्र उपदेश करने वाली है,दिव्यज्योति से प्रकाशमान उस देव वाणी की विजय हो।”
पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी स्वयं संस्कृत के साहित्य को वह उच्च श्रृंग मानते हैं जिस पर चढ़ कर अध्येता काल के अतीत की और काल के भविष्य की सुदीर्घ लेखाएँ खींच सकता है।यदि हम संस्कृत की उपेक्षा करेंगें तो वह विशाल वाङ्गमय नहीं रच पायेंगें जिसकी आज अतीव महती अनिवार्यता है। आज यूं ही इसरो और नासा के वैज्ञानिक संस्कृत की ओर नहीं देख रहे। यूं ही दुनिया पाणिनी और अष्टध्यायी को नहीं जानना चाह रहे,इसका गूढ़ महत्व है।हां कुछ अशुद्ध राजनीतिक नीतियों के कारण संस्कृत की अवहेलना अवश्य हुई ।साथ ही एक महत्वपूर्ण कारण यह भी रहा कि संस्कृत के विद्यार्थियों को विज्ञान के विषय और विज्ञान के विद्यार्थियों को संस्कृत नहीं पढ़ने दिया गया। तथाकथित शिक्षा नीति के निर्माताओं की विद्रोही योजनाओं के कारण। जबकी किसी का भी कोई भी भाषागत विषय पढ़ने का अधिकार होना चाहिये था।किन्तु अब नयी राष्ट्रीय शिक्षानीति में व्यक्ति किसी भी भाषा में कोई भी विषय पढ़ सकते हैं जान सकते है।इससे किसी भी भाषा के साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन की समभावनाएँ बढ़ी हैं। आज हमारे विज्ञान के विद्यार्थी वैदिक ज्ञान के साथ नवीनतम शोध कर सकते हैं और अपने भारतीय ज्ञान के अनेक प्रतिमान प्रतिष्ठित कर सकते हैं।जो ज्ञान हमारे वैदिक वाङ्गमय /साहित्य में है वह न तो अतीत में किसी साहित्य में निहित था और न ही भविष्य में इतनी विशाल दृष्टि की संभावना है।तभी तो विलियम जोन्स ने राॅयल सोसाइटी कलकत्ता में अपने व्याख्यान में कहा था:-

“संस्कृत भाषा चाहे जितनी पुरानी हो उसकी रचना अद्भुत् है।वह ग्रीक भाषा की अपेक्षा अधिक पूर्ण, लेटिन भाषा की अपेक्षा अधिक सम्पन्न और दोनों की तुलना में अधिक परिष्कृत है।किन्तु दोनों के साथ धातु ,क्रियाओंऔर व्याकरण के रूप में इतनी मिलती जुलती है कि यह मिलाप आकस्मिक नहीं हो सकता।यह मिलाप इतना गहरा है कि कोई भाषा शास्त्री इसकी परीक्षा करने पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे बिना नहीं रह सकता कि सभी भाषाएँ एक ही स्रोत से निकली हैं जौ अब नहींरहा”
स्वयं पोकाक ने माना है कि युनानी भाषा संस्कृत से उत्पन्न हुई है।(पोकाक,इंडिया इन ग्रीस,पृष्ठ 18)
साइंस इन लैंग्वेज पृष्ठ 25 पर.स्वयं मेक्सम्यूयलर लिखते हैं
“संस्कृत तो भाषाओं की भाषा है।यह ठीक ही कहा गया जो महत्व ज्योतिष के लिए गणित का है वही भाषा विज्ञान के लिये संस्कृत का है”
संस्कृत भाषा पूर्णतः वैज्ञानिक है ,कम्प्यूटर के लिये निर्विवादित सर्वाधिक उपयुक्त भाषा है। तब संस्कृत के प्रति इतनी उदासीनता क्यों?कष्टदायक है यह तथ्य कि आज विदेशों में संस्कृत के प्रति रुचि बढ़ रही है। कई विश्वविद्यालयों में अनिवार्य विषय कर दी गई है।किन्तु जिसकी यह विरासत है उस भारत देश को प्रारम्भिक शिक्षा या कमसे कम हाई स्कूल तक तो संस्कृत भाषा को अनिवार्य विषय करने में संकोच क्यों,?जहाँ तक रोजगार से जुड़ने का प्रश्न है तो जिस भाषा का लोहा आज अखिल विश्व मान रहा है उसके जीविकोपार्जन के अनेक माध्यम स्वयं उपस्थित होते हैं। हम समय रहते नहीं चेते तो हमारी ही विरासत हमसे छिन जायेगी। अन्त में राष्ट्र-कवि
मैथिली शरण गुप्त की पंक्तियों को प्रेरणा स्रोत के रूप में उद्धृत करते हुए अपने राष्ट्र में अपनी संस्कृत के प्रचार प्रसार की शुभ कामना करती हूँ।
निकला जहां से आधुनिक यह भिन्न भाषा तत्व है
रखती न भाषा एक भी संस्कृत समान महत्व है।
पाणिनी सदृश वैयाकरण संसार भर में कौन है
इस प्रश्न का उत्तर उत्तरोत्तर मौन है।।
डॉक्टर रागिनी भूषण

