लोकतंत्र और दस्तावेज़ों के बीच टकराहट उचित नहीं
देवानंद सिंह
बिहार में विशेष मतदाता गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया जिस तरह लागू की जा रही है, उसने भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद पर एक चुभते हुए सवाल की तरह दस्तक दी है, क्या कोई लोकतंत्र इस बात पर टिका हो सकता है कि नागरिक के पास ‘कागज़’ है या नहीं?

यह प्रक्रिया महज़ एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिकता के पुनर्निर्धारण की कोशिश जैसी प्रतीत हो रही है। विशेषकर जब इसे बिहार जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी गरीबी, बाढ़, विस्थापन और दस्तावेज़ी असमानता से जूझ रही है, तेज़ी से और सख़्ती से लागू किया जाए, तो इसका उद्देश्य जनहित से अधिक राजनैतिक रणनीति जैसा लगता है। बिहार की सामाजिक संरचना जटिल और ऐतिहासिक असमानताओं से भरी हुई है। लाखों की संख्या में दलित, महादलित, मुसहर, भूमिहीन किसान, बाढ़ प्रभावित और प्रवासी मजदूर ऐसी श्रेणियां हैं, जो आज भी ज़मीन के कागज़, जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल की डिग्रियां या फैमिली रजिस्टर जैसे दस्तावेज़ों से वंचित हैं। यह वंचना कोई संयोग नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बहिष्करण और शासनिक उपेक्षा का परिणाम है।

इन लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे अपनी नागरिकता को प्रमाणित करें, वह भी एक सीमित समय में, सीमित संसाधनों के साथ, अपने-आप में उनके अस्तित्व पर एक अनावश्यक संदेह खड़ा करना है। यह एक तरह से संदेह का बोझ गरीब पर डालने जैसा है, जबकि लोकतंत्र की आत्मा तो इस बात पर टिकी है कि राज्य नागरिक पर भरोसा करे, न कि उसे हर मोड़ पर कटघरे में खड़ा करे।
इस प्रक्रिया के दौरान जिन लोगों के पास आधार कार्ड है, उन्हें भी कहा जा रहा है कि यह प्रमाण पर्याप्त नहीं है। यह एक और विरोधाभास है। जब आधार को सरकारी पहचान के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है, तो फिर एसआईआर में उसे अस्वीकार करना क्या दर्शाता है?

अगर, आधार को ही वैध प्रमाण नहीं माना जाएगा, और 1987 से पहले के दस्तावेज़ की मांग की जाएगी, तो यह स्पष्ट संकेत है कि प्रक्रिया की मंशा पारदर्शिता से अधिक चयनात्मक बहिष्करण की ओर झुकी हुई है। बिहार के लिए जून-जुलाई का महीना बाढ़, विस्थापन और ग्रामीण संकट का समय होता है। इस वर्ष भी कई जिलों में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है, लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर गए हैं। ऐसे समय में, बीएलओ की सीमित उपस्थिति, 25 जून से 26 जुलाई की तंग समयसीमा, दस्तावेजों की जटिल मांग, और जागरूकता की कमी मिलकर इस प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से असंभव बना देते हैं। इसके बावजूद इसे ज़बरन लागू करना इस बात का संकेत है कि प्रक्रिया जनसहयोग नहीं, जनचयन की सोच पर आधारित है। तेजस्वी यादव ने इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए इसे एनआरसी जैसी प्रक्रिया कहा है। जब वे इसे ‘1987 से पहले के दस्तावेज़ों की मांग’ कहते हैं, तो यह बयान राजनीतिक भले हो, लेकिन इसमें पूरी तरह अतिशयोक्ति नहीं है।

चुनाव नज़दीक हैं, और बिहार जैसे जातीय रूप से विभाजित राज्य में ऐसे समय में नागरिकता से जुड़ी प्रक्रिया की घोषणा अपने-आप में एक राजनीतिक संकेत है। इससे यह आशंका जन्म लेती है कि कहीं यह प्रक्रिया कुछ समुदायों को चुनावी गणना से बाहर रखने का प्रयास तो नहीं? यह भी महत्वपूर्ण है कि एसआईआर की अधिसूचना चुनाव आयोग के बजाय राज्य प्रशासन के जरिए आई, जिससे इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश और भी गहरी हो जाती है। भारत का संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देता है। यह अधिकार जन्मसिद्ध है, कोई सरकार या अधिकारी उसे मनमाने ढंग से नकार नहीं सकता। अगर, दस्तावेज़ों के आधार पर इस अधिकार को छीनने की कोशिश होती है, तो यह संविधान के मूल ढांचे पर चोट है।

यह विशेषकर उस वर्ग के लिए घातक सिद्ध होगा, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहा है। इनकी भागीदारी लोकतंत्र की समावेशिता का सबसे बड़ा प्रमाण है, और यदि, इन्हें ही बाहर कर दिया गया, तो लोकतंत्र केवल एक दस्तावेज़-आधारित दरबारी व्यवस्था बनकर रह जाएगा।
इस मुद्दे का हल संवेदनशीलता और व्यावहारिक समझदारी से निकल सकता है। वर्तमान समयसीमा अत्यंत अल्प है। वर्ष 2003 में ऐसी प्रक्रिया के लिए छह महीने का समय दिया गया था। आज जब तकनीकी जटिलता और जनसंख्या अधिक है, तो समय और बढ़ना चाहिए।

जिनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं, उन्हें शपथ-पत्र या पंचायत स्तर की पुष्टि के आधार पर नागरिकता माननी चाहिए। पंचायत, वार्ड समिति, ग्राम सभा जैसे निकायों को सत्यापन में शामिल कर सामाजिक विश्वसनीयता और पारदर्शिता को बेहतर किया जा सकता है। यदि, आधार सरकार द्वारा जारी पहचान-पत्र है, तो इसे एसआईआर में भी मान्यता मिलनी चाहिए। इसकी स्पष्टता आवश्यक है।
इस प्रक्रिया पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, नागरिक संगठनों, मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों की निगरानी सुनिश्चित की जाए ताकि इसका दुरुपयोग रोका जा सके। इस विशेष मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया ने लोकतंत्र को एक परीक्षा में डाल दिया है, और सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस परीक्षा में वही नागरिक फेल हो जाएंगे जिनके पास सबसे कम संसाधन हैं। झोपड़ी में रहने वाले दलित, खेतों में काम करने वाले मजदूर, बाढ़ में बह चुकी फाइलों के मालिक, और अनपढ़, वृद्ध महिलाएं, सबकी नागरिकता आज संदेह के घेरे में है।
यदि, लोकतंत्र का संचालन केवल कागज़ों के भरोसे किया जाएगा, तो यह उन करोड़ों नागरिकों से छल होगा, जिनका संविधान से रिश्ता अधिकार के रूप में नहीं, दस्तावेज़ों की पात्रता पर आधारित बना दिया जाएगा। यह भारत के लोकतंत्र को उसकी आत्मा से दूर ले जाने वाला मार्ग है। आज ज़रूरत है कि बिहार के नागरिक, सामाजिक संगठन, बुद्धिजीवी, मीडिया और राजनीतिक दल इस प्रक्रिया की संवेदनहीनता को उजागर करें और एक जन-आन्दोलन के रूप में इसे चुनौती दें। यह केवल दस्तावेज़ों की बात नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल आत्मा समावेशिता, समानता और न्याय की रक्षा का प्रश्न है।
अगर, आज इस प्रक्रिया को बिना सवाल के स्वीकार कर लिया गया, तो कल यह अन्य राज्यों और समुदायों पर भी लागू किया जा सकता है। इसलिए, यह केवल बिहार का मुद्दा नहीं, भारत के लोकतंत्र की व्यापक चिंता है।

