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    Home » “तनाव-मुक्ति के मूल में है योग”
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    “तनाव-मुक्ति के मूल में है योग”

    News DeskBy News DeskJune 21, 2025No Comments4 Mins Read
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    योग दिवस विशेष

    भारतीय सनातन परम्परा में श्री कृष्ण को योगेश्वर कहा गया है। उन्होंने कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि में खड़े होकर अर्जुन को उपदेश दिया था। उस उपदेश में कृष्ण जी ने योग के माध्यम से कर्म, ज्ञान, भक्ति, ध्यान, सांख्य आदि को साधने का मार्ग भी बतलाया था। कृष्ण ने योग का आश्रय लेकर अपने जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह बतलाया था कि कैसे सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए हम आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं। सच पूछिए तो योग जीवन का अभिन्न अंग है जो शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाकर हमारे मन को स्थिर कर जीवन की चुनौतियों की सामना करने की क्षमता देता है।

    योग सिर्फ शारीरिक नियमन ही नहीं बल्कि आत्म साक्षात्कार का प्रयास भी है। आज हम जिस योग का अनुसरण करते हैं, वह महर्षि पतंजलि के द्वारा परिमार्जित और उद्‌घाटित है। योग भारतभूमि का अनुसंधान है। हमारी भूमि ने समस्त विश्व को ज्ञान और क्रिया योग के द्वारा मनोविकारों पर विजय का मार्ग दिखलाया था । परन्तु दुःख की बात यह है कि हम भारतवासी ही योग से विमुख हो रहे हैं। इसका परिणाम भावनात्मक असंतुलन, तनाव, मूल्यहीनता, अनियंत्रित इंद्रियासक्ति, अनेक ज्ञात और अज्ञात रोगों के रूप में हमारे सामने आ रहा है।
    छात्रों के द्वारा असंगत -आक्रामक व्यवहार, पत्नी द्वारा पति की हत्या, आतंकवाद की घटनाएँ, आत्महत्या के बढ़ते मामले ये सब योग-विमुख होने का नतीजा है।
    उपर्युक्त उदाहरणों की तह में जाएँ तो पता चलेगा कि सारी घटनाओं के मूल में है-तनाव जो आधुनिक भाग-दौड़ भरी जिन्दगी की उपज है। योग का अभ्यास तनाव मुक्ति का मूल मंत्र है। योग के विभिन्न प्र‌णायामों द्वारा तनाव कम होता है और मन शांत हो जाता है। योग के आसन और प्राणायाम हमारा रक्त शोधन करते हैं, इससे माँसपेशियों को आराम मिलता है, जिससे रक्तचाप और हृदयगति नियमित होती ही हैं, रक्त के ऑक्सीजन के स्तर में सुधार भी होता है। योग से अनेक रोग स्वतः ही निर्मूल हो जाते हैं। यौगिक ध्यान से मन शांत होता है और विश्रांति दूर हो जाती है । इससे चिता और अवसाद का शमन होता है, एकाग्रता बढ़ती है, हार्मोन का स्तर संतुलित रहता है । इससे दुःखी करने वाले हार्मोन कम होते हैं और प्रसन्न करने वाले हार्मोनों में वृद्धि होती है। इससे साइ-कोसिस के तरह के मानसिक विकार नहीं होते । योग के क्रम में हम जो शारीरिक व्यायाम करते हैं, उससे मांसपेशियाँ क्रियाशील बनती हैं, उनमें शक्ति संचित होती है। हड्डियों में कैल्शियम का स्तर बना रहता है जिससे बुढ़ापे में होने वाले हड्डी संबंधी रोग नहीं होते। योग के अनेक रूप प्रचलित है, जिसमें क्रियायोग, हठयोग, विनियोग तथा ध्यान एवं प्राणायाम प्रमुख है। इनके नाम भले ही अलग हैं , परन्तु इनका उद्देश्य एक ही है। सतयुग, त्रेता, द्वापर में लोगों की लम्बाई, स्वास्थ्य और उम्र के बारे में हम जो वर्णन सुनते हैं, उसके पीछे योग ही मुख्य कारण है क्योंकि उस समय योग और तप जीवन के अनिवार्य अंग थे। उस काल के लोग निरोग रहकर लम्बी उम्र जीते थे।
    अतः आज इस कथन पर विश्वास करने की जरूरत हैं कि ” योग भगाए रोग” ।
    प्राचीन तपोवन में तपलीन संतों को अपनी समस्त इन्द्रियों पर नियंत्रण रहता था, वे तनाव शून्य रहकर विश्व कल्याण के लिये औषधियों और ऋचाओं का निर्माण करते थे।
    मन, शरीर और श्वास तनाव के केन्द्र हैं। योग के द्वारा इन तीनों पर नियंत्रण होता है और तनाव उत्पन्न ही नहीं होता है। अतः तनाव उत्पन्न होने से पहले ही हम योग को अपने दैनिक जीवन में अपना लें तो यह श्रेयस्कर होगा। योग का अभ्यास करने से हर परिस्थिति में शांत रहने, ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता का विकास होता है। योग में अनेक तरह के व्यायाम और प्राणायाम शामिल हैं, अपनी क्षमता और सुविधा के अनुसार हमें इनमें से उपयुक्त का चुनाव कर अभ्यास करना चाहिए। आज की दौड़-भाग भरी तनाव ग्रस्त जिन्दगी में शांत और स्वस्थ रहने का एकमात्र उपाय योग का अभ्यास ही है।

    ऐंजिल उपाध्याय
    उपाध्यक्ष ,
    अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत,
    झारखंड प्रांत ।

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