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    Home » ट्रंप-मुनीर मुलाक़ात भारत के लिए चिंताजनक
    Breaking News Headlines जमशेदपुर राष्ट्रीय संपादकीय

    ट्रंप-मुनीर मुलाक़ात भारत के लिए चिंताजनक

    News DeskBy News DeskJune 21, 2025No Comments6 Mins Read
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    देवानंद सिंह
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच पर आमंत्रित करना और उनके युद्ध रोकने के ‘योगदान’ की प्रशंसा करना, न केवल एक प्रतीकात्मक राजनयिक घटना है, बल्कि दक्षिण एशियाई राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। यह घटना भारत के लिए सैन्य, कूटनीतिक, और रणनीतिक स्तरों पर चिंताजनक कही जा सकती है। डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि उन्होंने जनरल मुनीर को युद्ध न होने देने के लिए आभार प्रकट करने के उद्देश्य से बुलाया था, जो एक सीधा संकेत है कि अमेरिका अब भारत और पाकिस्तान के बीच की भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में एक ‘संतुलनकारी शक्ति’ के तौर पर खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। यह उसी अमेरिकी नीति की पुनरावृत्ति है, जो शीत युद्ध के समय अपनाई गई थी, भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ संबंध बनाए रखना और किसी एक पक्ष की ‘अत्यधिक निकटता’ से बचना।

    ट्रंप का यह बयान कि दो समझदार लोगों ने युद्ध रोकने का फ़ैसला किया, भारत की स्वतंत्र कूटनीति और रणनीतिक निर्णय-क्षमता पर सवाल उठाता है। यह ऐसे समय में आया है, जब 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 भारतीय नागरिकों की मौत के बाद भारत ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया और सैन्य कार्रवाई की। व्हाइट हाउस में ट्रंप और मुनीर की बैठक में पत्रकारों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी, जिससे इस बात की संभावना और बढ़ जाती है कि इस मुलाक़ात में ईरान और इसराइल के बीच बढ़ते संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ होगा। पाकिस्तान और ईरान की सीमा साझा होती है, और बीते दिनों पाक प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ द्वारा ईरान का दौरा और खामेनेई से मुलाक़ात यह स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान ईरान के साथ एक रणनीतिक संपर्क बनाए हुए है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि जनरल मुनीर ईरान को बहुत अच्छे से जानते हैं। ट्रंप का यह वक्तव्य उस संभावना को और बल देता है कि अमेरिका ने पाकिस्तान से ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियानों के लिए रणनीतिक समर्थन मांगा हो, मुख्यतः हवाई क्षेत्र या सैन्य अड्डों के इस्तेमाल के संदर्भ में। सामरिक विश्लेषक इस मुलाक़ात को अमेरिका की ‘भारत-पाकिस्तान संतुलन नीति’ की वापसी मानते हैं। भारत के साथ अमेरिका के बढ़ते रक्षा समझौते, रणनीतिक साझेदारी और क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग के बावजूद ट्रंप द्वारा पाक सेना प्रमुख की खुलेआम प्रशंसा और ‘उदार मेज़बानी’ भारत के लिए कई संकेत देती है। यह वही अमेरिका है, जिसने 2006 में जनरल मुशर्रफ़ का स्वागत किया था, और अब 2025 में एक और सैन्य प्रमुख को व्हाइट हाउस की मेज़ पर आमंत्रित कर रहा है।

    भारत के रणनीतिक समुदाय को यह आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि क्या अमेरिका वास्तव में भारत को एक ‘असैनिक लोकतांत्रिक भागीदार’ मानता है या फिर दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक पहुंच बनाए रखने के लिए वह अब भी पाकिस्तान जैसे सैन्य-प्रभावित देशों को अहमियत देता है। इस घटनाक्रम से भारत की एक कमजोरी उजागर होती है। संघर्ष के बाद वैश्विक मंच पर अपने नैरेटिव को प्रभावी ढंग से स्थापित करने में विफलता। आतंकवादी हमले के बाद भारत ने सैन्य प्रतिक्रिया दी, लेकिन इसके बाद की कूटनीतिक लामबंदी, विशेषकर वाशिंगटन और ब्रसेल्स जैसे रणनीतिक केन्द्रों में, उतनी मुखर नहीं दिखी जितनी अपेक्षित थी।

    विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ट्रंप की आसिम मुनीर से मुलाक़ात भारत की रणनीतिक चूक का संकेत है। उन्होंने कहा, “यह मुलाक़ात भारत की कूटनीतिक कमजोरी को उजागर करती है, जहां आपसे युद्ध लड़ने वाले व्यक्ति को वैश्विक मंच पर प्रशंसा मिल रही है, वहीं आप अपनी स्थिति स्पष्ट करने से चूक जाते हैं।” इस घटनाक्रम पर भारत के भीतर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने इस मुलाक़ात को ‘भारतीय कूटनीति की हार’ बताया है। उन्होंने ट्रंप की इस पहल को ‘झप्पी कूटनीति’ की विफलता बताते हुए कहा कि जिस सैन्य तंत्र ने पहलगाम हमले को अंजाम दिया, उसी तंत्र के प्रमुख की व्हाइट हाउस में अगवानी की गई।

    यह भारत सरकार के लिए एक राजनीतिक और कूटनीतिक दोहरी चुनौती बन जाती है। एक तरफ़ विदेश नीति के मोर्चे पर अमेरिका जैसे सहयोगी देश की ओर से अप्रत्याशित कदम, और दूसरी तरफ़ विपक्ष द्वारा सरकार की विदेश नीति की आलोचना। इस पूरे परिदृश्य में पाकिस्तान के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलते दिखते हैं। आर्थिक रूप से जूझ रहे, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनामी झेल रहे और घरेलू अस्थिरता से जूझते पाकिस्तान के लिए यह बैठक एक प्रकार से ‘वैश्विक पुनर्वास’ का संकेत है। अमेरिका के साथ रणनीतिक संवाद, विशेषकर ईरान संकट के संदर्भ में, पाकिस्तान को फिर से एक अहम भू-रणनीतिक साझेदार के रूप में स्थापित कर सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के लिए यह स्थिति भी उतनी आसान नहीं होगी। अमेरिका द्वारा सैन्य अड्डों की मांग की स्थिति में पाकिस्तान को चीन जैसे करीबी सहयोगी को भी संतुष्ट रखना होगा। यदि, चीन को यह लगे कि पाकिस्तान अमेरिका के सैन्य हितों को अपने भू-क्षेत्र से समर्थन दे रहा है, तो यह बीजिंग-इस्लामाबाद संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।

    भारत को अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संवाद को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है, ताकि इस तरह की एकतरफा ‘संतुलनकारी कार्रवाइयों’ पर आपत्ति दर्ज की जा सके। भारत को अपनी कूटनीतिक और मीडिया-आधारित अभियानों को और प्रभावी बनाना होगा ताकि वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ उसकी स्थिति स्पष्ट और दृढ़ बनी रहे। केवल अमेरिका पर निर्भरता के बजाय भारत को रूस, यूरोप और मिडिल ईस्ट जैसे क्षेत्रों में अपनी कूटनीतिक पकड़ और मजबूत करनी होगी ताकि बहुपक्षीय संतुलन बना रहे। पाकिस्तान का पुनः वैश्विक मुख्यधारा में लौटना चीन के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। ऐसे में भारत को रणनीतिक स्तर पर और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

    कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रंप और जनरल आसिम मुनीर की यह मुलाक़ात भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती, चेतावनी और अवसर तीनों ही है। यह घटना भारत को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या उसकी विदेश नीति में कुछ कमज़ोर कड़ियां हैं, जिन्हें अमेरिका जैसे मित्र देश ‘रणनीतिक विवेक’ के नाम पर नजरअंदाज़ कर सकते हैं। भारत को इस समय सजग, सक्रिय और संतुलित कूटनीति की ज़रूरत है, जो न केवल वर्तमान चुनौतियों का सामना कर सके बल्कि भविष्य की जटिलताओं के लिए भी तैयार हो। ट्रंप की यह मुलाक़ात एक संकेत है कि शब्दों के पीछे की रणनीति को समझने और उसका कूटनीतिक उत्तर देने का। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह भविष्य में किसी भी वैश्विक मंच पर चुप दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार के रूप में खड़ा हो।

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