क्या इंदिरा गांधी राष्ट्रपति बनकर हमेशा सत्ता में बने रहना चाहती थीं?
सौतिक बिस्वास
1970 के दशक में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी. इसके बाद भारत एक ऐसे दौर में पहुंच गया, जिसमें नागरिकों के अधिकारों को सीमित कर दिया गया और विपक्ष के ज़्यादातर नेताओं को जेल में डाल दिया गया.
इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने अपनी नई किताब में लिखा है, “इस अधिनायकवादी शासन के पीछे उनकी पार्टी कांग्रेस ने चुपचाप देश की एक नई तस्वीर की कल्पना शुरू कर दी थी.”
अधिनायकवादी शासन एक राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें सरकार नागरिकों के जीवन के लगभग सभी पहलुओं को नियंत्रित करती है.

लेकिन इसके तहत जिस देश की कल्पना की गई थी उसकी जड़ें लोकतंत्र में नहीं थीं. उस लोकतंत्र में जिसमें नियंत्रण और संतुलन के तरीके़ होते हैं. देश की कल्पना एक ऐसे केंद्रीकृत राज्य के तौर पर की जा रही थी जिसमें कमांड और कंट्रोल को अहमियत दी गई थी.
राघवन अपनी किताब ‘इंदिरा गांधी एंड ईयर्स दैट ट्रांसफ़ॉर्म्ड इंडिया’ में लिखते हैं कि कैसे इंदिरा गांधी के शीर्ष नौकरशाहों और पार्टी के वफ़ादारों ने देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली के लिए ज़ोर देना शुरू किया था. यह वो सिस्टम होता है जो सारी कार्यकारी शक्तियों का केंद्रीकरण कर देता है और ‘बाधा’ डालने वाली न्यायपालिका को साइडलाइन कर देता है . इसमें संसद की ताक़त बहुत कम हो जाती है और ये सिर्फ़ एक सामूहिक कोरस में तब्दील होकर रह जाती है.

प्रोफे़सर राघवन लिखते हैं कि यह सब सितंबर 1975 में शुरू हुआ, जब अनुभवी राजनयिक और इंदिरा गांधी के क़रीबी सहयोगी बीके नेहरू ने एक पत्र लिखकर इमरजेंसी की तारीफ़ की और इसे “लोकप्रिय समर्थन से पैदा अपार साहस और शक्ति का प्रदर्शन” बताया. उन्होंने इंदिरा गांधी से इस मौके़ का फ़ायदा उठाने की अपील की.
बीके नेहरू ने लिखा कि संसदीय लोकतंत्र “हमारी ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं रहा है. इस प्रणाली में कार्यपालिका लगातार निर्वाचित विधायिका के समर्थन पर निर्भर रहती है, जो हमेशा लोकप्रियता तलाशती रहती है और किसी भी ऐसे क़दम को रोकती है जो अप्रिय हो.

प्रोफे़सर राघवन लिखते हैं कि बीके नेहरू ने कहा था कि भारत को एक ऐसे राष्ट्रपति की ज़रूरत है जो प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुना जाए और संसद पर निर्भर न रहे. ऐसा राष्ट्रपति जो ”कठोर, अप्रिय और अलोकप्रिय फ़ैसले लेने में समर्थ हो.”
प्रोफ़ेसर राघवन लिखते हैं कि नेहरू के इन विचारों का जगजीवन राम और स्वर्ण सिंह जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने बड़े ही गर्मजोशी से समर्थन किया.
हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने तो अपने ख़ास मुंहफट अंदाज में साफ़ कहा, ” हटाओ इस चुनावी बकवास को. अगर आप मुझसे पूछें तो मैं तो यही कहूंगा कि हमारी बहन (इंदिरा गांधी) को ज़िंदगी भर के लिए राष्ट्रपति बना दो और कुछ करने की जरूरत नहीं है.”

जिन दो ग़ैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से इस पर चर्चा की गई थी उनमें से एक तमिलनाडु के एम. करुणानिधि इस विचार से प्रभावित नहीं थे.
प्रोफे़सर राघवन लिखते हैं कि जब नेहरू ने इंदिरा गांधी को रिपोर्ट भेजी, तो उन्होंने कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई. उन्होंने अपने क़रीबी सहयोगियों को प्रस्ताव पर आगे विचार करने का निर्देश दिया.
फिर “हमारे संविधान पर एक नया नज़रिया: कुछ सुझाव” शीर्षक वाला एक दस्तावेज़ गुप्त तौर पर तैयार किया गया. इसे इंदिरा गांधी के विश्वसनीय सलाहकारों के बीच बांटा गया.

इसमें भारत के राष्ट्रपति को अमेरिका के राष्ट्रपति से भी ज़्यादा संवैधानिक अधिकार देने का प्रस्ताव था. इसमें न्यायपालिका की नियुक्तियों और क़ानून बनाने पर नियंत्रण शामिल था.
इसमें राष्ट्रपति की अध्यक्षता में एक नई “सुपीरियर काउंसिल ऑफ़ ज्यूडिशियरी” बनाने का सुझाव दिया गया था जो क़ानूनों और संविधान की व्याख्या करने के साथ सुप्रीम कोर्ट की ताक़तों को बेअसर कर देती.
गांधी ने यह दस्तावेज धर को भेज दिया जिन्होंंने देखा कि इसने “संविधान को अस्पष्ट तौर पर अधिनायकवादी दिशा की ओर मोड़ दिया है.”

कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डी.के. बरुआ ने पार्टी के 1975 के वार्षिक अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से अपील कर डाली कि संविधान की नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए. ऐसा करके उन्होंने जन प्रतिनिधियों की थाह लेने की कोशिश की.
हालांकि ये विचार कभी औपचारिक प्रस्ताव के तौर पर मूर्त रूप नहीं ले सका. लेकिन इसकी छाया 1976 में पारित 42वें संविधान संशोधन अधिनियम पर मंडराती रही. इस संशोधन ने संसद की शक्तियों का विस्तार किया, न्यायिक समीक्षा को सीमित किया और कार्यपालिका के अधिकार को केंद्रीकृत किया.
(साभार बीबीसी )

