Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » क्या किसी की भूख की तस्वीर लेना जरूरी है?
    Breaking News Headlines खबरीलाल मेहमान का पन्ना

    क्या किसी की भूख की तस्वीर लेना जरूरी है?

    News DeskBy News DeskMay 7, 2025No Comments5 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    “सोशल मीडिया युग में करुणा की कैद”

    सोशल मीडिया के युग में भलाई और करुणा अब मौन संवेदनाएँ नहीं रहीं, वे कैमरे के फ्रेम में क़ैद होती जा रही हैं। आज अधिकांश मदद ‘लाइक्स’ और ‘फॉलोवर्स’ के लिए की जाती है, न कि सच्ची इंसानियत से। सहायता अब एक ‘कंटेंट’ बन चुकी है और ज़रूरतमंद की गरिमा अक्सर इस प्रदर्शन की भेंट चढ़ जाती है। यह लेख हमें आत्मपरीक्षण की ओर ले जाता है—क्या हम वाकई मदद कर रहे हैं या बस सोशल मीडिया पर नेकी की तस्वीर गढ़ रहे हैं?

    – प्रियंका सौरभ

    आज का युग ‘डिजिटल करुणा’ का युग बन चुका है, जहाँ इंसानियत, परोपकार, और सहानुभूति जैसे मूल्य अब मौन संवेदनाओं की बजाय कैमरे की फ्लैश में दर्ज होते हैं। पहले जहाँ “नेकी कर दरिया में डाल” की परंपरा जीवित थी, अब वह बदलकर “नेकी कर, सोशल मीडिया पर डाल” हो चुकी है। इस लेख के माध्यम से हम इसी प्रवृत्ति की साहित्यिक और सामाजिक समीक्षा करेंगे।

    भलाई की भावना मनुष्य की सबसे पवित्र प्रवृत्तियों में से एक है। यह वह स्वाभाविक मानवीय गुण है जो हमें संवेदना, दया, और परस्पर सहयोग की ओर प्रेरित करता है। किन्तु आज के समय में यह गुण मंच पर आ चुका है—एक ऐसा मंच जहाँ तालियाँ हैं, टिप्पणियाँ हैं, और सबसे ज़रूरी, एक कैमरा है जो हर क्षण को “दृश्य” बनाता है।

    एक समय था जब कोई वृद्ध भूखा दिखता, तो राह चलते लोग बिना कुछ कहे, बिना देखे, उसे कुछ खाने को दे जाते थे। आज वही द्रश्य होता है, लेकिन कैमरा पहले निकाला जाता है। भूखे की थाली से ज़्यादा अहमियत उस एंगल की होती है, जिसमें वह थाली दिखाई दे। सेवा अब सीधी नहीं रही, वह एक स्क्रिप्टेड ऐक्ट में बदल गई है।

    आधुनिक मानव की आत्मा अब लाइक्स, शेयर, कमेंट्स की भूखी हो चली है। किसी की मदद करने के बाद हमें तसल्ली तब मिलती है, जब कोई कहे, “वाह, आप तो बड़े नेकदिल हैं।” पहले मदद करने के बाद मन को जो संतोष मिलता था, अब वह ‘फॉलोवर्स बढ़ने’ के संतोष से बदला जा चुका है।

    यह न केवल इंसानियत की आत्मा को खरोंचता है, बल्कि मदद पाने वाले की गरिमा को भी आहत करता है। वह व्यक्ति जिसे मदद मिली है, उसकी ज़रूरतें तो पूरी होती हैं, लेकिन उसकी निजता, उसकी आत्मसम्मान की परतें एक-एक कर सोशल मीडिया के सामने उतार दी जाती हैं।

    सोचिए, अगर कोई कैमरा न हो, कोई दर्शक न हो, कोई ताली बजाने वाला न हो—क्या तब भी आप वही मदद करेंगे? यह प्रश्न हमारे भीतर झाँकने की ज़रूरत को इंगित करता है। करुणा यदि सच्ची है, तो वह गुमनाम रहेगी। यदि उसमें प्रदर्शन है, तो वह करुणा नहीं—डिजिटल ब्रांडिंग है।

    आज कई बार लगता है कि सहायता करना एक स्क्रिप्टेड इवेंट बन चुका है। वीडियो में सबसे पहले मदद मिलने वाले व्यक्ति की दयनीय स्थिति को दिखाया जाता है, फिर सहायता प्रदान की जाती है, और अंत में किसी नायक की तरह मददकर्ता का चेहरा। यह सब इतनी सफाई से किया जाता है कि वीडियो फिल्म जैसी लगती है—संगीत के साथ, टाइटल के साथ, और अंत में एक गूढ़-सा संदेश।

    इस सारी प्रवृत्ति में सबसे अधिक पीड़ित होती है नैतिकता। किसी की ज़रूरत को दिखावा बना देना उस व्यक्ति के अस्तित्व पर हमला है। एक भूखे की भूख अगर कैमरे में रिकॉर्ड न हो तो क्या उसका दुख कम है? क्या दया केवल तभी योग्य है जब वह पब्लिक डोमेन में हो?

    यह नई नैतिकता सिर्फ दूसरों के सामने दिखने के लिए जीती है। अब ‘कृपा’ भी एक मुद्रा बन गई है—जिसे दिखाना पड़ता है, गिनाना पड़ता है। स्वार्थरहित सेवा का स्थान स्वार्थयुक्त प्रदर्शन ने ले लिया है।

    यह सब सुनकर अब साहित्यकार की लेखनी व्यंग्य से भर जाती है। कल्पना कीजिए एक दृश्य—एक व्यक्ति सड़क किनारे बेहोश पड़ा है। एक ‘सोशल वॉरियर’ आता है, और उसके साथ उसका कैमरामैन। सबसे पहले कुछ तस्वीरें, फिर एक वीडियो: “हमने इनको उठाया, पानी पिलाया, एंबुलेंस बुलाई” और फिर कैप्शन: “हम सब मिलकर बदलाव ला सकते हैं”।

    कमेंट्स आते हैं—”वाह भाई साहब, आप तो फरिश्ता हैं।” किसी को यह नहीं सूझता कि क्या वह व्यक्ति कैमरे में आना चाहता था? क्या उसे अपने जीवन की सबसे कमजोर अवस्था में पब्लिकली दिखाया जाना चाहिए था?

    आज नेकी भी एक पूंजी बन गई है। इसका बाजार भाव बन गया है। जो जितनी ज्यादा भलाई करता है (या कहें, दिखाता है), उसका सामाजिक रेटिंग उतना ही ऊँचा हो जाता है। कई बार यह भलाई राजनीतिक होती है, कभी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत होती है, और कभी व्यक्तिगत ब्रांड निर्माण के लिए।

    ऐसे में वास्तविक करुणा कहाँ छिप जाती है? क्या वह अब केवल कविता में जीवित रह गई है? क्या वह अब सिर्फ कबीर और तुलसी के दोहों में ही साँस लेती है?

    सोचने का समय आ गया है। मदद करने वाला बड़ा है या मदद पाने वाला? यदि कोई भूखा है, तो क्या उसकी भूख की तस्वीर लेना जरूरी है? क्या उसकी सहमति जरूरी नहीं? यदि हम उसे मदद देते समय उसकी पीड़ा को ‘कंटेंट’ बना दें, तो क्या हम वास्तव में सहायता कर रहे हैं या उसका उपभोग कर रहे हैं?

    आज जब भलाई की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैरती हैं, तो कहीं-न-कहीं वे समाज को एक नई दिशा दे रही हैं—एक ऐसी दिशा जहाँ सेवा भी दिखावे का अंग बन चुकी है। यह आवश्यक है कि हम पुनः आत्मपरीक्षण करें।

    भलाई मौन होती है, और उसका असर चुपचाप दिलों में उतरता है। यदि हमें सच में इस समाज को बेहतर बनाना है, तो जरूरत है कि हम बिना कैमरे, बिना मंच, और बिना स्वार्थ के किसी की मदद करें। नेकी कोई तस्वीर नहीं, वह तो संवेदना की वह रेखा है जो दिल से दिल तक जाती है—बिना कोई सबूत माँगे।

    लेखक: प्रियंका सौरभ
    (स्वतंत्र पत्रकार, कवयित्री एवं सामाजिक विश्लेषक)

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleअपने बड़बोले मंत्री पर आखिर क्यों चुप्पी साधे है कांग्रेस हाईकमान ?
    Next Article आतंकवाद-विरोधी अंतरराष्ट्रीय कवि-सम्मेलन आयोजित

    Related Posts

    शिक्षा व्यवस्था पर जेएमएम का हमला, केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग

    June 2, 2026

    बीएमडब्ल्यू प्लांट से रंगदारी मांगने के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता, प्रिंस खान गैंग का सहयोगी गिरफ्तार

    June 2, 2026

    मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने जिला निर्वाचन पदाधिकारियों के साथ की समीक्षा बैठक, 15 जून तक मैपिंग कार्य पूरा करने के निर्देश

    June 2, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    शिक्षा व्यवस्था पर जेएमएम का हमला, केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग

    बीएमडब्ल्यू प्लांट से रंगदारी मांगने के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता, प्रिंस खान गैंग का सहयोगी गिरफ्तार

    मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने जिला निर्वाचन पदाधिकारियों के साथ की समीक्षा बैठक, 15 जून तक मैपिंग कार्य पूरा करने के निर्देश

    रांची की यातायात व्यवस्था सुधारने को लेकर दुकानदारों के साथ बैठक, अतिक्रमण व अवैध पार्किंग पर सख्ती के निर्देश

    ऑनलाइन सट्टेबाजी के करोड़ों के खेल का खुलासा, राहुल कुमार गिरफ्तार

    ब्राह्मी लिपि पर त्रिदिवसीय कार्यशाला का शुभारम्भ, भारतीय ज्ञान-परंपरा से जुड़े प्रतिभागी

    डीएमएफटी न्यास परिषद की बैठक संपन्न, सड़क, जलापूर्ति, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना विकास योजनाओं पर हुई विस्तृत चर्चा

    ईंट निर्माता एसोसिएशन ने प्रदूषण बोर्ड चेयरमैन का किया स्वागत, लाइसेंस प्रक्रिया आसान होने पर जताया आभार

    स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करें, हर नागरिक का हेल्थ प्रोफाइल तैयार हो : मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन

    पहले अपनी गिरिबां में झांकें, फिर दूसरों पर सवाल उठाना चाहिए : गौरव पुष्टि

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.